शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

मेट्रो बंद

दिल्ली पिछले कुछ दिनों से रोष में है। घटनाएं वही है पर उनमें वहशीपन बढ़ गया है। मानवता का लबादा जो हम ओढ़ कर अक्सर निकलते हैं वो तार तार हुआ कहाँ पड़ा है, शायद इसकी सुध ही नहीं है।

१६ दिसम्बर यानी आज से ८ दिन पहले चलती बस में एक पैरा मेडिकल की छात्र के साथ सामूहिक बलात्कार, दरिंदगी से उसके और उसके साथी की पिटाई। फिर हैवानियत की हदें पार करके उन दोनों को निर्वस्त्र बीच सड़क पे फेंकना। कौन सी अवस्था ज्यादा मार्मिक है यह निर्णय कर पाना बहुत मुश्किल था।

दिल दहला देने वाली इस घटना ने सबको झिंझोड़ के रख दिया था। लोग सड़कों पर उतर आए। सरकार इस उमड़ते हुए सैलाब को रोकने में मानों नाकाम सी हो गई हो।

यह सब घटना क्रम इतनी तेजी से हुआ कि सोचने की शक्ति खत्म सी हो गई। मन खिन्न था पर रोजमर्रा के काम चूँकि निपटाने ही होते है तो बस वही किसी तरह पूरे हो पा रहे थे। ऐसे में पता चला कि सरकार ने रोष की इस आंधी को रोकने के लिए धारा १४४ लगा दी और भीड़ को रोकने के लिए मेट्रो के ९ स्टेशन बंद कर दिए। मेरी किस्मत यह कि इनमें से ७ स्टेशन मेरे रास्ते में थे। तो आज परेशानियों के इस भवंर में एक परेशानी यह भी थी कि ड्यूटी पर कैसे पहुंचा जाए। टाइम बचाने के लिए मैंने सबसे आसान काम किया—लंच छोड़ दिया। तो बचे न पूरे १० मिनट, जो मेरे लिए काफी थे।

मेट्रो मिलने का तो सवाल नहीं था तो बस से जाने का सोचा, पर मुझे रूट का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था। और स्टॉप पे खड़े-खड़े सुना कि ट्रैफिक का बहुत बुरा हाल है। तो इकलौते बचे उपाय के तौर पे मैंने ऑटो लेने में ही अपनी भलाई समझी।

ऑटो वाले को जैसे ही मैंने कहा "आकाशवाणी?"

तो उसने मुझसे पूछा, "मैडम जाम तो नहीं होगा?"

मुझे हंसी भी आई और गुस्सा भी। "मैं क्या ऑटो चलाती हूँ ? आपको पता होना चाहिए।" खैर वो तैयार हो गया जाने को।

मैं ऑटो में बैठ कर भी अपनी नज़रें घड़ी से हटा नहीं पा रही थी।

सड़कों पे बसें लदी हुई थी लोगों से। और मेट्रो स्टेशन बाहर से ही वीरान लग रहे थे। जगह-जगह लोग खड़े थे—बस, ऑटो जो भी मिले लेने को तैयार। परेशान और बेबस। एक जगह से दूसरी जगह कैसे जाया जाए इसी सोच में उलझे हुए से।

जनता के गुस्से, नाराज़गी या रोष का जवाब देने का सरकार का यह तरीका मेरी तो समझ में नहीं आया। जहाँ लोगों को सवालों की शक्ल में भी परेशानी मिलती है और मुश्किलों के हल के तौर पे भी दिक्कतें।

आई टी ओ पहुँच कर देखा तो एक लम्बा जाम मेरा इंतजार कर रहा था। १५ मिनट बाद हम किसी तरह थोड़ा सा आगे बढ़े तो आगे पुलिस वाले से ट्रैफिक का हाल सुन कर ऑटो वाले ने यू टर्न ले लिया। ट्रैफिक था, पर थोड़ा कम। मैं एक बार बाहर भीड़ को देखती और फिर घड़ी को। आज ऑटो से तेज शायद मेरी घड़ी चल रही थी।

रास्ते भर लोग मेरे ऑटो को रोकते रहे, खाली समझ कर। पर मेरी मंजिल अभी भी दूर थी।

सड़क पे खड़ा, ऑटो में बैठा और झुंझलाता हुआ हर इंसान आज मेट्रो को बहुत मिस कर रहा था। और मैं भी...

इन दिक्कतों में मैंने एक बात महसूस की। गली, मोहल्ला, नुक्कड़, बस स्टॉप—हर जगह लोग सिर्फ इसी की चर्चा कर रहे थे। सब गालियाँ दे रहे थे और मौत की सजा मांग रहे थे उन वहशियों के लिए।

माँ-बाप भी अचानक बच्चों से छुपाने की जगह बात कर रहे थे—जुर्म की, होने की वज़ह की, उसके असर का। अब इन सबके साथ वो बच्चों को बड़ा करने की कोशिश में थे या खुद के डर पे काबू पाने की... यह तो पता नहीं पर चर्चा जारी थी हर जगह।

इस माहौल में कभी जाम में फंसते, तो कभी रुकते रुकाते किसी तरह मैं आकशवाणी पहुँच गई। अपने टाइम से थोड़ा से लेट। पर... पहुंची तो।

एक और बात नोटिस की मैंने इन ८ दिनों में—अचानक पुरुषों ने थोड़ा और तमीज से पेश आना शुरू कर दिया था। यह जानते हुए भी कि वो हादसे में शामिल नहीं थे, उसका हिस्सा नहीं थे, पर उन ६ लोगों ने पूरी कौम पे जो कलंक लगाया है शायद इससे कुछ कालिख कम हो जाए... यह संभला हुआ माहौल, यह गुस्सा, यह रोष में हिस्सेदारी—सब सबूत थे कि अगर वहशी सैकड़ों की तादाद में बढ़े हैं तो इंसान हजारों, लाखों की तादाद में। तो गिनती कम नहीं थी और अब तो हौसलों में भी कमी नहीं थी।

इन्हीं सब के बीच एक छोटा सा मिशन अभी बाकी था। जी हाँ... मेरा घर वापसी का मिशन... वो भी बिना मेट्रो के...

मेट्रो मिलने का तो सवाल नहीं था तो बस से जाने का सोचा, पर मुझे रूट का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था। और स्टॉप पे खड़े-खड़े सुना कि ट्रैफिक का बहुत बुरा हाल है। तो इकलौते बचे उपाय के तौर पे मैंने ऑटो लेने में ही अपनी भलाई समझी।

ऑटो वाले को जैसे ही मैंने कहा "आकाशवाणी?"

तो उसने मुझसे पूछा, "मैडम जाम तो नहीं होगा?"

मुझे हंसी भी आई और गुस्सा भी। "मैं क्या ऑटो चलाती हूँ ? आपको पता होना चाहिए।" खैर वो तैयार हो गया जाने को।

मैं ऑटो में बैठ कर भी अपनी नज़रें घड़ी से हटा नहीं पा रही थी।

सड़कों पे बसें लदी हुई थी लोगों से। और मेट्रो स्टेशन बाहर से ही वीरान लग रहे थे। जगह-जगह लोग खड़े थे—बस, ऑटो जो भी मिले लेने को तैयार। परेशान और बेबस। एक जगह से दूसरी जगह कैसे जाया जाए इसी सोच में उलझे हुए से।

जनता के गुस्से, नाराज़गी या रोष का जवाब देने का सरकार का यह तरीका मेरी तो समझ में नहीं आया। जहाँ लोगों को सवालों की शक्ल में भी परेशानी मिलती है और मुश्किलों के हल के तौर पे भी दिक्कतें।

आई टी ओ पहुँच कर देखा तो एक लम्बा जाम मेरा इंतजार कर रहा था। १५ मिनट बाद हम किसी तरह थोड़ा सा आगे बढ़े तो आगे पुलिस वाले से ट्रैफिक का हाल सुन कर ऑटो वाले ने यू टर्न ले लिया। ट्रैफिक था, पर थोड़ा कम। मैं एक बार बाहर भीड़ को देखती और फिर घड़ी को। आज ऑटो से तेज शायद मेरी घड़ी चल रही थी।

रास्ते भर लोग मेरे ऑटो को रोकते रहे, खाली समझ कर। पर मेरी मंजिल अभी भी दूर थी।

सड़क पे खड़ा, ऑटो में बैठा और झुंझलाता हुआ हर इंसान आज मेट्रो को बहुत मिस कर रहा था। और मैं भी...
इन दिक्कतों में मैंने एक बात महसूस की। गली, मोहल्ला, नुक्कड़, बस स्टॉप—हर जगह लोग सिर्फ इसी की चर्चा कर रहे थे। सब गालियाँ दे रहे थे और मौत की सजा मांग रहे थे उन वहशियों के लिए।

माँ-बाप भी अचानक बच्चों से छुपाने की जगह बात कर रहे थे—जुर्म की, होने की वज़ह की, उसके असर का। अब इन सबके साथ वो बच्चों को बड़ा करने की कोशिश में थे या खुद के डर पे काबू पाने की... यह तो पता नहीं पर चर्चा जारी थी हर जगह।

इस माहौल में कभी जाम में फंसते, तो कभी रुकते रुकाते किसी तरह मैं आकशवाणी पहुँच गई। अपने टाइम से थोड़ा से लेट। पर... पहुंची तो।

एक और बात नोटिस की मैंने इन ८ दिनों में—अचानक पुरुषों ने थोड़ा और तमीज से पेश आना शुरू कर दिया था। यह जानते हुए भी कि वो हादसे में शामिल नहीं थे, उसका हिस्सा नहीं थे, पर उन ६ लोगों ने पूरी कौम पे जो कलंक लगाया है शायद इससे कुछ कालिख कम हो जाए... यह संभला हुआ माहौल, यह गुस्सा, यह रोष में हिस्सेदारी—सब सबूत थे कि अगर वहशी सैकड़ों की तादाद में बढ़े हैं तो इंसान हजारों, लाखों की तादाद में। तो गिनती कम नहीं थी और अब तो हौसलों में भी कमी नहीं थी।

इन्हीं सब के बीच एक छोटा सा मिशन अभी बाकी था। जी हाँ... मेरा घर वापसी का मिशन... वो भी बिना मेट्रो के...

