मंगलवार, 28 मई 2013

हग डे

घर से निकले अभी थोड़ा ही समय हुआ था कि मोबाइल में हरकत हुई। मोबाइल उठा कर देखा तो एक मैसेज था। पढ़ा तो पता चला कि आज वलर्ड फ्रेंडस हग डे है। 

बड़ा भावनात्मक सा सन्देश था। उस संदेश में दोस्ती को इस ढंग से दर्शाया गया था कि मेरी कई यादें ताज़ा हो गई। दोस्तों के साथ बिताए कई लम्हें आँखों के सामने से एक रील की तरह निकल गए। साथ ही सोचा, आज से पहले सुना नहीं कभी इस दिन के बारे में। पर जहाँ दोस्ती की बात आती है तो लगता है इसको मनाने के लिए तो साल के ३६५ दिनों में ही कुछ न कुछ होना चाहिए।

एक क्राय डे, साथ रोने का दिन। आल स्माइल्स डे, सिर्फ मुस्कुराने का दिन। फाइट डे, झगड़े का दिन। पैच अप डे, मनाने का दिन।

फिर सोचा अभी तो नहीं पर जिस तरह से इस मसरूफियत भरी जिन्दगी में हम गुम होते जा रहे हैं तो जल्द ही हमें झगड़ने और मनाने के लिए भी दिन बनाने पड़ेंगे। खैर, इस सन्देश के साथ नए पुराने कई चेहरे मेरी आँखों के सामने आ गए। कुछेक के साथ तो कभी हमने पूरी दुनिया देखी थी, पर आज हालत यह है कि हम बस, दुनिया के साथ साथ उन्हें देख रहे हैंफेसबुक पर या किसी भी सोशल नेटवर्किंग साईट पर।

आरोप प्रत्यारोप में न फंसते हुए मैं सिर्फ उन यादों को ताज़ा करने की कोशिश करती हूँजो खुशनुमा रही थी कभी।

एक सच यह भी है कि जब हम दोस्तों के साथ होते हैं तो हमारी दुनिया, बड़ी छोटी सी हो कर, बस उन्हीं के आस पास घूमती रहती है। लेकिन जैसे ही वो चेहरे हमसे जुदा होते हैं तो हम बहुत बड़ी सी दुनिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन अकेले। और इस गोल घूमती धरती का चक्र पूरा करते हुए कोई नया हाथ कभी हमारी तरफ बढ़ता है, कभी हम नए हाथ की तरफ बढ़ते हैं। चक्र चलता रहता है, पर छूटने की कसक कहीं न कहीं रह जाती है।

तो इन्हीं मिश्रित से जज्बातों के साथ मैं मेट्रो में दाखिल हो गई। दिमाग में वो सन्देश और कौतूहल अभी भी था। मुझे लगा शायद यह दिवस शायद मेरे लिए नया हो पर युवा पीढ़ी के लिए तो यह जाना पहचाना होगा। तो आँखे तलाश रही थी, उन दोस्तों को जो आज का दिन मना रहे थे। 

मेट्रो में अक्सर दोस्तों की जोड़ियाँ या झुँड देखने को मिलते हैं। कोई दूसरे के कंधे पर सर रख कर सो रहा होता है तो कोई पूरे दिन की राम कहानी सुना रहा होता है। इकठ्ठे हंसने का, उदास चेहरों पे ख़ुशी लाने का, दिल की भड़ास निकलने का मंजर अक्सर देखने में आता है। तो मुझे लगा 'हग डे' की रौनक देखने की सबसे अच्छी जगह मेट्रो ही है। पर ऐसा कुछ नहीं दिखा कि लगे आज वैलेंटाइन डे जितनी रौनक है। बल्कि आज तो आम दिनों से भी कम रौनक लग रही थी। सब अपने आप में गुम, अपने लिए कुछ तलाशने में लगे हुए थे। बिना इस की परवाह किए कि इस तालाश में कोई उनसे बिछड़ा तो नहीं।

फिर थोड़ा सकारात्मक होते हुए सोचा कि जैसे मैं इतने सारे दिन इजाद करने का सोच रही हूँ किसी और ने हग डे बना कर एक शुरुआत की हो। तो दिमाग में आया कि अब अगला दिन बस मैं शुरू करूंगी। क्राय डे वाला। कहते हैं न कि हंस तो हम किसी के भी सकते हैं, पर रोने के लिए कुछ कन्धों को ही हक देते हैं। तो उस दिन अपने दोस्त के साथ, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, एक बार तो आँखे गीली कर ही लेनी चाहिए। तो जैसे बारिश के बाद की धूप होती है, वैसी ही मुस्कान आएगी चेहरे पर, रोने के बाद वाली मुस्कान। कोई बोझ न हो न, आत्मा पे न दिल पे।

मैं मेट्रो से नज़रें हटा कर दरवाज़े के पास आ गई। मुझे अपने किसी दोस्त का इंतज़ार नहीं था, खासकर मेट्रो में, तो मैं राजीव चौक पर उतर गई। अपनी बंधी बंधाई रूटीन के साथ। राजीव चौक हमेशा की तरह लोगों को इधर से उधर पहुँचाने में व्यस्त था और लोग भागने में। इस बीच में वो सन्देश मैंने अपने कुछ नए पुराने दोस्तों को भेजा। कुछेक का जवाब आया तो बाकियों ने चुप्पी साध ली। मैंने शायद उम्मीद ज्यादा लगा रखी थी और परिणाम आशानुकूल नहीं थे। तो हल्की सी उदासी के बादलों ने मेरी मुस्कान को घेर लिया था।

फिर अपने दिमाग को झटक कर मैं चल दी, अगली मेट्रो पकड़ने। चलते-चलते राजीव चौक पर बने कैफ़े कॉफ़ी डे के सामने से निकली। अक्सर वहां से निकलते हुए मैं एक बार नज़र उठा कर देख लेती हूँ। दो कारण हैंएक तो कॉफ़ी की खुशबू अपने आप में इतना अच्छी  होती है। उसकी महक मानों चारों तरफ बिखर कर हमें अपने पास बुला रही हो। दूसरी उसकी टैग लाइनअ लोट कैन हैपन ओवर अ कप ऑफ़ कॉफ़ी , जितनी बार भी पढ़ती हूँ, अच्छी लगती है। वहां बैठे दोस्त, उनकी लम्बी लम्बी बातें। हालाँकि यह भी सच है कि बहुत सी बिजनेस मीटिंगस भी होती हैं यहाँ पर। पर मेरा ध्यान ज्यादा उनपे नहीं जाता। खैर स्वभाववश मैंने उधर नज़र दौड़ाई तो अच्छा लगा।

दोस्तों के दो-एक झुंड बाहर ही खड़े थे और हँसते हुए एक दूसरे को "हैप्पी हग डे" कह रहे थे। उन आवाज़ों में जो गूँज थी, जो जोश था और सबसे ज्यादा, जो भाव थे, उसने मेरे सारे गिले शिकवे दूर कर दिए। मैंने रुक कर दूर से उनकी तरफ देखा, और बढ़ गई अपनी अगली मेट्रो पकड़ने, अपने दोस्तों को याद करते हुए।

अच्छा लगता है जिन्दगी की बेरंग सी तस्वीर में दोस्ती के चंद बिखरे से रंग देख कर। हाँ यह जरूर है कि इस बार यह रंग मेरे मेट्रोस्तान के बाहर बिखरे हुए थे लेकिन फिर भी इनकी ख़ूबसूरती कम नहीं थी।


© उपमा डागा पार्थ २०१३