रविवार, 2 नवंबर 2014

थैंक यू

खुद की गुलामी करते करते जब कोई उकता जाए तो उसे कभी कभी अपने आप को मौसम के हवाले कर देना चाहिए। अच्छा लगता है मौसम में ख़ुशी की सोंधी सी महक का एहसास करके जो बस जिंदगी के खुशगवार रंग की तस्वीर आँखों के आगे कर देती है।

पिछले एक हफ्ते से मैं रोज इस महक को महसूस कर रही थी। सड़कें, बस स्टॉप यहाँ तक कि मेट्रो भी ऐसा लगता था कि मानों सारे शहर ने कूरियर वालों के यहाँ नौकरी कर ली हो और मेट्रो पब्लिक ट्रांसपोर्ट न बन कर कूरियर कंपनी की गाड़ी हो।

उपहारों से भरे, लदे फदे लोग। हाँ गिनती सब के हाथ में अलग अलग होती थी।

जिनके हाथ में कोई डिब्बा नहीं होता वो लदे फदे लोगों को गाड़ी में जगह देने में पूरी दरियादिली दिखाते। मानों कह रहे हो, देखो आज हमारी बारी नहीं थी पर कल अगर हमारे हाथ में कुछ हो तो हमारी भी इतने ही प्यार से मदद करना।

मैं रोज त्यौहारों की चमक वाले चेहरों की रौनक बटोर कर ऑफिस और घर के कामों में ताल मेल बिठा रही थी। और वो एक अदद दिवाली की छुट्टी कब आ के कब चली गई पता भी नहीं चला।

खैर! अच्छा या बुरा दौर अपनी रफ़्तार कम नहीं करता। फर्क सिर्फ इतना है कि अच्छे दौर के रुकने का हम इसरार करते हैं और बुरे दौर के गुजरने का इंतज़ार।

तो जिंदगी खास से आम बनने के लिए लगातार आवाज़ दे रही थी और जिंदगी को आप दूसरी आवाज़ लगाने की जिद तो कर सकते हैं, पर उसको अनसुना नहीं कर सकते। तो आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी आवाज़ पे एक बार फिर दौड़ने को तैयार थे सब। वो अलग बात है की मेरा रोल नंबर पहला था। जी! मेरी ड्यूटी इतवार से शुरू हो रही थी।

खुद को घसीटने में थोड़ी देर हुई तो भागते हुए सोचा कि घड़ी इतनी तेज़ कैसे चल सकती है। यह बात ज्यादा महसूस तब हुई जब प्लेटफार्म पर पैर रखते ही मेट्रो ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए। पैर पटक कर खुद को चोट पहुँचाने से अच्छा मैंने इंतज़ार करना समझा।

पूरे ६ मिनट बाद आई मेट्रो। और इस ६ मिनट में मैंने १६ बार तो घड़ी देखी ही होगी, यह जानते हुए भी कि बार बार देखने पर भी घड़ी की सुई तेज नहीं चलेगी। भीड़ थी मेट्रो में तो बैठने की जगह नहीं मिली। कोने में खड़ी परेशान होते होते मुझे लगा अब  मेट्रो से पहले तो पहुँचने से रही। तो खुद को थोड़ा शांत करते हुए एक ठंडी सांस छोड़ी और डिब्बे में नज़र दौड़ाई।

डिब्बे में कुछ खास बदलाव नहीं था। "मैं और मेरा फ़ोन" का इश्तहार बनी लड़कियां नज़र आई चारों तरफ। इक्का-दुक्का पढ़ने वाली लड़कियाँ। इन्हें देख कर मुझे बड़ी ख़ुशी होती थी। यह मुझे किताबों के जिन्दा होने का एहसास करवाती है।