© उपमा डागा पार्थ २०१२

रविवार, 9 दिसंबर 2012

माँ बेटी

पिछले तीन दिनों से मेट्रोस्तान मेरे सामने दो चरित्रों की कहानियां बार-बार सामने ला रहा है। पर चरित्र वही होते हुए भी कहनियाँ अलग-अलग थी। लोग कहते हैं हर सिक्के के दो पहलू होते हैं पर मुझे तो लगा जितनी बार सिक्का उछालोगे एक नया ही पहलू सामने आएगा।

पात्र हैं—माँ बेटी। तो क्यों न शुरुआत मैं खुद से करूँ।

दो तीन दिन से मम्मी की बहुत याद आ रही है। वैसे माँ की याद के लिए दिल का एक कोना हमेशा ही रिज़र्व रहता है, पर ज्यादा आने का कारण है—रोज-रोज की यह बढ़ती ठण्ड। मेरी मम्मी की एक बहुत ही प्यारी आदत है—शायद माँ होने के कारण—सर्दियाँ शुरू होते ही, जब भी मैं बाहर निकलती वो हर बार कहती: "शाल ले जाओ।"

चूँकि मेरी सर्दियाँ थोड़ी देर से शुरू होती हैं तो मैं कहती, "मम्मी अभी से? अभी तो आइसक्रीम खाने का टाइम आया है।" और मैं हँसते हुए चली जाती।

इतने सालों में न उनका सवाल बदला और न मेरा जवाब।

एक बार बहुत संजीदगी से मैंने उनसे पूछा, "जब आपको पता है की मैं शाल नहीं ले के जाऊँगी, तो आप कहती क्यों हो?" वो बड़ा मुस्कुरा के बोली, "बेटा, माँ के दिल को लॉजिक समझ में नहीं आते। मुझे जब दिख रहा है कि किसी चीज़ से तुम्हे नुकसान हो रहा है तो मैं तो तुम्हे रोकूंगी न। और शायद मेरी पगली को कभी समझ आ जाये कि सर्दियों में शाल ओढ़ी जाती है, आइसक्रीम नहीं खाई जाती," मम्मी ने लगभग मेरा कान मरोड़ते हुए कहा। फिर हम दोनों हंसने लगे।

और आजकल मैं कुछ तो मिस कर रही थी...

दूसरा पात्र

वापसी में राजीव चौक से एक भीड़ ने मानों मुझे मेट्रो में रख दिया हो। तो बैठने का सवाल ही नहीं था। मैं एक जगह सहारा ले कर खड़ी हो गई। ८:३० के करीबन समय था। मेरे पीछे खड़ी लड़की का मोबाइल बजा।

उसने फ़ोन उठाते ही कहा, "जी मम्मी।"

"मेट्रो में।"

"जी। आज थोड़ी देर हो गई।"

"आपको बताया था न हम लोग रागिनी के यहाँ मिलने वाले थे।"

"सब लोग मतलब सब।" सब कहते हुए उसने दसेक नाम गिनवा दिए जिनमें से दो तीन लड़को के थे और मम्मी को शायद यही पता करना था।

"जी। पहनी हुई है जैकेट।"

"खाया था खाना। मम्मी पार्टी के लिए जायेंगे और खाना नहीं खाऊँगी? आप भी न..."

मुझे लगा माओं की सिर्फ शक्ल बदलती है, उनकी बुनियादी चिंताएं विश्व स्तर पर शायद वही होती हैं। देर होने पे डांटते हुए भी उसे चिंता हो रही थी की बेटी ने खाया कि नहीं। सर्दियों के कपड़े पहने कि नहीं। हे माँ! तुम धन्य हो।

"मम्मी। अभी भी मैं सबसे पहले उठ के आई हूँ।" उसकी सफाईया जारी थी।

"अब हो गई देर, बताओ क्या करूँ ?"

"ठीक है आगे से नहीं जाउंगी।" उसने झुंझुला कर बात करनी चाही।

"तो फिर आप ही तो कह रही हो?"

"अच्छा बाबा। हो गई गलती। आगे से नहीं होगा।"

पुरे रास्ते वो अपनी माँ को यकीं दिलवाती रही कि वो अपनी दोस्त के यहाँ से आ रही है और देर जो आज हुई है फिर नहीं होगी।

मुझे लगा अगर माँ-बाप बेटी को कहीं बाहर भेज रहे हैं, पढ़ने या नौकरी के लिए—तो इतना यकीं तो अपनी औलाद पर रखना ही पड़ेगा कि वो हिफाज़त से रहेगी, बचपन से सिखाये संस्कारों के साथ। और उस लड़की के चेहरे पे सच्चाई तो थी। खैर गलत शायद कोई भी नहीं था अपनी जगह पे।

माँ बेटी को जिस डोर ने बाँधा होता है, उसका धागा, धागा होते हुए भी, बहुत मजबूत होता है।

तीसरा पात्र

वही मेट्रो, और लगभग वही समय—रात के ८:३०।

यह टाइम शायद वो होता है जब माओं की चिंता की घड़ी सबसे तेज चलती है।

फ़ोन बजा।

"हूँ। मेट्रो में।"

उसको पता था कि फ़ोन माँ का है और वो कुछ कहेंगी। उसके हावभाव दिखा रहे थे कि उफ़! मम्मी  मुझे पूछने के लिए फ़ोन कैसे कर सकती हैं। मैं अब इतनी बड़ी हो गई हूँ। और आप मुझसे बच्चों वाले सवाल पूछती रहती हो।

"अरे मम्मी। आ रही हूँ। देर कहाँ हुई है? आप तो ऐसे शोर मचा रही हो जैसे १२ बज गए हों।" विरोधाभास उसके एक-एक शब्द में झलक रहा था।

"ठीक है। हाफ एन ऑवर लग जाएगा," कह के उसने सर झटकते हुए फ़ोन रख दिया।

पास में खड़े उसके ग्रुप की दूसरी लड़की ने इशारे से, बिना अपना ईरफ़ोन हटाये, पूछा क्या हुआ।

उसने उसी झल्लाहट में जवाब दिया, "मम्मी थी यार। खुद तो मस्ती कर लेती हैं जब मेरी बारी आती है तो इनको रूल्स याद आ जाते हैं।"

लगा बराबरी के इस दौर ने माँ से बच्चों की चिंता करने का हक शायद छीन लिया है। या फिर अधिकारों ने अपना दबदबा इतना कर लिया है की कर्तव्य दूर कहीं दुबक के बैठ गया है।

और उसको गुस्सा सिर्फ अधिकार छिनने का था, कर्तव्य और जवाबदेही... यह शब्द नए ही लग रहे थे उसके लिए।

चौथा पात्र

अगला दिन, दोपहर के चार बजे।

मेट्रो में भीड़ बहुत ज्यादा नहीं थी। पर जैसा कि हर स्टॉप पे होता है। चढ़ने वाले नए लोग सीट तलाशते हुए चढ़ते हैं।

एक माँ ३-४ साल के बच्चे को गोद में उठाये अन्दर घुसी। एक सीट पर एक महिला एक बच्ची के साथ बैठी थी। बच्ची की उम्र भी वही थी ३-४ साल। चढ़ने वाली महिला ने बच्चे को सरकने को कहा। बच्ची ने मना कर दिया। माँ ने उसको उठने को कहा। बच्ची भी जिद पे थी, उसने मना कर दिया। माँ ने उसको उठा के जोर से खड़ा कर दिया और गुस्से में उसको एक थप्पड़ मारा। बच्ची जोर से रोना शुरू हो गई। जब तक हम सबको कुछ समझ आता, उसने जोर-जोर से ४-५ थप्पड़ मार दिए। डिब्बे में बैठे सब लोग सन्न रह गए। सब लोग बच्ची को चुप करवाने की कोशिश करने लगे, पर वो रोए जा रही थी और रोते-रोते सिर्फ अपनी माँ की तरफ देख रही थी। माँ कुछ भी सुनने के मूड में नहीं थी।

