सोमवार, 19 नवंबर 2012

मेरी दिल्ली

जिन्दगी को एक रफ़्तार में आते देख अच्छा लग रहा था। और इस रफ़्तार को गति दे रही थी मेट्रो या मेरा अपना मेट्रोस्तान।

आज बड़ा बेजान सा था मेट्रो जाते समय। मानों सारा शहर थका-थका सा हो। अपने ही सीने पे कोई बोझ लिए किसी का इंतजार कर रहा थाउस बोझ को उतारने। पर वो 'कोई' कौन है, कोई नहीं जानता।

तो बस एक थके हुए डिब्बे से निकल पड़ी। मेट्रो जैसे मुझे चिढ़ा रही होबंद होठों से कितनी कहानियां निकलवाओगी। जाओ यह अपना मेट्रोस्तान ले कर कहीं और जाओ। तो मैं कई बंद होठों की कहानियाँ वहीं छोड़ कर मेट्रो से निकल पड़ी।

बाहर निकल के मैंने देखा कि एल. आइ. सी. बिल्डिंग और जी. पी. ओ. के बीच में जो पेवमेंट है, वहां पर ढेर सारे कबूतर इक्कठा थे। दाना खाने के लिए। ऐसा लग रहा था मुंबई का इक छोटा सा गेटवे ऑफ़ इंडिया दिल्ली में भी आ गया हो, जहाँ लोग सिर्फ पक्षियों से ही मिलने आते हैं और पक्षियों को भी लगता है कि आज के युग में भी 'इंसान' जिन्दा है। 

देखा तो लोग वहां गाड़ी से उतर रहे थे, सिर्फ दाना डालने के लिए। अचानक अपनी दिल्ली पर थोडा बहुत गर्व होने लगा। यहाँ के लोगों में पक्षियों के लिए दया भाव देख कर। लगा हाल ही में जो सर्वेक्षण हुआ था, जिसमे दिल्ली को रहने वाली जगहों में नीचे से दूसरा स्थान मिला था, उसमें उन्होंने इंसानियत के इस पहलू को तो पूरी तरह से नज़रंअदाज़ ही कर दिया होगा।

एक अच्छे से एहसास के साथ काम शुरू किया और ख़तम भी।

वापसी में न चाहते हुए भी ध्यान 'मिनी गेटवे' की तरफ चला गया, जो अब बिलकुल खाली था। मानों परिंदों को भी पता हो कि कब दिल्ली के दयालु उन्हें पुचकारने के लिए आयेंगे।

और राजीव चौक पर एक भरी सी गाड़ी मेरा इंतजार कर रही थी। पर आज दिल्ली अच्छी लग रही थीअपनी अच्छाई के कारण।

एक महिला ३०-३२ वर्ष की, मेरे साथ ही गाड़ी में चढ़ी। एक पर्स कंधे पर, एक जुट बैग हाथ में और दुसरे हाथ में कागज का एक बैग। लगा ऑफिस वालों ने भी स्कूल की तरह बैग भारी करने शुरू कर दिए हैं। क्या अब ऑफिस में भी होमवर्क मिलने लगा है? उसने अपने दोनों हाथों का सामान समेटते हुए नज़र दौड़ाई, पर सीट मिलने के कोई आसार नहीं दिखे, तो उसने ऊपर वाली रॉड को पकड़ने की कोशिश की। पर हाथ ऊपर ले जाते ही कागज का बैग फट गया। मुझे लगा बेकार ही दिल्ली सरकार ने प्लास्टिक के बैगस पर पाबंदी लगाई।
  
खैर, उस कागज़ के बैग के अन्दर एक प्लास्टिक बैग मेरे विचारों को मुँह चिढ़ाता हुआ सा बाहर निकला। मानो कह रहा हो, घबराओ मत सिर्फ आवरण ही बदला है अन्दर से हम वही हैं। जो दो-चार चीज़ें कागज़ के बैग के अन्दर थी वो उसने प्लास्टिक बैग के अन्दर डाल दी। फिर उसने मेरी एक 'उम्मीद' को झुठलाते हुए, फटा हुआ कागज़ का बैग सलीके से मोड़ा और उसे तह कर के प्लास्टिक बैग में डाल दिया।

