मेट्रो तक पहुँचने के पहले पड़ाव के फलस्वरूप अभी मैं सड़क पे ही चल रही थी। चलना शब्द शायद घड़ी की सुईयां न दिखा पाए तो इसलिए मैं वाक्य थोडा सा बदल देती हूँ। तो मैं लगभग भाग रही थी कि अचानक आसमान में कुछ हरकत सी महसूस हुई। वैसे ज्यादातर हम काम के समय हर प्रकार की हरकतों से अपनी आँखे मूँद लेते हैं, पर आज ऐसा कर नहीं पाई। लगा आसमान पर आज कोई सफ़ेद और काले रंग का ब्रश एक साथ चला रहा है। ध्यान से देखा तो २०-२५ कबूतरों का एक टोला एक साथ पंख फैला कर उड़ान भर रहा था।
जैसे स्कूल जा कर अचानक किसी दिन पता चलता है कि आज सारा दिन पढाई नहीं होगी और बच्चे मस्ती में खेलने लगते हैं। कुछ ऐसी ही मस्ती थी उनकी भी। बार बार इक्कठे उड़ते, थोड़ी दूर तक उड़ान भरते, और वापिस लौट आते किसी घर की छत पर। सफ़ेद और भूरे रंग के कबूतर आसमान में आज अपना ही रंग भरने को उत्सुक थे। दूर तक छू कर आते, वापिस रंग भरते और फिर रंगों का दूसरा स्ट्रोक लगाने को तैयार।
एक पल को लगा पता नहीं कितना समय हो गया है यूं सिर्फ मस्ती में अपने मन से उड़ान भरे हुए। पर फिलहाल इन जज्बातों के लिए समय नहीं था। ऐसा घड़ी देख के याद आया। क़दमों की गति अपने आप तेज हो गई।
थोड़ा आगे बढ़ के मैं अपने मन के पक्षी को पीछे मुड़ने से रोक नहीं पाई। कबूतर अभी भी मस्ती में ऊपर नीचे आ जा रहे थे, पर अब उनके ऊपर एक हवाई जहाज जा रहा था। एक सीध में, एक गति में, एक दिशा में, लगातार। बंधे-बंधे क़दमों से, मानों जरा इधर से उधर हुआ तो रास्ता भटक जायेगा।
कभी-कभी मन और दिमाग कैसे हम एक साथ देख पाते हैं। कबूतर और हवाई जहाज...
मेट्रो स्टेशन पर टिकट काउंटर पर काफी भीड़ थी। मेरा नंबर आने में अभी टाइम था। अचानक जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ आने लगी। मेरे से आगे खड़ा एक युवक टिकट काउंटर पर बैठे कर्मचारी को डांट रहा था। "तुम लोगों को काम करने का तरीका नहीं आता। अब तुम लोगों के चक्कर में मुझे इतनी देर हो गई है। मैं कितनी देर खड़ा रहूँ आप लोगों के कारण," वो युवक पता नहीं क्या क्या बोल गया। अगर शीशे की दीवार बीच में न होती तो वो काउंटर पे बैठे कर्मचारी को पीट ही देता।
वो कर्मचारी शराफत से सुनता रहा। बीच में उसने सफाई देने की कोशिश की लेकिन वह युवक कुछ सुनने को तैयार नहीं था। जब मैंने और मेरे पीछे खड़े एक दो और लोगों ने कारण पूछा तो कर्मचारी ने कहा कि उसके पास खुले पैसे नहीं थे तो उसने उस युवक को इंतजार करने को कहा। जिस पर उसने इतना कुछ सुनाया। खैर इंतजार करने के अलावा कोई चारा दोनों के पास नही था। तो मुश्किल से २ या ३ मिनट बाद उसको बकाया पैसे मिल गए। और वापिस सब कुछ सामान्य।
वही खिड़की, वही कर्मचारी, वही उसके चलते हुए हाथ... सामान्य स्तिथि में खिड़की के उस पार हम सिर्फ हाथ बढ़ाते हैं टिकट या बकाया लेने के लिए। लेकिन इन्हीं कुछ परिस्तिथियों में हम कभी-कभी उनका चेहरा भी देख लेते हैं।
काउंटर के बाद यंत्रवत पर्स एक्सरे मशीन में रखा और मैं अपनी चेकिंग के लिए बॉक्स में पहुंची। देखा चेकिंग करने वाली महिला के हाथ भी मशीन की तरह चल रहे थे। बिना मुस्कराहट के, हर एक की एंट्री पे खड़े होना, चेक करना और बाहर भेजना। पता नहीं कितना लोग होंगे जो मुस्कुरा के इनकी तरफ देखते होंगे। कई लोग तो बड़े एहसान के साथ चेकिंग करवाते हैं।