पर इस भीड़ में वो सबसे अलग थी। बहुत ख़ूबसूरत नहीं — साधारण से चेहरे वाली। पर एक अजीब सी चुप्पी थी उसके चेहरे पे। त्यौहारों की रौनक के बाद ऐसी मायूसी। थोड़ी ही देर में उसकी आँखों से आंसू भी टपकने लगे। वो भी कोई खास कोशिश नहीं कर रही थी उनको रोकने की। बस बीच-बीच में उसके हाथ आँखों पे जाते और वो आंसू साफ़ कर लेती।

मैं उसके पास जा कर उसकी मुश्किलें बढ़ाना नहीं चाहती थी। क्योंकि जो कुछ भी दबा-दबा था सब बाहर आ रहा था। शायद उसे वक़्त चाहिए था। एक सफर तक का वक़्त।

अचानक उसके फोन की घंटी बजी। उसने पहले अपने आंसू पोंछे, फिर खुद पे पूरी तरह काबू पा कर फ़ोन उठाया। बात करते करते आँखों पे रह गई नमी भी सूखने लगी।

फ़ोन पे दूसरी तरफ से शब्दों का मरहम लगा कि नहीं पता नहीं पर अब उसमे एक जिद नज़र आ रही थी — खुद से लड़ने की। पानी की कुछ बूंदे कई बार मिटटी को इतना मजबूत कर देती हैं कि वहाँ कीचड़ नहीं होता बल्कि एक बुनियाद बन जाती है।

मुझे अचानक मेट्रो स्टेशन के एस्कलेटर के पास मिली आंटी की याद आई। ७०-७५ साल उम्र रही होगी आंटी की। एस्कलेटर पर चढ़ने से हिचक रही थी। मैंने उनके पीछे खड़े होकर उनका इंतज़ार किया फिर कहा लाइए मैं आपको ले चलू आंटी। आंटी ने मुड़ कर मेरी तरफ देखा और बोला, "थैंक यू बेटा। पर अगर इस बार तुम मेरा हाथ पकड़ कर ले गई तो मैं हर बार चढ़ने से पहले तुम्हे कहाँ से ढूंढूगी।" मैं हैरान, या कहूँ तो नतमस्तक थी उनके इस ज़ज्बे को देख कर।

वो फिर बोली, "तुम बस मुझे यह बताओ कैसे और क्या करना है।" मैंने उनको पहले रेलिंग पकड़ने, फिर पैर रखने से ले कर सब कुछ बता दिया और उनके जाने का इंतज़ार किया। उनके चढ़ने के बाद मैं भी चल दी। प्लेटफार्म पर पहुँच कर उन्होंने फिर से मेरा धन्यवाद किया और कहा अब अगली बार मुझे चढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

आज एक बार फिर लगा कितनी सही थी वो। एक बार अगर हम अपनी कमजोरी पे काबू पाने की कोशिश करे तो वो कमजोरी अगली बार हम पर उतनी या फिर बिलकुल भी हावी नहीं हो पायेगी। और यह करने के लिए किसी के बढ़े हुए हाथ की नहीं, बल्कि आपने खुद का हाथ बढ़ाने की जरूरत होती है।

वो मेरे साथ ही राजीव चौक उतरी। मैं अभी भी चोर आँखों से उसे देख थी। पर उसने शायद डिब्बे में ही मेरी चोरी पकड़ ली थी। हम कुछ कदम साथ चले उतने में उसने एक फीकी सी मुस्कान मेरी तरफ़ डाली। और बड़े अपनेपन से मुझे यह जताया कि अब वो ठीक है। एक मूक सी तसल्ली थी… पर  काफी थी… दोनों के लिए शायद।

पटेल चौक की तरफ बढ़ते हुए अपनी लिखी कुछ पंक्तियाँ यूं ही याद आ गई।

माना कि आसां नहीं है इम्तिहाने-जिंदगी,
मेरे हौसलों की इबारत भी मगर,
हर मसले का हल रखती है…