जहाँ लोग हॉर्न की आवाज़ सुन कर भी नहीं हटते और सड़क के किसी भी कोने पर कूड़ा फेंकने में उनको 'अपने देश और भारतीयता' की फीलिंग आती है, ऐसे में यह अनुभव मेरे लिए नया था। और दिल्ली आज मेरे लिए सिर्फ अच्छे-अच्छे अनुभव ही ले कर आ रही थी।

मेरी मुस्कान और फैल गई।

साथ में बैठी एक बच्ची को भूख लगी तो उसकी मम्मी ने उसे डार्क फेंटसी बिस्कुट का एक पैकेट दिया। मैं भी डार्क फेंटसी मिलने पर ऐसे ही खुश होती हूँ, उस छोटी बच्ची की तरह, फिलहाल मैं उसे देख कर खुश थी।

वो लिक करो, ट्विस्ट करो की तर्ज़ पर बिस्कुट खा रही थी। बचपन भोला तो होता ही है, पर उसकी ऐसी अठखेलियाँ उसे सीधा दिल में उतार देती हैं... कभी न भूलने के लिए।

वो एक-एक करके अपने बिस्कुट खा रही थी। अभी दो-तीन ही खाए थे कि पैकेट हाथ से छूट गया और सारे बिस्कुट नीचे जमीन पर। मुझे लगा मैं छोटी होती तो पक्का रो देती और आस-पास के लोगों की नज़र बचा कर एक तो उठा ही लेती।

खैर, बच्ची रोई तो नहीं पर हाँ जमीन से उठाने का लालच रोक नहीं पाई।

तभी मम्मी की जोरदार आवाज़ आई, "नो पूरबी! जमीन पे गिरी चीज़ नहीं उठाते। फर्श गन्दा होता है न बेटा। कितने कीटाणु होंगे इनमें।"

बेचारी  पूरबी। उसका मुँह उतर गया। उसने अपना हाथ वहीँ रोक लिया। मुझे लगा मेट्रो आख़िरकार गन्दी हो ही गई। पर मुझे हैरान करती हुई उसकी माँ उठी और सारे गिरे हुए बिस्कुट उठा लिए और पैकेट मैं डाल दिए।

पूरबी ने कहा, "जब खाने ही नहीं हैं तो उठाये क्यों?"

"क्योंकि हम मेट्रो को गन्दा तो नहीं कर सकते। हमने गन्दा किया है तो उठाना भी तो हमें ही पड़ेगा," माँ ने कहा।

हैरान थी मैं अपनी धारणाओं और गलत भ्रांतियों को ले कर। और आज तो दिल्ली को ले कर मेरे मन में सिर्फ ख़ुशी और गर्व का एहसास था।

मेरा स्टेशन आ गया था और मैं मेरी दिल्ली के नए रूप को जान कर खुश थी, जहाँ दया भी थी, इसको साफ़ रखने की चाह थी, अपनापन था।

मैं उठी तो देखा पूरबी और उसकी माँ भी साथ में उठ गई। मैंने प्यार से उसके गाल छुए। वो चिपक गई अपनी माँ के साथ। मैं हंस के आगे बढ़ गई। वो लोग मेरे पीछे- पीछे थे। मैं उतर कर ऑटो का इंतजार  करने लगी। देखा दोनों माँ-बेटी आ रही थी और माँ ने हाथ में पकड़ा लिफाफा सीढियो पर बैठी एक भिखारन को पकड़ा दिया, जिसके हाथ में एक बच्चा था। बच्चा बिस्कुट पाकर खुश हो गया और फटाफट खाने लग गया। माँ भी उनको दुआएं देने लगी।

बेटी ने कुछ कहा नहीं बस सर उठा कर अपनी माँ को देखा। मानों पूछ रही हो मम्मी कीटाणु...