मुस्कुराहटें इनकी ड्यूटी को कम ज्यादा तो नहीं कर सकती पर शायद काम करना थोड़ा आसान बना दे। तो मैं मुस्कुरा दी सिर्फ उसके लिए। और पता चला वो भी मुस्कुराती है। अच्छा लगा यह जान कर।
पर्स उठाने लगी तो देखा पुलिस की वर्दी में बैठा व्यक्ति लगातार मॉनिटर को देखे जा रहा था। सोचा अगर इसका ध्यान कुछ देर के लिए इस मॉनिटर से हट जाये तो क्या होगा। पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी करने के बाद भी उसके पास गलती की गुंजाईश नहीं थी। तो सलाम है उन सभी को जो हमारी सुरक्षा के लिए दिन रात लगे रहते है, बिना हमारे ध्यान में आये या फिर बिना हमारे देखे...
पूरे स्टेशन पर चंद लोग ही होते हैं जो इत्मीनान से चलते हैं बाकी सब तो समय को पकड़ने के लिए भागते हुए ही नज़र आते हैं। मानों जरा सी उन्होंने रफ़्तार कम की तो समय उन्हें छोड़ कर किसी और के पास चला जाएगा।
इस भागादौड़ी में हम कितने लोगों को अनदेखा करते हुए जाते हैं। कभी उन दो हाथों को जो एक मॉडर्न झाड़ू नुमा वाइपर लिए मेट्रो स्टेशन की सफाई करते रहते हैं। और असल में इस बात को पूरा करते हैं—मेरी दिल्ली, स्वच्छ दिल्ली। कभी रेत की बोरियों के पीछे बैठा वो जवान जो किसी भी आपातकालीन स्तिथि से निपटने के लिए हमेशा बन्दूक ताने तैयार नज़र आता है। कितना अजीब लगता होगा उनको... मानों पेन और पेपर लेकर परीक्षा हाल में बैठे हो, लेकिन प्रश्न पत्र कब मिलेगा पता ही नहीं।
इन्ही सब के बीच मैं प्लेटफ़ॉर्म पहुँच गई। गाड़ी बिल्कुल मेरे पास आ कर रुकी। और आज पहली बार मैंने ध्यान दिया कि एक ड्राईवर भी रहता है इसमें। मेट्रो चलने पर बहुत बार बहुत लोगों ने दिल्ली सरकार को धन्यवाद दिया। लेकिन उस मेट्रो की सफलता को यकीनी बनाने के लिए इन ड्राईवरों का क्या योगदान है यह शायद कुछ ही लोग समझ पाएं। अपनी अहमियत को दरकिनार कर यह ड्राईवर, रोज लाखों लोगों के सफ़र को सुरक्षित और निर्विघन बनाने के लिए हमेशा कार्यरत रहते हैं। हर स्टेशन आने पर वो बाहर निकल कर आते हैं और दूर तक नज़र दौड़ा कर देखते हैं, जब उन्हें लगता कि सारे लोग चढ़ गए तब वो अपने केबिन में जा कर मेट्रो के दरवाज़े बंद कर देते हैं। बिना बोले सबकी परवाह करते हुए या फिर सोचें तो मात्र अपनी ड्यूटी निभाते हुए।
ऐसा नहीं है कि यह सब लोग, इनके काम के बारे में हमें पता नहीं है, या हम इनसे अनिभिज्ञ हैं। पर इनकी सेवाओं के लिए धन्यवाद देना तो बहुत दूर की बात है हम कभी उनको एक बार मुस्कुरा के भी देखने के काबिल नहीं समझते। और वो लगातार चलते रहते हैं, काम करते रहते हैं... मशीन की तरह, ताकि हम अपने मन की उड़ान बिना किसी रूकावट के स्वछन्द हो के ले सके।
© उपमा डागा पार्थ २०१३
जैसे स्कूल जा कर अचानक किसी दिन पता चलता है कि आज सारा दिन पढाई नहीं होगी और बच्चे मस्ती में खेलने लगते हैं। कुछ ऐसी ही मस्ती थी उनकी भी। बार बार इक्कठे उड़ते, थोड़ी दूर तक उड़ान भरते, और वापिस लौट आते किसी घर की छत पर। सफ़ेद और भूरे रंग के कबूतर आसमान में आज अपना ही रंग भरने को उत्सुक थे। दूर तक छू कर आते, वापिस रंग भरते और फिर रंगों का दूसरा स्ट्रोक लगाने को तैयार।