© उपमा डागा पार्थ २०१४

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

मेरी बेल्ट

मेट्रो लाइफ में कितनी भाग दौड़ है, यह पता तो था पर रफ़्तार कभी-कभी इतनी तकलीफ़देह भी हो सकती है इसका पता आजकल चल रहा है। कहीं निकलती हूँ तो लगता है जैसे जंग पर जा रही हूँ। फौज़ी जैसे बुलेट-प्रूफ जैकेट पहन कर निकलते हैं वैसी ही कुछ तैयारी मेरी भी होती है। एक चौड़ी बेल्ट, जिसको पहन के ऐसा लगता है कि सांस बड़े एहसान के साथ आ रही है। और साथ में अमेरजेंसी किट की तरह एक हीट पैड।

खैर इन सब से सुसज्जित जब मैं मेट्रो में चढ़ी तो मेरी अच्छी किस्मत कि मुझे बैठने की जगह मिल गई। मेट्रो में जगह मिलना मानों दुखती रग पर मलहम। शायद इस समय इससे अच्छा उदाहरण मुझे सूझ भी नहीं पाएगा।

सीट पर बैठते ही मेरी नज़र सामने बैठी एक लड़की पर पड़ी। गोरा रंग, सामान्य कद और तीखे नयन नक्श, पर उस के सारे शरीर पर, चेहरे, बाजूओं पर काले निशान थे। तिल नहीं थे पर कुछ निशान थे जो उस के पीछे के खूबसूरत से चेहरे को छुपा रहे थे। तभी मेरा ध्यान उसके साथ बैठी लड़की पर पड़ा, जिस का रंग उस से सांवला था पर बाकी सब कुछ उससे मिलता था। दोनों बहनें थी शायद और निशान दोनों के चेहरे पर थे। हाँ, उनके पैरों पर वो निशान नहीं थे। और उन्होंने अपने शरीर के उस हिस्से को बहुत अच्छे से सजा रखा था। सुन्दर सी नेल पॉलिश और खूबसूरत सी जूती उनको और दिलक़श बना रही थी। पर उनको इस बात का इल्म था कि शायद ही किसी की नज़रें उनके चेहरे को छोड़ पैरों तक जाएगी। ईश्वर की इस 'नाइंसाफी' पर वो उस से तो नराज़ थी ही खुद से भी ख़फ़ा थी। और दुनिया से छुपने की भी कोशिश कर रही थी।

कमाल की बात यह थी कि पूरे सफ़र के दौरान दोनों ने आपस में कोई बात नहीं की। बस अजनबी की तरह बिना एक दूसरे को देखे, पूरे डिब्बे में निगाहें घुमा रही थी। मानों देख रहीं हो कि कौन-कौन उनकी तरफ़ या कहूँ उनके निशानों की तरफ घूर रहा है। दोनों बहुत ही असहज हो रही थी। खुद से ज्यादा लोगों के बारे में सोच कर परेशान थी वो। मुझे लगा मैंने कुछ देर और उनकी तरफ देखा तो उन्हें लगेगा कि मैं भी उन्हें घूर रही हूँ या उन पर हंस रही हूँ।

पर तभी मैंने देखा कि उनके साथ बैठी एक लड़की उनको नहीं मुझे घूर रही है। पर मुझ में क्या असमान्य बात नज़र आ रही थी उसको, जो वो इतनी गहरी नज़र से देख रही थी? तभी मेरा हाथ मेरी बेल्ट पर गया। ओह! तो उस की नज़र में यह था मेरा विकार। हंसी आई यह सोच कर कि उसके दिमाग के घोड़े पता नहीं कहाँ-कहाँ दौड़ रहे होंगे। सोच रही होगी कितनी छोटी सी उम्र है। पता नहीं कितनी गम्भीर चोट होगी। और भी बहुत कुछ, जहाँ तक उसकी सोच उसको ले जा सकती होगी। 

मुझे तभी अपनी बेटी की कही बात याद आ गई। घर से निकलते समय उसने कहा था, "मम्मा, बेल्ट को सूट के ऊपर नहीं अंदर लगाओ।" उस समय कारण समझ में नहीं आया था। शायद वो बेल्ट मुझे सामान्य से असमान्य बना रही थी। और असमान्य लोगों या चीज़ों को लोगों की बहुत अलग-अलग प्रतिक्रियायें झेलनी पड़ती हैं।