और मुझे लगा कि अचानक मीठा खाने के बाद मैंने कड़वी दवाई पी ली हो...

© उपमा डागा २०१२

बुधवार, 14 नवंबर 2012

देश दंश

रविवार, दिवाली, धनतेरस... सफाई, शॉपिंग और गिफ्ट्स।

यही है दिल्ली का मूड आज के दिन। तो उसी मूड से सरोबार हम भी अपने मेट्रोस्तान की ओर रवाना हो गए। मस्ती और काम का संगम। स्टेशन पर पहुंची तो देखा बस इक्का दुक्का लोग बैठे ही थे। लगा लोग आज छुट्टी के मूड में हैं। पर गाड़ी आने में पूरे छः मिनट थे। फिर सोचा यहाँ तो एक मिनट में सरकारें बदल जाती हैं छः मिनटों में तो पता नहीं क्या हो जाये।

और सही था शायद ... फिर से भर गया स्टेशन पांच मिनट में। 

डिब्बे के अन्दर भी ऐसा ही माहौल था। महिलाओं के भारी-भारी सूट मैचिंग जेवेलरी, सजे धजे बच्चे। देख के लगा कि हाँ मशीन बनते इंसान में अभी भी एहसास, जोश कहीं बाकी है। लोगों के हाथों में उपहार के बड़े-बड़े पैकेट थे। मतलब या तो किसी से मिल के आ रहे हैं, या किसी से मिलने जा रहे हैं। अच्छा लगा देख के कि मिलने जुलने की रवायत अभी भी कायम है।

तभी एक लड़की का मोबाइल बजा। 

"कहाँ थी तुम? कब से तुम्हारा फ़ोन ट्राय कर रही थी। आउट ऑफ़ रीच आ रहा था।"

"कुछ नहीं, सरोजनी तक जा रही थी, शौपिंग करने।" 

"अरे बस कुछ टॉप और सूट लेने थे। ऑफिस पहनने वाले सारे कपड़े ख़तम हो गए हैं।"

इससे आगे मैं कुछ सुन नहीं पाई। इसी बात पे मुझे महिलाओं के बारे में कही एक बात और अपनी एक बहुत ही प्यारी सहेली याद आ गई।

कहते हैं कि कपड़ों की अलमारी के आगे आधा घंटा खड़े होने के बाद भी अक्सर उन्हें पहनने के लिए कुछ नहीं मिलता। मुझे पता है कि मैं भी उसी बिरादरी से ताल्लुक रखती हूँ और इस राज को सरेआम करने के लिए मुझे बहुत सी गालियाँ पड़ने वाली हैं। पर खुबसूरत दिखना और उसपे फोकस करना हर एक के बस की बात भी तो नहीं है। इसी की जीती जागती मिसाल है मेरी वो सखी जिसकी वार्डरोब हर दो महीने बाद खाली हो जाती है।

राजीव चौक आ चुका था और मैं मुस्कुराते हुए वहां उतर कर अगली गाड़ी के इंतजार में खड़ी हो गयी।

तभी पीछे से आवाज़ आई, "देख मेट्रो की हीरोइनें"।

हँसती हुई आवाज़ ने मेरे आगे खड़ी दो महिलाओं की तरफ इशारा किया। देखने से अफ्रीका के किसी देश की लग रही थी। बाल अजीब से पर्पल और गोल्डन कलर के थे। फिर भी उनके बारे में यूं अशोभनीय बातें सुन कर अच्छा नहीं लगा।

"पता है दोनों ने ड्रग्स ले रखी हैं।"

उसने अपना विशलेषण जारी रखा। मैं हैरान थी कि यह लड़की यहाँ क्या कर रही है इसे तो अन्तराष्ट्रीय ओलिंपिक संघ के डोप टेस्ट के बोर्ड में होना चहिये जो खिलाडियों के ड्रग टेस्ट महज उनका चेहरा देख कर कर पाते। इससे पैसा और समय दोनों की बचत होती और दुनिया लांस आर्मस्ट्रांग को दस सालों तक सर आँखों पे बिठाने के पाप से बच जाती।  