एक पल को लगा पता नहीं कितना समय हो गया है यूं सिर्फ मस्ती में अपने मन से उड़ान भरे हुए। पर फिलहाल इन जज्बातों के लिए समय नहीं था। ऐसा घड़ी देख के याद आया। क़दमों की गति अपने आप तेज हो गई।
थोड़ा आगे बढ़ के मैं अपने मन के पक्षी को पीछे मुड़ने से रोक नहीं पाई। कबूतर अभी भी मस्ती में ऊपर नीचे आ जा रहे थे, पर अब उनके ऊपर एक हवाई जहाज जा रहा था। एक सीध में, एक गति में, एक दिशा में, लगातार। बंधे-बंधे क़दमों से, मानों जरा इधर से उधर हुआ तो रास्ता भटक जायेगा।
कभी-कभी मन और दिमाग कैसे हम एक साथ देख पाते हैं। कबूतर और हवाई जहाज...
मेट्रो स्टेशन पर टिकट काउंटर पर काफी भीड़ थी। मेरा नंबर आने में अभी टाइम था। अचानक जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ आने लगी। मेरे से आगे खड़ा एक युवक टिकट काउंटर पर बैठे कर्मचारी को डांट रहा था। "तुम लोगों को काम करने का तरीका नहीं आता। अब तुम लोगों के चक्कर में मुझे इतनी देर हो गई है। मैं कितनी देर खड़ा रहूँ आप लोगों के कारण," वो युवक पता नहीं क्या क्या बोल गया। अगर शीशे की दीवार बीच में न होती तो वो काउंटर पे बैठे कर्मचारी को पीट ही देता।
वो कर्मचारी शराफत से सुनता रहा। बीच में उसने सफाई देने की कोशिश की लेकिन वह युवक कुछ सुनने को तैयार नहीं था। जब मैंने और मेरे पीछे खड़े एक दो और लोगों ने कारण पूछा तो कर्मचारी ने कहा कि उसके पास खुले पैसे नहीं थे तो उसने उस युवक को इंतजार करने को कहा। जिस पर उसने इतना कुछ सुनाया। खैर इंतजार करने के अलावा कोई चारा दोनों के पास नही था। तो मुश्किल से २ या ३ मिनट बाद उसको बकाया पैसे मिल गए। और वापिस सब कुछ सामान्य।
वही खिड़की, वही कर्मचारी, वही उसके चलते हुए हाथ... सामान्य स्तिथि में खिड़की के उस पार हम सिर्फ हाथ बढ़ाते हैं टिकट या बकाया लेने के लिए। लेकिन इन्हीं कुछ परिस्तिथियों में हम कभी-कभी उनका चेहरा भी देख लेते हैं।
काउंटर के बाद यंत्रवत पर्स एक्सरे मशीन में रखा और मैं अपनी चेकिंग के लिए बॉक्स में पहुंची। देखा चेकिंग करने वाली महिला के हाथ भी मशीन की तरह चल रहे थे। बिना मुस्कराहट के, हर एक की एंट्री पे खड़े होना, चेक करना और बाहर भेजना। पता नहीं कितना लोग होंगे जो मुस्कुरा के इनकी तरफ देखते होंगे। कई लोग तो बड़े एहसान के साथ चेकिंग करवाते हैं।
मुस्कुराहटें इनकी ड्यूटी को कम ज्यादा तो नहीं कर सकती पर शायद काम करना थोड़ा आसान बना दे। तो मैं मुस्कुरा दी सिर्फ उसके लिए। और पता चला वो भी मुस्कुराती है। अच्छा लगा यह जान कर।
पर्स उठाने लगी तो देखा पुलिस की वर्दी में बैठा व्यक्ति लगातार मॉनिटर को देखे जा रहा था। सोचा अगर इसका ध्यान कुछ देर के लिए इस मॉनिटर से हट जाये तो क्या होगा। पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी करने के बाद भी उसके पास गलती की गुंजाईश नहीं थी। तो सलाम है उन सभी को जो हमारी सुरक्षा के लिए दिन रात लगे रहते है, बिना हमारे ध्यान में आये या फिर बिना हमारे देखे...