"यह हर बार ऐसा ही करती है। मैं इस बार इसको बोल के लायी थी। पर यह फिर बदतमीज़ी कर रही है।" और साथ-साथ उसको आँखे दिखाए जा रही थी।

बच्ची का रोना जारी था, लेकिन उसने जैसे पसीजने से इंकार कर दिया था।

सब उसको अपनी-अपनी तरह से चुप करवाने की कोशिश कर रहे थे, पर वो अजनबियों की इस भीड़ में एकमात्र पहचान वाले चेहरे को ही रोते हुए देखे जा रही थी। और परिचित चेहरा अचानक धुंधला सा क्यों हो रहा था, यह शायद आंसुओं से भीगी उसकी आँखें समझ नहीं पा रही थी।

उसके रोने से पूरा डिब्बा परेशां हो गया, पर माँ अभी भी उसको डाँट रही थी। तभी एक महिला आगे आई। उसने बच्ची को थोडा पानी पीने के लिए दिया। उसने मना कर दिया। फिर उसने उसको छोटा सा एक टैडी बियर दिखाया। बच्ची थोड़ी सी चुप हुई। फिर लोगो के समझाने पर माँ ने उसको पानी पिलाया और उसे गोद में ले लिया। धीरे-धीरे माहौल शांत हुआ। डिब्बे में सब लोग माँ के व्यवहार पर छीटाकशी कर रहे थे। माँ अभी भी नाराज़ थी अपनी बेटी से। छोटी-सी बच्ची से इतनी नाराज़गी की असली वज़ह क्या थी यह तो वो ही बता सकती थी। पर लोग एक माँ के ऐसे रूप को देख कर सिर्फ अपना पसंदीदा काम कर रहे थे—बातें बनाने का।  

मैं अवाक् थी—माँ बेटी के रिश्तों के इन अलग-अलग समीकरणों को देख कर। पर नया शायद कुछ नहीं था...

कहानियां सब सच्चाई बयां कर रही थी आज के युग की। पर कुछ सच्चाइयां माँए नहीं सुनना चाहती थी और कुछ बेटियाँ। स्वीकारने और सुधराने में से कौन सा रास्ता इख्त्यार करना है—यह फैसला दोनों को ही लेने की जरूरत है।

बस यही सोचते सोचते मैंने अपने सब कहानियों और उनके पात्रों से विदा ले ली। उनको सोचने की पूरी आज़ादी देते हुए मैं अपने सफ़र की तरफ बढ़ गई।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

रविवार, 2 दिसंबर 2012

बोझ

आज लगभग दो महीने हो गए दोबारा ऑफिस जॉइन किये हुए लेकिन अभी भी लगता है घर और बाहर की जिन्दगी में पूरी तरह सांमजस्य नहीं बिठा पाई हूँ। ऐसा लगता है एक काम करती हूँ तो दूसरा छूट जाता है। चूँकि एक समाचार वाचक के रूप में मुझे रोज ऑफिस जाने की ज़रुरत नहीं होती इसलिए घर वालों की अपेक्षाएँ भी शायद कम नहीं हुई है। 

घर और बाहर की इसी खींचातानी में अभी तक जो 'सुपर वुमन' का टाइटल मिला हुआ था, वो छिनता हुआ सा नज़र आ रहा था। तो एक नाराज़गी सी थी। अब यह नाराज़गी सारे काम न कर पाने की वज़ह से थी या एकदम से बढ़ी जिम्मेवारियों को अच्छे से न निभा पाने की मेरी खुद की धारणा की वज़ह से थी—पता नहीं।


खैर घर के कामों को किसी तरह निपटा कर और बच्चों को पढ़ने की हिदायत दे कर मैं अपने सफ़र की तरफ चल पड़ी—खुद से थोड़ी नाराज़ सी।


मेट्रो में थोड़ी भीड़ थी, पर गाड़ी छोड़ने का टाइम नहीं था। सोच के मुताबिक बैठने की जगह नहीं थी। थकान बहुत हो रही थी, पर कोई चारा नहीं थी। तो खड़ी रही एक कोने में चुपचाप। तभी देखा, डिब्बे में कोने वाली सीट पर दो युवक बैठे है। लेडीज़ डिब्बे में युवक! यह मुझे हैरान करने के लिए काफी था। बैठने को तरसती मैं सोचने लगी कि कैसे बेशरम हैं—इतनी औरतें खड़ी है और यह दोनों बैठे है।


पर कोई इनको उठा क्यों नहीं रहा? यह सवाल दिमाग में आया। चूँकि वो मुझसे पहले से बैठे थे तो लगा हो सकता है लोगों ने बोला हो और उनकी बदतमीजी की वज़ह से सब चुप हों। मैंने सोचा जिस स्टेशन पर भी उतरेंगे उसी पे पुलिस पकड़ के फाइन ठोकेगी तब इनकी सारी अकड़ निकल जाएगी।


मैं यही सब सोच ही रही थी कि राजीव चौक आ गया। उनको भी शायद वहीं उतरना था। कोने में बैठे युवक ने अपनी गोद में रखा बैग अपना साथ वाले का पकड़ाया और सीट से नीचे उतर गया। उसके साथी ने अपना और उसका सामान उठाया और चलने लगा। उसने सीट के नीचे से अपनी चप्पल निकाली और अपने हाथ में पहन ली। अब तक मैं देख चुकी थी कि उसके दोनों पैर नहीं थे। 


मैं सब देख कर एकदम सन्न थी। चेहरे से बिलकुल समान्य दिखने वाला इंसान कैसे खुद को ढो रहा है। अपनी सोच पे इतनी शर्मिंदगी हुई कि खुद से ही नज़रें नहीं मिला पा रही थी। पर उसके चेहरे पे कोई शिकन नहीं थी। मानों भागवान के इस फैसले को भी उसने हँसते हुए स्वीकार कर लिया हो। और मैं इसी पशोपश में थी कि शारीरिक अपंगता झेलनी ज्यादा मुश्किल है या मानसिक।


वापसी में राजीव चौक पे एक भरी हुई मेट्रो खड़ी थी। इतनी भीड़ में जाने की हिम्मत सी नहीं हुई इसलिए उसे जाने दिया। अगली मेट्रो चार मिनट बाद थी। जैसे ही मेट्रो आई सब जल्दी से चढ़ गए। पर गाड़ी अभी भी रुकी हुई थी। तभी एक व्हील चेयर पर एक अंकल जी को लेकर दो मेट्रो कर्मी आये। अब बिना कोई देर किए मैंने उन्हें अपनी सीट दे दी। अंकल जी ने सूट पहन रखा था। व्हील चेयर से सीट पर आ के बैठने में उनकी सांस फूल गई। पास खड़ी एक लड़की ने अपनी पानी की बोतल उनकी तरफ यह कहते हुए बढ़ाई कि सुच्चा पानी है। "सुच्चा पानी" सुन के पंजाब की याद आ गई। 


अंकल जी ने पानी की बोतल ले ली और लगभग आधी पी ली। जब वापिस करने लगे तो उसने कहा, "पी लीजिये अंकल। मुझे तो अगले स्टैंड पर उतरना ही है।" 


"बस बेटा। अब मैं वैशाली तक पहुँच जाऊंगा।"


"भांजी की शादी में जा रहा हूँ। भात देनी है न। तो मुझे तो जाना ही है," उनकी बातें जारी थी। अचानक बोले, "बेटा, फ़ोन है तुम्हारे पास? मेरा मोबाइल घर छूट गया है।" फिर बिना जवाब का इंतजार किये वो नंबर बोलने लगे। लड़की से फ़ोन लेते ही उन्होंने फ़ौरन कहा, "हाँ। बैठ गया हूँ मेट्रो में। चलो पहुँच के फ़ोन करता हूँ।" 


बड़े-बुजुर्ग आज भी हर चीज़ में किफ़ायत करते हैं फिर चाहे वो फ़ोन पे बात करने की हो या फिर मेट्रो से शादी में जाने की। जितनी देर में उन्होंने बात ख़त्म की हम लोग तब तक शायद सिर्फ हेलो ही बोल पाते हैं।


अंकल फिर बोले, "मेरी बीवी थी। पता है भांजी की शादी अमरीका में हो रही है, बहुत सी रस्में होगी।" मानों सब को शादी के बारे में सब कुछ बता देना चाहते हों। पर मेरे दिमाग में एक ही बात घूम रही थी—रिश्तेदारी, फ़र्ज़, रस्मे और निभाना क्या सिर्फ इसी पीढ़ी के साथ ख़तम हो जायेगा? क्या इनके घर में ऐसा कोई नहीं था जो फ़र्ज़ निभाने की इनकी चाह को पूरा कर पाता। एक मामा को भात की रस्म के लिए उसकी भांजी के पास छोड़ आता। पर मेरे सवाल सिर्फ मेरे अन्दर थे और बाहर सिर्फ अंकल की बातें सुनाई दे रही थी, जो वो सुना रहे थे या कह लीजिए जो वो सुनाना चाह रहे थे।