उसकी विशेष टिप्पणियाँ जारी थी। 

"हेरोइन या स्मैक। पक्का।"

उसके साथ दो या तीन लड़कियां थी। जिनको वो अपना ज्ञान बाँट रही थी।

"आँखे देखी हैं इनकी... कैसे चढ़ी हुई है।"

उन दोनों लड़कियों ने मुड़ कर पीछे देखा। मानों कुछ जवाब लिए बैठी हो पर कुछ सोच कर चुप हो गई हों। पता नहीं उनको सबसे जयादा क्या बुरा लगा पर एक दर्द था चेहरे पर। वो विदेशी होने का था या कहीं इतनी देर रहने के बाद भी अजनबी बने रहने का... पता नहीं चला पर हां अपने देश की याद बहुत आई होगी उनको। और मुझे याद आई महात्मा गाँधी की जिन्होंने अफ्रीका के ही एक देश से रंगभेद के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की थी और आज बापू के ही देश में उनके साथ यह व्यवहार हो रहा था।  

इतने में मेट्रो आ गई और उन्हीं लड़कियों का ग्रुप जिनकी तरफ देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी, मुझे धक्का मारकर, पैरों को कुचलता हुआ गाड़ी के अन्दर घुस गया। सभ्यता और होशो-हवास की मिसाल उन लडकियों का रवैया देख कर मैं हैरान थी। मैं लड़खड़ा कर शायद प्लेटफ़ॉर्म पर ही रह जाती अगर उसी समय एक हाथ ने मुझे अन्दर न खींचा होता। मैंने सर उठा के देखा तो एक दूध सी गोरी महिला, जो की विदेशी थी, ने  मुझे थामा हुआ था। मैंने उसे धन्यवाद् दिया। वो मुस्करा के बोली, "आप ठीक हो?" मैंने ख़ुशी मिश्रित हैरानी से उसे देखते हुए हाँ में सर हिलाया।

खड़े होने के लिए अपनी जगह बनाते बनाते मैंने एक बच्चे की आवाज़ सुनी, "मम्मी व्हेन विल वी रीच?"

उसकी प्यारी सी मम्मी ने एक अदा से कहा, "अनदर टेन मिनट्स"। वो खूब लम्बी सी और सुन्दर थी। इस बात का गुमान भी उसके चेहरे पे था।

तभी उसकी बेटी बोली, "मम्मी मैं थक गई हूँ।"

उस संभ्रांत सी दिखने वाली महिला ने लगभग डांटते हुए उसे कहा, "कांट यू स्पीक इन इंग्लिश"।

मैं उतर गई पटेल चौक पर। सोचने का टाइम नहीं था।

वापसी में मेट्रो में खड़े हो कर दिल्ली देख रही थी जो रोशनियों से सजी नई नवेली दुल्हन की तरह लग रही थी। चारों तरफ जमगाहट थी... पर कुछ खालीपन सा था अब... पर वो विदेशियों के साथ हुए उस सौतेले व्यवहार की वजह से था या अपनी भाषा के साथ हुए अनादर से... यह मैं समझ नहीं पाई।

© उपमा डागा २०१२

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

आईना


कभी-कभी सोचती हूँ जब हम किसी काम को नया नया शुरू करते हैं तो सब कुछ कितना अच्छा अच्छा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ रूटीन, रोजमर्रा-सा लगने लगता है।

शायद यही हाल जिन्दगी का भी है। बचपन में बच्चे का पहली बार माँ-पापा कहना कैसे गुदगुदा देता है। उसकी एक एक हरकत पर बस मन करता है सब कुछ संजोते जाओ। पहला सेंटेंस, पहली बार स्कूल, पहली खिलखिलाहट, पहला खाना। ऐसा लगता है सब कुछ मुट्ठी में बंद कर लो। वही बच्चा बड़ा हो कर जब बात-बात में मम्मी पापा कहता है तो लगता है अब तो कोई काम खुद से करना सीख लो। पता नहीं कब बड़े होगे।