ख़ैर मैंने उस आतुर लड़की से नज़रें नहीं चुराई। एक मुस्कराहट के साथ उसकी तरफ देखा, पर वो मेरी मुस्कराहट भी नहीं झेल पाई और उसने नज़रें घुमा ली। उसके पास मुझसे पूछने के लिए सवाल भी नहीं थे जबकि मेरे पास सब जवाब थे। उसके पास सिर्फ संवेदना थी जो वो देना चाहती थी पर मैं लेना नहीं।

क्या अगर किसी को कोई शारीरिक विकार या असमान्यता है तो उसको समान्य व्यवहार करने का हक़ नहीं है? क्या जरूरी है हर समय उस असमान्यता को ओढ़े रखना? मुस्कुराहट जैसी छोटी ख़ुशी से भी खुद को महरूम करना?
क्यों हम ऐसी कमियों को छुपाने की कोशिश करते हैं जिनके होने में या जिनके ठीक होने में हमारा कोई हाथ नहीं होता? या फिर जिस असमान्यता को हम छुपा नहीं पाते तो उनको ले कर हम लोगों से नज़रें चुराने लगते हैं?

एक असमान्यता या विकार या कमी या जो भी नाम देना चाहें, एक इंसान को दूसरे से अलग नहीं करती। और ना ही उसकी बाकी खूबियों को कम कर देती है। 

किन्ही कारणों से कुछ काम प्रतिबंधित हो सकते हैं या उनको करने का तरीका दूसरों से अलग हो सकता है पर यह सब चीज़ें क्या इतनी सक्षम हैं कि हमारी विचार धारा, जीवन धारा ही बदल दें? आप कुछ समय के लिए कमजोर पड़ सकते हो, खुद से रूठ सकते हो पर जीने की हिम्मत नहीं छोड़ सकते। 

मेरी मुस्कुराहट की प्रतिक्रिया बता रही थी सकारात्मक मनोवृति (सोच) बनाए रखना बहुत मुश्किल नहीं है। जब लोगों को आत्मविश्वास दिखता है तो संवेदना की जगह आँखों में प्रशंसा झलकने लगती है।
 
वो दोनों लड़कियां मेरे गंतव्य से एक स्टॉप पहले उतर गई, आपस में उसी अजनबियत के साथ।

मैं उन दोनों के लिए कुछ ख़ास कर नहीं पाई। पर उनको मेरी नहीं खुद की ज्यादा जरूरत थी और यह बात समझने में उनको शायद समय लगेगा।

प्रीत विहार आ गया था। मैं धीरे-धीरे सीढियां उतर कर नीचे आई तो देखा लिफ्ट से २०-२२ साल का एक लड़का धीमे क़दमों से बाहर आ रहा था। समान्य चाल नहीं थी उसकी। पैर थोड़े टेढ़े थे, पर वो एक छड़ी के सहारे धीरे-धीरे चल रहा था। 

और मुझे ख़ुशी इस बात की थी कि उस का ध्यान लोगों की तरफ नहीं था। वो आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराहट ओढ़े, अपनी सुविधा के अनुसार आगे बढ़ रहा था। और उसका दमकता चेहरा संवेदना की किसी आहट का मोहताज़ नहीं था।

© उपमा डागा पार्थ २०१४

बुधवार, 15 जनवरी 2014

न्यू इयर रेज़ोल्यूशन

कई बार साल इतनी तेजी से गुजरते हैं मानों किसी मैराथन में भाग ले रहे हों और उन्होंने रेस का पहला पुरस्कार लेने की बस ठान ली हो। ऐसा ही कुछ था पिछला साल। इस रफ़्तार से बीता कि पता ही नहीं चला। और अगला साल कब चुपचाप, बिना दस्तक दिए, इस अलसाई सी धूप में आ कर बैठ गया इसका गुमाँ ही नहीं हुआ।