तभी अगले स्टेशन से फिर एक व्हील चेयर अन्दर आती दिखाई दी। इस बार जो उस चेयर पे थे, बहुत भारी या कहिए मोटे थे। और व्हील चेयर ठेलने वालों से उनको ठेला नहीं जा रहा था। बड़ी मुश्किल से लोग उनको अन्दर ला पाए। उनके पैर बहुत सूजे हुए थे और दोनों पैरों पर मोटी मोटी पट्टियाँ बंधी थी। चेयर से सीट पर बैठते हुए वो अपने आप को संभाल नहीं पाए और सीट पर गिर से गए। दो सीट तो पहले ही उनके लिए खाली कर दी गई थी, पर वो अपना बोझ संभल नहीं पाये और टेढ़े से हो कर सीट पर अधलेटे से हो गए। 


मैंने उनको सहारा दे के सीधा करना चाहा पर मुझ अकेली के बस की बात नहीं थी। मैंने उन लोगों को डांटते हुए कहा, "सीधा तो करो उनको।"


"अरे इतनी बुरी हालत है तो घर से निकलते क्यों हैं," वो लोग झल्लाते हुए बोले।


मेरा ध्यान उनके पैरों पर पड़ा। देखा पैरों के नाखून बहुत भद्दे और बड़े हो रखे थे। पता नहीं कितने महीनों से कटे नहीं थे। उनके मुँह से सिर्फ करहाने की आवाजें आ रही थी। भारी शारीर, पैरों में पट्टियाँ, बड़े हुए नाखून और दर्द न बयां करने की लाचारी। पता नहीं कितने आंसू छुपाये होंगे उन्होंने अपने अन्दर और कौन-कौन सा दर्द पी रहे होंगे अकेले। किस मजबूरी में और कहाँ से अपने आप को अकेले लिए वो कहाँ जा रहे थे। 


सवाल आपस में ही टकरा रहे थे और जवाब हमेशा की तरह नदारद थे। 


मेरा स्टॉप आ गया था। उन मोटे अंकल के लिए भी व्हील चेयर आ गई थी। सिर्फ दो स्टॉप का सफ़र तय करना था उनको और उसके लिए वो लोगों की बातें भी सुन रहे थे और खुद को भी भोग रहे थे। जाने यहाँ से उन्हें कहाँ और कैसे जाना था। मेट्रो कर्मी ज्यादा से ज्यादा उन्हें गेट तक छोड़ सकते थे। उसके बाद...


उनकी दशा देख कर मन छलनी सा हो गया, बस आँखों में आंसू ही नहीं आए। लाचारी को आज मैंने देखा नहीं महसूस किया था। और सुबह जो नाराज़गी थी खुद से वो अपने आप कहीं दूर चली गई थी। जिस थकान, अकेलेपन और अपेक्षाओं से मैं खुद को दबा हुआ महसूस कर रही थी वो भी अब कहीं आस पास नहीं थे। उदास होते हुए भी उस ना नज़र आने वाले भगवान के आगे मेरा सर झुक गया। लगा मेरे पास तो बहुत कुछ है—खुद को और लोगों को देने के लिए। और मैं बहुत कुछ कर सकती हूँ सिर्फ और सिर्फ अपनी मदद से।


एक अरज सी निकली मन से—हे भगवान! कभी भी मुझे इतना मजबूर मत करना कि लोगों की आँखों से मेरे लिए बेचारगी के आंसू आये।


© उपमा डागा पार्थ २०१२


सोमवार, 19 नवंबर 2012

मेरी दिल्ली

जिन्दगी को एक रफ़्तार में आते देख अच्छा लग रहा था। और इस रफ़्तार को गति दे रही थी मेट्रो या मेरा अपना मेट्रोस्तान।

आज बड़ा बेजान सा था मेट्रो जाते समय। मानों सारा शहर थका-थका सा हो। अपने ही सीने पे कोई बोझ लिए किसी का इंतजार कर रहा थाउस बोझ को उतारने। पर वो 'कोई' कौन है, कोई नहीं जानता।

तो बस एक थके हुए डिब्बे से निकल पड़ी। मेट्रो जैसे मुझे चिढ़ा रही होबंद होठों से कितनी कहानियां निकलवाओगी। जाओ यह अपना मेट्रोस्तान ले कर कहीं और जाओ। तो मैं कई बंद होठों की कहानियाँ वहीं छोड़ कर मेट्रो से निकल पड़ी।

बाहर निकल के मैंने देखा कि एल. आइ. सी. बिल्डिंग और जी. पी. ओ. के बीच में जो पेवमेंट है, वहां पर ढेर सारे कबूतर इक्कठा थे। दाना खाने के लिए। ऐसा लग रहा था मुंबई का इक छोटा सा गेटवे ऑफ़ इंडिया दिल्ली में भी आ गया हो, जहाँ लोग सिर्फ पक्षियों से ही मिलने आते हैं और पक्षियों को भी लगता है कि आज के युग में भी 'इंसान' जिन्दा है। 

देखा तो लोग वहां गाड़ी से उतर रहे थे, सिर्फ दाना डालने के लिए। अचानक अपनी दिल्ली पर थोडा बहुत गर्व होने लगा। यहाँ के लोगों में पक्षियों के लिए दया भाव देख कर। लगा हाल ही में जो सर्वेक्षण हुआ था, जिसमे दिल्ली को रहने वाली जगहों में नीचे से दूसरा स्थान मिला था, उसमें उन्होंने इंसानियत के इस पहलू को तो पूरी तरह से नज़रंअदाज़ ही कर दिया होगा।

एक अच्छे से एहसास के साथ काम शुरू किया और ख़तम भी।

वापसी में न चाहते हुए भी ध्यान 'मिनी गेटवे' की तरफ चला गया, जो अब बिलकुल खाली था। मानों परिंदों को भी पता हो कि कब दिल्ली के दयालु उन्हें पुचकारने के लिए आयेंगे।

और राजीव चौक पर एक भरी सी गाड़ी मेरा इंतजार कर रही थी। पर आज दिल्ली अच्छी लग रही थीअपनी अच्छाई के कारण।

एक महिला ३०-३२ वर्ष की, मेरे साथ ही गाड़ी में चढ़ी। एक पर्स कंधे पर, एक जुट बैग हाथ में और दुसरे हाथ में कागज का एक बैग। लगा ऑफिस वालों ने भी स्कूल की तरह बैग भारी करने शुरू कर दिए हैं। क्या अब ऑफिस में भी होमवर्क मिलने लगा है? उसने अपने दोनों हाथों का सामान समेटते हुए नज़र दौड़ाई, पर सीट मिलने के कोई आसार नहीं दिखे, तो उसने ऊपर वाली रॉड को पकड़ने की कोशिश की। पर हाथ ऊपर ले जाते ही कागज का बैग फट गया। मुझे लगा बेकार ही दिल्ली सरकार ने प्लास्टिक के बैगस पर पाबंदी लगाई।
  
खैर, उस कागज़ के बैग के अन्दर एक प्लास्टिक बैग मेरे विचारों को मुँह चिढ़ाता हुआ सा बाहर निकला। मानो कह रहा हो, घबराओ मत सिर्फ आवरण ही बदला है अन्दर से हम वही हैं। जो दो-चार चीज़ें कागज़ के बैग के अन्दर थी वो उसने प्लास्टिक बैग के अन्दर डाल दी। फिर उसने मेरी एक 'उम्मीद' को झुठलाते हुए, फटा हुआ कागज़ का बैग सलीके से मोड़ा और उसे तह कर के प्लास्टिक बैग में डाल दिया।

जहाँ लोग हॉर्न की आवाज़ सुन कर भी नहीं हटते और सड़क के किसी भी कोने पर कूड़ा फेंकने में उनको 'अपने देश और भारतीयता' की फीलिंग आती है, ऐसे में यह अनुभव मेरे लिए नया था। और दिल्ली आज मेरे लिए सिर्फ अच्छे-अच्छे अनुभव ही ले कर आ रही थी।

मेरी मुस्कान और फैल गई।

साथ में बैठी एक बच्ची को भूख लगी तो उसकी मम्मी ने उसे डार्क फेंटसी बिस्कुट का एक पैकेट दिया। मैं भी डार्क फेंटसी मिलने पर ऐसे ही खुश होती हूँ, उस छोटी बच्ची की तरह, फिलहाल मैं उसे देख कर खुश थी।

वो लिक करो, ट्विस्ट करो की तर्ज़ पर बिस्कुट खा रही थी। बचपन भोला तो होता ही है, पर उसकी ऐसी अठखेलियाँ उसे सीधा दिल में उतार देती हैं... कभी न भूलने के लिए।

वो एक-एक करके अपने बिस्कुट खा रही थी। अभी दो-तीन ही खाए थे कि पैकेट हाथ से छूट गया और सारे बिस्कुट नीचे जमीन पर। मुझे लगा मैं छोटी होती तो पक्का रो देती और आस-पास के लोगों की नज़र बचा कर एक तो उठा ही लेती।

खैर, बच्ची रोई तो नहीं पर हाँ जमीन से उठाने का लालच रोक नहीं पाई।

तभी मम्मी की जोरदार आवाज़ आई, "नो पूरबी! जमीन पे गिरी चीज़ नहीं उठाते। फर्श गन्दा होता है न बेटा। कितने कीटाणु होंगे इनमें।"

बेचारी  पूरबी। उसका मुँह उतर गया। उसने अपना हाथ वहीँ रोक लिया। मुझे लगा मेट्रो आख़िरकार गन्दी हो ही गई। पर मुझे हैरान करती हुई उसकी माँ उठी और सारे गिरे हुए बिस्कुट उठा लिए और पैकेट मैं डाल दिए।

पूरबी ने कहा, "जब खाने ही नहीं हैं तो उठाये क्यों?"