नई-नई शादी, नए-नए रिश्ते, पति-पत्नी। हाथों में हाथ, यूं लगता है जिन्दगी सिर्फ प्यार करने के लिए बनी है। लोगों की भीड़ में भी हल्का  सा स्पर्श, जीवनसाथी के लिए कितने एहसास एक साथ आ जाते हैं। फिर धीरे-धीरे वास्तविकता का धरातल।

गलत कुछ भी नहीं है। न नयापन, न प्यार, न वास्तविकता । बस जिम्मेवारियां—प्यार को हौले से परे कर अपने लिए जगह ले लेती है। दोनों साथ-साथ चले तो खुशियाँ, हँसी, मुस्कुराहटें, दस्तक देती रहती हैं पर अगर प्यार परे होने की जगह अपनी जगह से हट ही जाये तो बस निभाते चले जाते हैं हम—सब कुछ।

आप सोच रहे होंगे यह ऐसा क्या आ गया मेट्रोस्तान में। तो मुझे लगा कि मैं भी कहीं मेट्रो में सिर्फ चढ़ने उतरने तो नहीं लगी? मुझे यकायक कहानियां दिखनी बंद क्यों हो गई? मैं भी क्या भीड़ का हिस्सा बन गई हूँ? या फिर कहीं मैं खो तो नहीं गई?

बस यही सोचते सोचते मेट्रो में चढ़ी। आजकल शाम को ही रात का सा गुमान होने लगा है। कहते हैं कि मौसम बदल रहा है। क्या मैं भी...

खैर इन सब सोचों का तो कोई अंत ही नहीं है शायद।

डिब्बों में लाइट जली हुई थी। मैं पटेल चौंक से चढ़ी। बिल्कुल दरवाजे के पास थी। अचानक मैंने देखा मेट्रो के दरवाज़े में मैं खुद को देख रही हूँ। लगा मेट्रोस्तान आज मुझे आईना दिखने के मूड में है। हल्की सी मुस्कान चेहरे पे आई। पर इस आईने में मैं अकेली नहीं थी, मेरे पीछे एक भीड़ थी। भीड़ में चेहरे यूं ही अपना चेहरा देख रहे थे तो कुछेक को दूसरों का चेहरा पढने में ज्यादा मजा आ रहा था। कुछ बस परेशां से थे—जिन्दगी से, भीड़ से या खुद से। और मैं बस देख रही थी कि आज यह आईना कहाँ तक और क्या क्या दिखाता है।

ज्यादा सोचने का वक़्त न देते हुए मेट्रो ने अपने कपाट खोल दिए मानो कह रहे हों कि अब आप दूसरी मेट्रो में जगह बनाओ किसी दूसरी भीड़ के बीच में।

इतने दिन हो गए पर अभी तक मैं राजीव चौक से पूरी तरह से परीचित नहीं हुई। कभी तो सामने ही अपना प्लेटफ़ॉर्म दिख जाता, तो कभी लगता फिर किसी अंजानी जगह पर पहुँच गई हूँ। खैर भला हो उन साइन बोर्ड्स का, जो ऐसे समय में मेरे लिए रामबाण का काम करते हैं।