पूरे स्टेशन पर चंद लोग ही होते हैं जो इत्मीनान से चलते हैं बाकी सब तो समय को पकड़ने के लिए भागते हुए ही नज़र आते हैं। मानों जरा सी उन्होंने रफ़्तार कम की तो समय उन्हें छोड़ कर किसी और के पास चला जाएगा।
इस भागादौड़ी में हम कितने लोगों को अनदेखा करते हुए जाते हैं। कभी उन दो हाथों को जो एक मॉडर्न झाड़ू नुमा वाइपर लिए मेट्रो स्टेशन की सफाई करते रहते हैं। और असल में इस बात को पूरा करते हैं—मेरी दिल्ली, स्वच्छ दिल्ली। कभी रेत की बोरियों के पीछे बैठा वो जवान जो किसी भी आपातकालीन स्तिथि से निपटने के लिए हमेशा बन्दूक ताने तैयार नज़र आता है। कितना अजीब लगता होगा उनको... मानों पेन और पेपर लेकर परीक्षा हाल में बैठे हो, लेकिन प्रश्न पत्र कब मिलेगा पता ही नहीं।
इन्ही सब के बीच मैं प्लेटफ़ॉर्म पहुँच गई। गाड़ी बिल्कुल मेरे पास आ कर रुकी। और आज पहली बार मैंने ध्यान दिया कि एक ड्राईवर भी रहता है इसमें। मेट्रो चलने पर बहुत बार बहुत लोगों ने दिल्ली सरकार को धन्यवाद दिया। लेकिन उस मेट्रो की सफलता को यकीनी बनाने के लिए इन ड्राईवरों का क्या योगदान है यह शायद कुछ ही लोग समझ पाएं। अपनी अहमियत को दरकिनार कर यह ड्राईवर, रोज लाखों लोगों के सफ़र को सुरक्षित और निर्विघन बनाने के लिए हमेशा कार्यरत रहते हैं। हर स्टेशन आने पर वो बाहर निकल कर आते हैं और दूर तक नज़र दौड़ा कर देखते हैं, जब उन्हें लगता कि सारे लोग चढ़ गए तब वो अपने केबिन में जा कर मेट्रो के दरवाज़े बंद कर देते हैं। बिना बोले सबकी परवाह करते हुए या फिर सोचें तो मात्र अपनी ड्यूटी निभाते हुए।
ऐसा नहीं है कि यह सब लोग, इनके काम के बारे में हमें पता नहीं है, या हम इनसे अनिभिज्ञ हैं। पर इनकी सेवाओं के लिए धन्यवाद देना तो बहुत दूर की बात है हम कभी उनको एक बार मुस्कुरा के भी देखने के काबिल नहीं समझते। और वो लगातार चलते रहते हैं, काम करते रहते हैं... मशीन की तरह, ताकि हम अपने मन की उड़ान बिना किसी रूकावट के स्वछन्द हो के ले सके।
© उपमा डागा पार्थ २०१३