"क्योंकि हम मेट्रो को गन्दा तो नहीं कर सकते। हमने गन्दा किया है तो उठाना भी तो हमें ही पड़ेगा," माँ ने कहा।

हैरान थी मैं अपनी धारणाओं और गलत भ्रांतियों को ले कर। और आज तो दिल्ली को ले कर मेरे मन में सिर्फ ख़ुशी और गर्व का एहसास था।

मेरा स्टेशन आ गया था और मैं मेरी दिल्ली के नए रूप को जान कर खुश थी, जहाँ दया भी थी, इसको साफ़ रखने की चाह थी, अपनापन था।

मैं उठी तो देखा पूरबी और उसकी माँ भी साथ में उठ गई। मैंने प्यार से उसके गाल छुए। वो चिपक गई अपनी माँ के साथ। मैं हंस के आगे बढ़ गई। वो लोग मेरे पीछे- पीछे थे। मैं उतर कर ऑटो का इंतजार  करने लगी। देखा दोनों माँ-बेटी आ रही थी और माँ ने हाथ में पकड़ा लिफाफा सीढियो पर बैठी एक भिखारन को पकड़ा दिया, जिसके हाथ में एक बच्चा था। बच्चा बिस्कुट पाकर खुश हो गया और फटाफट खाने लग गया। माँ भी उनको दुआएं देने लगी।

बेटी ने कुछ कहा नहीं बस सर उठा कर अपनी माँ को देखा। मानों पूछ रही हो मम्मी कीटाणु...

और मुझे लगा कि अचानक मीठा खाने के बाद मैंने कड़वी दवाई पी ली हो...

© उपमा डागा २०१२

बुधवार, 14 नवंबर 2012

देश दंश

रविवार, दिवाली, धनतेरस... सफाई, शॉपिंग और गिफ्ट्स।

यही है दिल्ली का मूड आज के दिन। तो उसी मूड से सरोबार हम भी अपने मेट्रोस्तान की ओर रवाना हो गए। मस्ती और काम का संगम। स्टेशन पर पहुंची तो देखा बस इक्का दुक्का लोग बैठे ही थे। लगा लोग आज छुट्टी के मूड में हैं। पर गाड़ी आने में पूरे छः मिनट थे। फिर सोचा यहाँ तो एक मिनट में सरकारें बदल जाती हैं छः मिनटों में तो पता नहीं क्या हो जाये।

और सही था शायद ... फिर से भर गया स्टेशन पांच मिनट में। 

डिब्बे के अन्दर भी ऐसा ही माहौल था। महिलाओं के भारी-भारी सूट मैचिंग जेवेलरी, सजे धजे बच्चे। देख के लगा कि हाँ मशीन बनते इंसान में अभी भी एहसास, जोश कहीं बाकी है। लोगों के हाथों में उपहार के बड़े-बड़े पैकेट थे। मतलब या तो किसी से मिल के आ रहे हैं, या किसी से मिलने जा रहे हैं। अच्छा लगा देख के कि मिलने जुलने की रवायत अभी भी कायम है।

तभी एक लड़की का मोबाइल बजा। 

"कहाँ थी तुम? कब से तुम्हारा फ़ोन ट्राय कर रही थी। आउट ऑफ़ रीच आ रहा था।"

"कुछ नहीं, सरोजनी तक जा रही थी, शौपिंग करने।" 

"अरे बस कुछ टॉप और सूट लेने थे। ऑफिस पहनने वाले सारे कपड़े ख़तम हो गए हैं।"

इससे आगे मैं कुछ सुन नहीं पाई। इसी बात पे मुझे महिलाओं के बारे में कही एक बात और अपनी एक बहुत ही प्यारी सहेली याद आ गई।

कहते हैं कि कपड़ों की अलमारी के आगे आधा घंटा खड़े होने के बाद भी अक्सर उन्हें पहनने के लिए कुछ नहीं मिलता। मुझे पता है कि मैं भी उसी बिरादरी से ताल्लुक रखती हूँ और इस राज को सरेआम करने के लिए मुझे बहुत सी गालियाँ पड़ने वाली हैं। पर खुबसूरत दिखना और उसपे फोकस करना हर एक के बस की बात भी तो नहीं है। इसी की जीती जागती मिसाल है मेरी वो सखी जिसकी वार्डरोब हर दो महीने बाद खाली हो जाती है।

राजीव चौक आ चुका था और मैं मुस्कुराते हुए वहां उतर कर अगली गाड़ी के इंतजार में खड़ी हो गयी।

तभी पीछे से आवाज़ आई, "देख मेट्रो की हीरोइनें"।

हँसती हुई आवाज़ ने मेरे आगे खड़ी दो महिलाओं की तरफ इशारा किया। देखने से अफ्रीका के किसी देश की लग रही थी। बाल अजीब से पर्पल और गोल्डन कलर के थे। फिर भी उनके बारे में यूं अशोभनीय बातें सुन कर अच्छा नहीं लगा।

"पता है दोनों ने ड्रग्स ले रखी हैं।"

उसने अपना विशलेषण जारी रखा। मैं हैरान थी कि यह लड़की यहाँ क्या कर रही है इसे तो अन्तराष्ट्रीय ओलिंपिक संघ के डोप टेस्ट के बोर्ड में होना चहिये जो खिलाडियों के ड्रग टेस्ट महज उनका चेहरा देख कर कर पाते। इससे पैसा और समय दोनों की बचत होती और दुनिया लांस आर्मस्ट्रांग को दस सालों तक सर आँखों पे बिठाने के पाप से बच जाती।  

उसकी विशेष टिप्पणियाँ जारी थी। 

"हेरोइन या स्मैक। पक्का।"

उसके साथ दो या तीन लड़कियां थी। जिनको वो अपना ज्ञान बाँट रही थी।

"आँखे देखी हैं इनकी... कैसे चढ़ी हुई है।"

उन दोनों लड़कियों ने मुड़ कर पीछे देखा। मानों कुछ जवाब लिए बैठी हो पर कुछ सोच कर चुप हो गई हों। पता नहीं उनको सबसे जयादा क्या बुरा लगा पर एक दर्द था चेहरे पर। वो विदेशी होने का था या कहीं इतनी देर रहने के बाद भी अजनबी बने रहने का... पता नहीं चला पर हां अपने देश की याद बहुत आई होगी उनको। और मुझे याद आई महात्मा गाँधी की जिन्होंने अफ्रीका के ही एक देश से रंगभेद के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की थी और आज बापू के ही देश में उनके साथ यह व्यवहार हो रहा था।  

इतने में मेट्रो आ गई और उन्हीं लड़कियों का ग्रुप जिनकी तरफ देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी, मुझे धक्का मारकर, पैरों को कुचलता हुआ गाड़ी के अन्दर घुस गया। सभ्यता और होशो-हवास की मिसाल उन लडकियों का रवैया देख कर मैं हैरान थी। मैं लड़खड़ा कर शायद प्लेटफ़ॉर्म पर ही रह जाती अगर उसी समय एक हाथ ने मुझे अन्दर न खींचा होता। मैंने सर उठा के देखा तो एक दूध सी गोरी महिला, जो की विदेशी थी, ने  मुझे थामा हुआ था। मैंने उसे धन्यवाद् दिया। वो मुस्करा के बोली, "आप ठीक हो?" मैंने ख़ुशी मिश्रित हैरानी से उसे देखते हुए हाँ में सर हिलाया।

खड़े होने के लिए अपनी जगह बनाते बनाते मैंने एक बच्चे की आवाज़ सुनी, "मम्मी व्हेन विल वी रीच?"