इन्हीं सब का सहारा लेते हुए मैं बढ़ गई—सफर को अंजाम तक पहुँचाने के लिए।

खड़े-खड़े डिब्बे में नज़र डाली तो एक लड़की बड़ी सी किताब लिए बैठी थी। मुँह में बुदबुदा कर पढ़ रही थी। बिना आस पास के लोगों की तरफ ध्यान दिए, वो बस पढने में बिज़ी थी। शायद एग्जाम आने वाले थे। अचानक कॉलेज का जमाना याद आ गया। मैं भी यूं ही पढ़ा करती थी। जब कुछ समझ में नहीं आता तो दोबारा, तिबारा पढ़ के खुद को समझाते हुए खुद की ही टीचर बन जाती थी मैं। उस लड़की के चेहरे पर धीरे-धीरे संतुष्टि सी आ रही थी। या तो उसको समझ आ गया था या सलेबस पूरा हो गया था। एक हूक सी उठी उठी मन में—आह! मेरा कॉलेज। और वो एक परछाई की तरह उतर गई, अपनी किताबें समेट कर।

और उसी स्टेशन से खिलखिलाती हुई चूड़ा पहने एक नवयौवना ने एंट्री ली। नई-नई शादी का खुमार  उसकी आँखों में था। फ़ोन पे बात करते हुए उसे किसी का ध्यान नहीं था। सबके बीच में भी उसकी दुनिया सबसे अलग थी। कभी धीरे से हँस देती तो कभी शरमा जाती। दूर थी मुझसे, पर बहुत कुछ याद दिला गई।

तभी मेरे पीछे बैठी एक महिला के फ़ोन की घंटी बजी। गर्दन नहीं घूमी पर ध्यान उस तरफ चला गया। फ़ोन उठाते ही उसने कहा।

"हाँ बेटा। बोलो"

सब एक तरफ का वार्तालाप था, पर दूसरी तरफ की बात बिना सुने भी समझ में आ रही थी।

"आ रही हूँ बेटा।"

"इन्द्रप्रस्थ।"

"अब गाड़ी जितनी देर में पहुंचाएगी।"

"अच्छा! पापा आ भी गए?"

"सर में दर्द हो रहा है उनके?"

"बेटा, मुझे आने में तो आधा घंटा लग जायेगा। तुम उन के लिए चाय बना दो। और हाँ चाय दे के मुझे फ़ोन जरूर कर देना। मैं बस पहुँच ही रही हूँ।"

न चाहते हुए भी गर्दन घुमा कर देख लिया। कुछ बैचेन सी हो गई थी वो। और अब उसका ध्यान सिर्फ घड़ी पर था। मानों बार-बार घडी देखने से गंतव्य जल्दी आ जाएगा।

जिम्मेवारियां—यही एक शब्द मेरे दिमाग में आया उस समय।

पर यह आधिकारों और जिम्मेवारियों का जो सामन्जस्य है, यही शायद जिन्दगी को मीठा, नमकीन सा बनाता है।

लक्ष्मी नगर आ गया था। एक बूढी आंटी और एक १८-२० साल की लड़की ने सामने से प्रवेश किया। लड़की का मुँह उतरा हुआ था और आंटी उसे कुछ कहती हुई अन्दर आ रही थी।

"वो गुस्से में थी, मीनू। इसलिए ऐसा कहा उन्होंने। और थोड़ी गलती तुम्हारी भी तो थी।"

"पर नानी। वो हर बार ऐसा ही करती हैं। मेरी बात सुनने से पहले ही डाँटने लगती हैं।  शी नेवर अंडरस्टैंड्स माई पॉइंट," लड़की ने लगभग रोते हुए कहा।

एक लड़की ने आंटी को सीट दे दी और पोती हेंडल पकड़ कर खड़ी हो गई।

"ठीक है। मैं उससे भी बात करूंगी पर तुम तो..."

मैं दरवाज़े तक आते-आते इतना ही सुन पाई, मेरा प्रीत विहार जो आ गया था।

लगा आईना तो देखा जिसमें सिर्फ चेहरे ही तो अलग थे, या यूं कह लीजिए भीड़ में से कोई कोई चेहरा निकल के बस उम्र के अलग अलग दौर को छूता हुआ सा निकल गया, इक अलग सी शक्ल लिए।

वाह रे मेरे मेट्रोस्तान! आईना भी दिखाते हो तो किसी और ही के भेस में।

© उपमा डागा २०१२