कभी-कभी सोचती हूँ जब हम किसी काम को नया नया शुरू करते हैं तो सब कुछ कितना अच्छा अच्छा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ रूटीन, रोजमर्रा-सा लगने लगता है।
शायद यही हाल जिन्दगी का भी है। बचपन में बच्चे का पहली बार माँ-पापा कहना कैसे गुदगुदा देता है। उसकी एक एक हरकत पर बस मन करता है सब कुछ संजोते जाओ। पहला सेंटेंस, पहली बार स्कूल, पहली खिलखिलाहट, पहला खाना। ऐसा लगता है सब कुछ मुट्ठी में बंद कर लो। वही बच्चा बड़ा हो कर जब बात-बात में मम्मी पापा कहता है तो लगता है अब तो कोई काम खुद से करना सीख लो। पता नहीं कब बड़े होगे।
नई-नई शादी, नए-नए रिश्ते, पति-पत्नी। हाथों में हाथ, यूं लगता है जिन्दगी सिर्फ प्यार करने के लिए बनी है। लोगों की भीड़ में भी हल्का सा स्पर्श, जीवनसाथी के लिए कितने एहसास एक साथ आ जाते हैं। फिर धीरे-धीरे वास्तविकता का धरातल।
गलत कुछ भी नहीं है। न नयापन, न प्यार, न वास्तविकता । बस जिम्मेवारियां—प्यार को हौले से परे कर अपने लिए जगह ले लेती है। दोनों साथ-साथ चले तो खुशियाँ, हँसी, मुस्कुराहटें, दस्तक देती रहती हैं पर अगर प्यार परे होने की जगह अपनी जगह से हट ही जाये तो बस निभाते चले जाते हैं हम—सब कुछ।
आप सोच रहे होंगे यह ऐसा क्या आ गया मेट्रोस्तान में। तो मुझे लगा कि मैं भी कहीं मेट्रो में सिर्फ चढ़ने उतरने तो नहीं लगी? मुझे यकायक कहानियां दिखनी बंद क्यों हो गई? मैं भी क्या भीड़ का हिस्सा बन गई हूँ? या फिर कहीं मैं खो तो नहीं गई?
बस यही सोचते सोचते मेट्रो में चढ़ी। आजकल शाम को ही रात का सा गुमान होने लगा है। कहते हैं कि मौसम बदल रहा है। क्या मैं भी...
खैर इन सब सोचों का तो कोई अंत ही नहीं है शायद।
डिब्बों में लाइट जली हुई थी। मैं पटेल चौंक से चढ़ी। बिल्कुल दरवाजे के पास थी। अचानक मैंने देखा मेट्रो के दरवाज़े में मैं खुद को देख रही हूँ। लगा मेट्रोस्तान आज मुझे आईना दिखने के मूड में है। हल्की सी मुस्कान चेहरे पे आई। पर इस आईने में मैं अकेली नहीं थी, मेरे पीछे एक भीड़ थी। भीड़ में चेहरे यूं ही अपना चेहरा देख रहे थे तो कुछेक को दूसरों का चेहरा पढने में ज्यादा मजा आ रहा था। कुछ बस परेशां से थे—जिन्दगी से, भीड़ से या खुद से। और मैं बस देख रही थी कि आज यह आईना कहाँ तक और क्या क्या दिखाता है।
ज्यादा सोचने का वक़्त न देते हुए मेट्रो ने अपने कपाट खोल दिए मानो कह रहे हों कि अब आप दूसरी मेट्रो में जगह बनाओ किसी दूसरी भीड़ के बीच में।
इतने दिन हो गए पर अभी तक मैं राजीव चौक से पूरी तरह से परीचित नहीं हुई। कभी तो सामने ही अपना प्लेटफ़ॉर्म दिख जाता, तो कभी लगता फिर किसी अंजानी जगह पर पहुँच गई हूँ। खैर भला हो उन साइन बोर्ड्स का, जो ऐसे समय में मेरे लिए रामबाण का काम करते हैं।
इन्हीं सब का सहारा लेते हुए मैं बढ़ गई—सफर को अंजाम तक पहुँचाने के लिए।