उसकी प्यारी सी मम्मी ने एक अदा से कहा, "अनदर टेन मिनट्स"। वो खूब लम्बी सी और सुन्दर थी। इस बात का गुमान भी उसके चेहरे पे था।

तभी उसकी बेटी बोली, "मम्मी मैं थक गई हूँ।"

उस संभ्रांत सी दिखने वाली महिला ने लगभग डांटते हुए उसे कहा, "कांट यू स्पीक इन इंग्लिश"।

मैं उतर गई पटेल चौक पर। सोचने का टाइम नहीं था।

वापसी में मेट्रो में खड़े हो कर दिल्ली देख रही थी जो रोशनियों से सजी नई नवेली दुल्हन की तरह लग रही थी। चारों तरफ जमगाहट थी... पर कुछ खालीपन सा था अब... पर वो विदेशियों के साथ हुए उस सौतेले व्यवहार की वजह से था या अपनी भाषा के साथ हुए अनादर से... यह मैं समझ नहीं पाई।

© उपमा डागा २०१२

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

आईना


कभी-कभी सोचती हूँ जब हम किसी काम को नया नया शुरू करते हैं तो सब कुछ कितना अच्छा अच्छा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ रूटीन, रोजमर्रा-सा लगने लगता है।

शायद यही हाल जिन्दगी का भी है। बचपन में बच्चे का पहली बार माँ-पापा कहना कैसे गुदगुदा देता है। उसकी एक एक हरकत पर बस मन करता है सब कुछ संजोते जाओ। पहला सेंटेंस, पहली बार स्कूल, पहली खिलखिलाहट, पहला खाना। ऐसा लगता है सब कुछ मुट्ठी में बंद कर लो। वही बच्चा बड़ा हो कर जब बात-बात में मम्मी पापा कहता है तो लगता है अब तो कोई काम खुद से करना सीख लो। पता नहीं कब बड़े होगे।

नई-नई शादी, नए-नए रिश्ते, पति-पत्नी। हाथों में हाथ, यूं लगता है जिन्दगी सिर्फ प्यार करने के लिए बनी है। लोगों की भीड़ में भी हल्का  सा स्पर्श, जीवनसाथी के लिए कितने एहसास एक साथ आ जाते हैं। फिर धीरे-धीरे वास्तविकता का धरातल।

गलत कुछ भी नहीं है। न नयापन, न प्यार, न वास्तविकता । बस जिम्मेवारियां—प्यार को हौले से परे कर अपने लिए जगह ले लेती है। दोनों साथ-साथ चले तो खुशियाँ, हँसी, मुस्कुराहटें, दस्तक देती रहती हैं पर अगर प्यार परे होने की जगह अपनी जगह से हट ही जाये तो बस निभाते चले जाते हैं हम—सब कुछ।

आप सोच रहे होंगे यह ऐसा क्या आ गया मेट्रोस्तान में। तो मुझे लगा कि मैं भी कहीं मेट्रो में सिर्फ चढ़ने उतरने तो नहीं लगी? मुझे यकायक कहानियां दिखनी बंद क्यों हो गई? मैं भी क्या भीड़ का हिस्सा बन गई हूँ? या फिर कहीं मैं खो तो नहीं गई?

बस यही सोचते सोचते मेट्रो में चढ़ी। आजकल शाम को ही रात का सा गुमान होने लगा है। कहते हैं कि मौसम बदल रहा है। क्या मैं भी...

खैर इन सब सोचों का तो कोई अंत ही नहीं है शायद।

डिब्बों में लाइट जली हुई थी। मैं पटेल चौंक से चढ़ी। बिल्कुल दरवाजे के पास थी। अचानक मैंने देखा मेट्रो के दरवाज़े में मैं खुद को देख रही हूँ। लगा मेट्रोस्तान आज मुझे आईना दिखने के मूड में है। हल्की सी मुस्कान चेहरे पे आई। पर इस आईने में मैं अकेली नहीं थी, मेरे पीछे एक भीड़ थी। भीड़ में चेहरे यूं ही अपना चेहरा देख रहे थे तो कुछेक को दूसरों का चेहरा पढने में ज्यादा मजा आ रहा था। कुछ बस परेशां से थे—जिन्दगी से, भीड़ से या खुद से। और मैं बस देख रही थी कि आज यह आईना कहाँ तक और क्या क्या दिखाता है।

ज्यादा सोचने का वक़्त न देते हुए मेट्रो ने अपने कपाट खोल दिए मानो कह रहे हों कि अब आप दूसरी मेट्रो में जगह बनाओ किसी दूसरी भीड़ के बीच में।

इतने दिन हो गए पर अभी तक मैं राजीव चौक से पूरी तरह से परीचित नहीं हुई। कभी तो सामने ही अपना प्लेटफ़ॉर्म दिख जाता, तो कभी लगता फिर किसी अंजानी जगह पर पहुँच गई हूँ। खैर भला हो उन साइन बोर्ड्स का, जो ऐसे समय में मेरे लिए रामबाण का काम करते हैं।

इन्हीं सब का सहारा लेते हुए मैं बढ़ गई—सफर को अंजाम तक पहुँचाने के लिए।

खड़े-खड़े डिब्बे में नज़र डाली तो एक लड़की बड़ी सी किताब लिए बैठी थी। मुँह में बुदबुदा कर पढ़ रही थी। बिना आस पास के लोगों की तरफ ध्यान दिए, वो बस पढने में बिज़ी थी। शायद एग्जाम आने वाले थे। अचानक कॉलेज का जमाना याद आ गया। मैं भी यूं ही पढ़ा करती थी। जब कुछ समझ में नहीं आता तो दोबारा, तिबारा पढ़ के खुद को समझाते हुए खुद की ही टीचर बन जाती थी मैं। उस लड़की के चेहरे पर धीरे-धीरे संतुष्टि सी आ रही थी। या तो उसको समझ आ गया था या सलेबस पूरा हो गया था। एक हूक सी उठी उठी मन में—आह! मेरा कॉलेज। और वो एक परछाई की तरह उतर गई, अपनी किताबें समेट कर।

और उसी स्टेशन से खिलखिलाती हुई चूड़ा पहने एक नवयौवना ने एंट्री ली। नई-नई शादी का खुमार  उसकी आँखों में था। फ़ोन पे बात करते हुए उसे किसी का ध्यान नहीं था। सबके बीच में भी उसकी दुनिया सबसे अलग थी। कभी धीरे से हँस देती तो कभी शरमा जाती। दूर थी मुझसे, पर बहुत कुछ याद दिला गई।

तभी मेरे पीछे बैठी एक महिला के फ़ोन की घंटी बजी। गर्दन नहीं घूमी पर ध्यान उस तरफ चला गया। फ़ोन उठाते ही उसने कहा।

"हाँ बेटा। बोलो"

सब एक तरफ का वार्तालाप था, पर दूसरी तरफ की बात बिना सुने भी समझ में आ रही थी।

"आ रही हूँ बेटा।"

"इन्द्रप्रस्थ।"

"अब गाड़ी जितनी देर में पहुंचाएगी।"

"अच्छा! पापा आ भी गए?"

"सर में दर्द हो रहा है उनके?"

"बेटा, मुझे आने में तो आधा घंटा लग जायेगा। तुम उन के लिए चाय बना दो। और हाँ चाय दे के मुझे फ़ोन जरूर कर देना। मैं बस पहुँच ही रही हूँ।"

न चाहते हुए भी गर्दन घुमा कर देख लिया। कुछ बैचेन सी हो गई थी वो। और अब उसका ध्यान सिर्फ घड़ी पर था। मानों बार-बार घडी देखने से गंतव्य जल्दी आ जाएगा।

जिम्मेवारियां—यही एक शब्द मेरे दिमाग में आया उस समय।

पर यह आधिकारों और जिम्मेवारियों का जो सामन्जस्य है, यही शायद जिन्दगी को मीठा, नमकीन सा बनाता है।

लक्ष्मी नगर आ गया था। एक बूढी आंटी और एक १८-२० साल की लड़की ने सामने से प्रवेश किया। लड़की का मुँह उतरा हुआ था और आंटी उसे कुछ कहती हुई अन्दर आ रही थी।

"वो गुस्से में थी, मीनू। इसलिए ऐसा कहा उन्होंने। और थोड़ी गलती तुम्हारी भी तो थी।"

"पर नानी। वो हर बार ऐसा ही करती हैं। मेरी बात सुनने से पहले ही डाँटने लगती हैं।  शी नेवर अंडरस्टैंड्स माई पॉइंट," लड़की ने लगभग रोते हुए कहा।

एक लड़की ने आंटी को सीट दे दी और पोती हेंडल पकड़ कर खड़ी हो गई।

"ठीक है। मैं उससे भी बात करूंगी पर तुम तो..."

मैं दरवाज़े तक आते-आते इतना ही सुन पाई, मेरा प्रीत विहार जो आ गया था।

लगा आईना तो देखा जिसमें सिर्फ चेहरे ही तो अलग थे, या यूं कह लीजिए भीड़ में से कोई कोई चेहरा निकल के बस उम्र के अलग अलग दौर को छूता हुआ सा निकल गया, इक अलग सी शक्ल लिए।

वाह रे मेरे मेट्रोस्तान! आईना भी दिखाते हो तो किसी और ही के भेस में।

© उपमा डागा २०१२

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

एकांत

हमारी जिंदगी में चारों तरफ इतनी कहानियां बिखरी पड़ी हैं कि अगर पढ़ने लगो तो जिंदगी ही  ख़त्म  हो जाए, पर कहानी चलती रहे। और अगर न देखो तो बिना कुछ देखे सुने पूरी जिंदगी कट जाये।

मुझे  भी ऐसी कई कहानियां मिलती हैं—रोज। कुछ पूरी, कुछ अधूरी, कुछ धीरे-धीरे आगे बढ़ती  हुई और कुछ अपना अंत तलाशती हुई।

शायद इनमें से कोई कहानी आपके आस पास भी घट रही हो या फिर आप ही की हो।

वही मेट्रो, वही लेडीज़ कम्पार्टमेंट, पर आज रोज के मुकाबले भीड़ कम थी या मेरे आज के राशि फल में कुछ अच्छा लिखा था। पहले सांस लेते हुए खड़े होने की जगह, फिर दो स्टॉप के बाद बैठने के लिए सीट। आज तो मेरे सितारे बुलंदी पर थे। सीट पर बैठते ही एक नजर डिब्बे में घुमाई। सामने सारी कॉलेज की लड़कियाँ दो तीन के झुंड में बैठी बातें करने में बिजी थी। मेरी साथ वाली सीट में बैठी लड़की कानों में ईयर फ़ोन लगा कर बैठी थी। मानो दुनिया में रह कर उससे निर्लेप हो कर रहने के  लिए ही उसने जन्म लिया हो। दूसरी तरफ बैठी लड़की सर नीचे किये सो रही थी, या शायद तबियत ठीक नहीं थी उसकी। पर साथ बैठी उसकी सहेली बीच बीच में उसके सर पे हाथ फेर रही थी। मुझे एयरटेल का वो ऐड याद आ गया—क्योंकि हर एक फ्रेंड जरूरी होता है, और साथ ही अपने गिने चुने दोस्त।

इतने में एक चार पांच साल की बच्ची अपनी सीट से उठ कर ट्रेन में घूमने लगी। मेरे अंदर की छिपी हुई टीचर ने कहा उसको चोट लगेगी डांट कर बिठा दो पर किसी तरह मैंने उसको यह कह के चुप करवा दिया कि उसकी माँ साथ है संभाल लेगी। वो बच्ची कविता सुना रही थी और अपने प्रश्नों के पुलिंदों में से बहुत से सवाल पूछ रही थी। पर उसकी माँ बिलकुल शांत बैठी थी, बिना किसी एहसास के, न शैतानियों पे गुस्सा, न भोलेपन पे प्यार।

मैं हैरान थी कि ऐसे कैसे कर रही है वो। तभी मेरा ध्यान उसके हाथ में पकड़े फोन पर गया। उसकी उँगलियाँ मैसेज टाइप करती थी और एक सरसरी नजर डिब्बे में डाल लेती थी। इतने में जवाब आ जाता शायद और उसकी उदासी की रेखा और गहरी हो जाती। मुझे जगजीत सिंह की वो ग़ज़ल याद आ
गई—बहुत रोई हुई लगती हैं आँखें, मेरी ख़ातिर जरा काजल लगा लो। शायर ने शायद ऐसा ही सूनापन देख कर यह शेर लिखा होगा। बीच-बीच में तो वो मोबाइल की टोन से भी घबरा जाती थी। कभी-कभी हम लोगों से कुछ इस क़दर घिरे होते हैं कि अपनी ही आवाज़ हमें शोर लगने लगती है।

ऐसा लग रहा था कि वो थोड़ा एकांत चाहती थी जो चाहने से भी उसे नहीं मिल रहा था। साथ आई बेटी भी उसे नहीं छोड़ पा रही थी। क्योंकि मन की इन गुत्थियों की थाह जब हम समझदार लोग ही नहीं लगा पाते तो बच्चे तो फिर बच्चे हैं।

"मम्मा, आप इतनी चुप क्यों हो," बेटी ने पूछा।

"कुछ नहीं," उसने छोटा सा जवाब दिया।

"तो फिर आप मुझसे बातें क्यों नहीं कर रही," बेटी ने फिर से कहा।

"कर तो रही हूँ।"

"हम नानी के घर क्यों जा रहे हैं," बेटी बोली।

वो बिल्कुल चुप।

"पापा कब
आएँगे?" 

फिर कोई जवाब नहीं।

मुझे इस आधी अधूरी सी बात से कुछ गंभीरता का एहसास हुआ। मैंने बच्ची को अपने पास बुलाया। उसका नाम पूछा तो उसने कहा, "अद्विता। और आपका?" मानो मेरे सवाल खत्म होने का ही इंतजार रही थी।" मैंने कहा: "उपमा"।

"यह कैसा नाम है," उसने भोलेपन से पूछा। मैं अपनी हँसी रोक नहीं पाई और पूछ बैठी, "क्यों क्या ख़राबी है इसमें?"

"अरे कल को मेरी मम्मी मुझे मैगी या पास्ता बुलाएगी तो मुझे तो भूख ही लग जाएगी," उसने इठलाते हुए जवाब दिया।

मेरे नाम का विश्लेषण करते-करते वो मुझसे ऐसे बातें करने लगी जैसे मेरी जन्मों की बिछड़ी सहेली मुझसे मिली हो। उसने मेरे घर परिवार से ले कर नौकरी तक हर चीज का विवरण ले लिया था।

बच्ची का खेलना बोलना सब जारी था। और माँ को जो थोड़ा अकेलापन चाहिए था वो भी मिल रहा था। हम दोनों को पता था कि हम बस इस क्षणिक सपोर्ट के अलावा एक दूसरे को कुछ नहीं दे सकते। और शायद उसको उस समय सबसे ज्यादा उसी चीज की जरूरत थी।

मेरा स्टेशन आने वाला था। बच्ची फिर माँ के पास पहुंची। "मम्मा ! आपका फेवरेट कलर कौन सा है?" माँ थोड़ा संभल गई थी। मुस्कुराने की असफल कोशिश करती हुई बोली "वाईट"। बच्ची ने नजर दौड़ाई और डिब्बे में लगे एक स्टीकर पे उँगली रखते हुए कहा, "यह वाला मम्मा"। मैंने उठते हुए कहा, ''वेरी गुड! आपको तो कलर भी आते हैं।" उसने बड़े गर्व से अपनी माँ की तरफ देखा। माँ ने बिन बोले मेरी तरफ। मानो कह रही हो इतनी देर के लिए धन्यवाद। मैंने एक स्माइल दी, यानी मेरा जवाब—यही तक का साथ था।

यह खामोशी भी बिना कहे कैसे अपनी जबां समझ लेती है, यह आज तक मेरी भी समझ में नहीं आया।

खैर, उतरते हुए फिर मुड़ के उसकी तरफ देखा बिना बोले यह कहने के लिए कि ईश्वर करे तुम्हारी उदासी जल्दी दूर हो सके। लगा उसकी उदास आँखें मेरे पीछे आ रही हैं—शुक्रिया कहने शायद...

© उपमा डागा २०१२

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

जूनून

आज कोई जल्दी, कोई हड़बड़ी नहीं थी। घर से समय से निकली, बिना भागते दौड़ते हुए। और मेट्रो स्टेशन तक की जब लिफ्ट मिल जाती है तो लगता है मेरे सफ़र की लगभग आधी दुश्वारियां खत्म हो गई हों।

प्लेटफ़ॉर्म की सीढ़ियां चढ़ रही थी तो देखा मेट्रो आ गई। लोग भाग के चल दिए चढ़ने। मैंने अपने लिए मेट्रो की एक नियमावली तैयार कर ली थी। अगर आप टाइम से चल रहे हों और मेट्रो में भीड़ ज्यादा है तो उसे निकल जाने दो। तीन से चार मिनट बाद अगली मेट्रो आ जाएगी जो कम भीड़ वाली होगी।

तो मैं भागी नहीं, बस लोगो को देखती रही, जो मेरी नियमावली को नकारते हुए या अंजान होते हुए घर से टाइम पर नहीं निकले थे।

एक अंकल, आंटी मेरे आगे-आगे थे। अंकल आंटी को जल्दी चलने को कह रहे थे। आंटी मानो भीड़ वाली मेट्रो में चढ़ने को तैयार नहीं थी, पर अंकल को मना भी नहीं कर पा रही थी इसलिए चल रही थी। जब तक दरवाज़े तक पहुँचती, गाड़ी ने अपने स्वचालित दरवाज़े को नमस्कार की मुद्रा में बंद कर दिया। मानो कह रही हो दौड़ने के लिए धन्यावाद।

अंकल डांटने लगे, "तुम्हारे कारण गाड़ी चली गई। थोड़ा जल्दी नहीं चल सकती थी..."