खड़े-खड़े डिब्बे में नज़र डाली तो एक लड़की बड़ी सी किताब लिए बैठी थी। मुँह में बुदबुदा कर पढ़ रही थी। बिना आस पास के लोगों की तरफ ध्यान दिए, वो बस पढने में बिज़ी थी। शायद एग्जाम आने वाले थे। अचानक कॉलेज का जमाना याद आ गया। मैं भी यूं ही पढ़ा करती थी। जब कुछ समझ में नहीं आता तो दोबारा, तिबारा पढ़ के खुद को समझाते हुए खुद की ही टीचर बन जाती थी मैं। उस लड़की के चेहरे पर धीरे-धीरे संतुष्टि सी आ रही थी। या तो उसको समझ आ गया था या सलेबस पूरा हो गया था। एक हूक सी उठी उठी मन में—आह! मेरा कॉलेज। और वो एक परछाई की तरह उतर गई, अपनी किताबें समेट कर।
और उसी स्टेशन से खिलखिलाती हुई चूड़ा पहने एक नवयौवना ने एंट्री ली। नई-नई शादी का खुमार उसकी आँखों में था। फ़ोन पे बात करते हुए उसे किसी का ध्यान नहीं था। सबके बीच में भी उसकी दुनिया सबसे अलग थी। कभी धीरे से हँस देती तो कभी शरमा जाती। दूर थी मुझसे, पर बहुत कुछ याद दिला गई।
तभी मेरे पीछे बैठी एक महिला के फ़ोन की घंटी बजी। गर्दन नहीं घूमी पर ध्यान उस तरफ चला गया। फ़ोन उठाते ही उसने कहा।
"हाँ बेटा। बोलो"
सब एक तरफ का वार्तालाप था, पर दूसरी तरफ की बात बिना सुने भी समझ में आ रही थी।
"आ रही हूँ बेटा।"
"इन्द्रप्रस्थ।"
"अब गाड़ी जितनी देर में पहुंचाएगी।"
"अच्छा! पापा आ भी गए?"
"सर में दर्द हो रहा है उनके?"
"बेटा, मुझे आने में तो आधा घंटा लग जायेगा। तुम उन के लिए चाय बना दो। और हाँ चाय दे के मुझे फ़ोन जरूर कर देना। मैं बस पहुँच ही रही हूँ।"
न चाहते हुए भी गर्दन घुमा कर देख लिया। कुछ बैचेन सी हो गई थी वो। और अब उसका ध्यान सिर्फ घड़ी पर था। मानों बार-बार घडी देखने से गंतव्य जल्दी आ जाएगा।
जिम्मेवारियां—यही एक शब्द मेरे दिमाग में आया उस समय।
पर यह आधिकारों और जिम्मेवारियों का जो सामन्जस्य है, यही शायद जिन्दगी को मीठा, नमकीन सा बनाता है।
लक्ष्मी नगर आ गया था। एक बूढी आंटी और एक १८-२० साल की लड़की ने सामने से प्रवेश किया। लड़की का मुँह उतरा हुआ था और आंटी उसे कुछ कहती हुई अन्दर आ रही थी।
"वो गुस्से में थी, मीनू। इसलिए ऐसा कहा उन्होंने। और थोड़ी गलती तुम्हारी भी तो थी।"
"पर नानी। वो हर बार ऐसा ही करती हैं। मेरी बात सुनने से पहले ही डाँटने लगती हैं। शी नेवर अंडरस्टैंड्स माई पॉइंट," लड़की ने लगभग रोते हुए कहा।
एक लड़की ने आंटी को सीट दे दी और पोती हेंडल पकड़ कर खड़ी हो गई।
"ठीक है। मैं उससे भी बात करूंगी पर तुम तो..."
मैं दरवाज़े तक आते-आते इतना ही सुन पाई, मेरा प्रीत विहार जो आ गया था।
लगा आईना तो देखा जिसमें सिर्फ चेहरे ही तो अलग थे, या यूं कह लीजिए भीड़ में से कोई कोई चेहरा निकल के बस उम्र के अलग अलग दौर को छूता हुआ सा निकल गया, इक अलग सी शक्ल लिए।
वाह रे मेरे मेट्रोस्तान! आईना भी दिखाते हो तो किसी और ही के भेस में।
© उपमा डागा २०१२
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