मैं उनके बिलकुल पास से गुज़रते हुए थोड़ा आगे निकल आई। पीछे मुड़ के आंटी की तरफ देखा तो पाया कि उन्होंने जवाब में अंकल को कुछ नहीं कहा था पर एक छुपी हुई मुस्कान थी उनके चेहरे पे जैसे कह रही हो, ''अपनी बात मनवाने के लिए रुठना या जिद करना जरूरी तो नहीं।" मैं मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई, लेडीज कम्पार्टमेंट की तरफ।

चार मिनट बाद मेट्रो आई। पहले की अपेक्षा खाली थी। मतलब मेरी नियम सही थे। जगह मिली और मैं मन ही मन मेट्रोस्तान की अपनी नियमावली पर गर्व करने लगी।

लोग अभी चढ़ ही रहे थे, इतने में दो- तीन कॉलेज की लड़कियाँ आई और एक नज़र डिब्बे में दौड़ाई। कहीं खाली सीट न देख कर वहीं दरवाज़े के पास आलथी पालथी मार कर बैठ गई। मानो कह रही हो, "इस सीट से तो हमें कोई नहीं उठा सकता।" सही है! शायद आज की पीढ़ी में जो बिंदासपन है वो हमारी पीढ़ी से थोड़ा ज्यादा है। पर यह वाला अच्छा लगा।

एक कोशिश मैंने और की कि देखूं कितनी औरतों, लड़कियों के पास फ़ोन हैं और उनमें से कितनों ने इअर फ़ोन लगा रखे हैं। पर लगा यह डाटा इकट्ठा करने के लिए सिर्फ मेरी क्षमता कम पड़ जाएँगी। एक सरसरी नज़र मारने से पता चला फ़ोन तो मेरे हिसाब से सब के पास थे और ७० प्रतिशत ने इअर फ़ोन लगा रखा था। जैसे कह रही हो बाहर के शोर से अच्छा है कुछ ऐसा सुनो कि जो कानों को भी अच्छा लगे। और शायद यही वज़ह है कि आजकल के लेडीज कम्पार्टमेंट में उतना शोर नहीं होता।

खैर! गाड़ी बढ़ते हुए मंडी हाउस पहुंची। वहाँ से एक व्यक्ति, जिसने आँखों पर काला चश्मा चढ़ा रखा था और हाथों में छड़ी पकड़ी हुई थी, और हम लोग बोलचाल की भाषा में जिसे अँधा कहते हैं, को सहारा देते हुए दूसरे व्यक्ति ने उसे अंदर छोड़ दिया। किसी भी महिला ने उसके डिब्बे में दाखिल होने पर कोई आपत्ति नहीं की। मेरे सामने वाली लड़की ने उठ कर अपनी सीट उसको दी। लेकिन उस व्यक्ति ने यह कह कर मना कर दिया कि उसे पास में ही जाना है।

अंगहीनता के बावजूद उसने खुद को कमजोर साबित नहीं होने दिया और एक मुस्कान के साथ अपनी छड़ी की मदद से खड़ा हो गया।

तभी मैंने देखा कि वो कुछ गुनगुना रहा है। हाथों को ताल में कभी ऊपर कभी नीचे ले जा रहा था। बिना किसी की परवाह किये।

देख कर खुद पे शर्मिंदगी सी हुई। लगा, यह है जूनून। हम पूर्ण होते हुए भी कितने पल सिर्फ अपने जुनून के लिए जीते हैं। जबकि वो जो हमारी नज़र में अपूर्ण है, सिर्फ अपने जुनून के लिए जी रहा है, बिना लोगों की परवाह किये, पूरे विश्वास के साथ।

राजीव चौक आने की घोषणा सुन कर उसने पूछा कि राजीव चौक ही है न। जैसे कह रहा हो मुझे तो पता है पर तुम लोगों को लगे न कि मैंने पूछा नहीं।

हम दोनों ही राजीव चौक उतरे। वो गाते हुए और मैं कुछ सोचते हुए।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

मेट्रोस्तान

कितने साल हो गए ठीक से याद नहीं। शायद सात या आठ।

पिछले आठ सालों से कुछ किया नहीं है, ऐसा नहीं है। पर लोगों के शब्द  कोष के पन्ने पलटें तो उस काम की परिभाषा उसमें नहीं मिलेगी। "अच्छा! घर पे ही रहते हो। फिर तो खूब समय होता होगा आपके पास।" या फिर "हाउ लकी! यार हम तो छुट्टी के लिए तरस जाते हैं।"

खैर मैंने अपनी परिभाषाएं कभी लोगों की किताबों में खोजने की कोशिश नहीं की। बढते हुए बच्चे, उनकी जरूरतें, उनका मीठा सा बचपन, उनकी मान मुनहार, उनका लाड़। सब एक-एक पल जिया है मैंने। उनका विश्वास कि मम्मी है हमारे पास
हर पल।

मैं यह बिलकुल नहीं कहती कि जो काम काजी महिलाएं हैं वो बच्चों के पास नहीं होती। बिलकुल होती हैं। उनकी कार्यक्षमता, उनकी दोहरी भूमिका को मैं हमेशा सलाम करती हूँ।

यह समय कैसे निकला पता ही नहीं चला। जब मेरे घुटनों चलते, तुतलाते बच्चे, चलने और भागने लगे और इस बड़ी सी दुनिया में खुद को सहज महसूस करने लगे तो लगा कि अब कुछ समय निकला जा सकता है कुछ करने का, कुछ ऐसा काम जो अभी तक बैक सीट पर था। ऐसे में पता चला कि आकशवाणी में न्यूज़ कास्टर  का चयन होने वाला है। आवेदन जमा कराने का आखरी दिन था। बस किसी तरह भाग-दौड़ कर फॉर्म जमा करवा दिया। टेस्ट दिया, पास हो गए। फिर इंटरव्यू और सेलेक्शन।

मेरे साथ सब लोग खुश थे—पति, बच्चे, माँ, दोस्त। उन्हें ख़ुशी थी मेरी लोगों के परिभाषित शब्द कोष  में आने की और मुझे कुछ नया करने की।

पहले कुछ दिन ट्रेनिंग के लिए जाना था। तो पहले दिन निकल पड़ी मैं भगवन का नाम ले कर वापिस भागती दौड़ती दिल्ली की भीड़ भरी सड़कों पर। अपना रूट बनाया तो घर से बस स्टॉप, फिर बस से प्रीत विहार मेट्रो स्टेशन। मेट्रो से राजीव चौंक, फिर राजीव चौंक से पटेल चौंक और फिर हमारा आकाशवाणी भवन।

पहला दिन और लम्बा चौड़ा रास्ता। सबने कहा कि ऑटो या टैक्सी ले लेना पर मुझे इस सिमटी-सिमटी जिन्दगी से ही तो बाहर निकलना था। बच्चों को हमेशा कहती थी कि हमें जिन्दगी के हर रूप के लिए तैयार रहना चाहिए। हर तरह की आदत होनी चाहिए। तो रोज ऑटो से जाना मुश्किल नहीं था पर शायद, फिर मैंने जो सिखाया था, वो सिर्फ किताबी होता। और ऑटो में जिन्दगी नहीं  चलती, सिर्फ मूक बैठे हम होते हैं। लोगों को अगर जानना, पढ़ना है तो किसी पब्लिक ट्रासपोर्ट से जाओ। ऐसा मेरा मानना है।

तो एक नए रस्ते की तरफ कदम बढ़ाने को मैं भी चल पड़ी।

बस स्टॉप पर पहुँचने के पाँच मिनट बाद बस आई। खचाखच भरी हुई। घड़ी पर नज़र डाली और अपने सिद्धांतों पर भी। किसी पर भी पुनर्विचार करने का टाइम नहीं था। बस में बस चढ़ गई किसी तरह। दो स्टॉप के बाद ही मेट्रो स्टेशन था, पर लगा बेकार ही नहा धो कर आये। पसीने से तरबतर।

दिमाग में कितने चेहरे घूम गए—मुस्कुराते हुए—मानों कह रहे हो "हमने कहा था न"।

पर फिलहाल समय नहीं था उनके कटाक्षों का जवाब देने का। तो जी बस हम मेट्रो में भी चढ़ गए। हमारे शुभ चिंतकों ने तगीद की थी की लेडीज़ कम्पार्टमेंट में ही चढ़ना। सो हमने अक्षरश पालन किया उस बात का। डिब्बे में चढ़ के लगा मानों अचानक लड़कियों, औरतों की संख्या कुछ बढ़ सी गई है। सब समाए जा रही थी उसी एक डिब्बे में। ऐसा लग रहा था मेरे चारों ओर सबने घेराबंदी की हुई है। "बेचारी बड़े दिनों बाद आई है, कहीं गिर न जाये।" वि आइ पी ट्रीटमेंट।

खैर एक फायदा हुआ मेट्रो  का—दोबारा नहाना नहीं पड़ा और आख़िरकार हम राजीव चौंक पहुँच गए।

फ्लेशबैक का सीन दिखाने के लिए पुरानी फिल्मों में हीरो या हीरोइन को सेंटर में रख कर डायरेक्टर तेज-तेज कैमरा घुमाता था, वैसे ही कुछ हाल मेरा था।

इतना बड़ा स्टेशन, लोगों से ठसाठस भरा हुआ और लोग एक स्पीड से, नपे तुले क़दमों से, निर्धारित दिश में बस बढ़ते जा रहे थे।

हमने भी चारों तरफ नज़र  दौड़ाई और संकेत चिन्हों को फ़ॉलो करते हुए बढ़ना शुरू हो गए अपने गंतव्य की ओर।

आखिरी पड़ाव चूँकि कुछ ही पलों का था तो हम जल्द ही वहां पहुँच गए। फिर देखते, ढूंढते हुए, एग्जिट की तरफ बड़े।

मेट्रो स्टेशन के बाहर पहुँच कर मैंने एक विजयी मुस्कान के साथ स्टेशन से विदा ली और खुद को कहा, "
मेट्रोस्तान में आपका स्वागत है उपमा जी। अब आपको इसकी रोजाना डोज़ मिलती रहेगी।"

और फिर जिन्दगी चल पड़ी मेट्रो रफ्तार से।

© उपमा डागा
२०१२