हर नए साल की तरह इस बार भी परिचित वही एक दो सवाल दोहरा रहे थे – क्या उम्मीदें हैं नए साल से? क्या नया प्रण लिया है या क्या बदलाव लाओगे खुद में। और लग रहा था आज कल इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढ़ने में ही सफ़र कट रहा है।

कुछ सोचते हुए मेट्रो में चढ़ती हूँ, कभी वहाँ गुम हो जाती हूँ, कभी जवाबों की जगह कुछ और सवाल साथ ले आती हूँ, कभी आदतन मुस्कुरा देती हूँ तो कभी परिस्तिथीवश माथे पर शिकन आ जाती है।

इन्हीं सब से दो चार होते हुए एक दिन मेट्रो में चढ़ी तो एक खाली सीट को अपना इंतज़ार करते पाया। यकीं मानिए ऐसा नज़ारा विरले ही कभी देखने को मिलता है। तो मैं किस्मत की इस देन को सर आँखों पे लेते हुए उस सीट पर जा बैठी। मेरे साथ एक औरत अपनी बच्ची को गोद में उठाए बैठी थी। नेट वाली आधुनिक साड़ी, उसके उपर स्वेटर नुमा कोट पहने। बालों में पिन इतने ज्यादा लगा रखे थे मानों तेज़ हवा के झोकों को चुनौती देने चली हो कि मेरे बालों को हिला के तो दिखाओ। कुछ यही हाल उनकी साड़ी का भी था। बड़ा बेतरतीब सा मेकअप था यानि पता चल रहा था कि मुंह पर बहुत कुछ लगा रखा है। अब यह 'बहुत कुछ ' 'क्या कुछ ' था तो न तो मेरी नज़र इतनी तेज थी न ही अक्ल। बच्ची को भी अपने ढंग से सजा रखा था। वो बच्ची छटपटा रही थी। अब वो गोद से उतरने के लिए थी या किसी और वज़ह से, यह नहीं पता। खैर मैंने बच्ची का ध्यान दूसरी तरफ करने के लिए उससे बातें शुरू की। एक साल से कम उम्र की थी वो बच्ची और वो शब्दों की न सही आँखों की जुबा बाखूबी समझती थी। 

उस औरत के कपड़ों में से घुटन की गंध आ रही थी। संदूक के अंदर रहने की घुटन, महीनों बंद रहने की घुटन। अब यह गंध सिर्फ मुझे ही आ रही थी या बाकियों को भी, पता नहीं। क्योंकि बाकी सब बिना प्रतिक्रिया के बैठे हुए थे। मेरी प्रतिक्रिया भी इतनी स्पष्ट नहीं थी कि उसको कुछ समझा पाती पर मुझे बहुत बैचनी हो रही थी। वो सजी धजी औरत अपने गंतव्य पर उतर गई। बच्ची की बैचेनी फिर शुरू हो गई और मेरी ख़त्म। पर उसको इस घुटन का अंदाज़ा नहीं था या फिर वो गंध उसमें इतनी रच बस गई थी कि वो उसे अजनबी नहीं लग रही थी।

उस सधारण से भी कुछ ज्यादा दिखने वाली महिला ने मुझे सोच में डाल दिया। कपड़ों की घुटन तो बिना प्रतिक्रिया के फिर भी सही जा सकती है पर विचारों की...

उस प्रकरण के बाद मेट्रो में चढ़ने उतरने का क्रम कुछ दिन थम सा गया था या यूं कहिए एक अल्पविराम था। दौड़ती भागती जिंदगी दोबारा ट्रैक पर थी और मैं दोबारा मेट्रो में। किसी छुट्टी का दिन था। कामकाजी श्रेणी मेट्रो से नदारद थी आज और उसकी जगह नाते रिश्तेदारों से मिलने वालों की ही भीड़ ज्यादा दिख रही थी। यह मैंने बच्चों और बड़े बड़े बैग के साथ सफ़र कर रही महिलाओं को देख कर अंदाज़ा लगाया। और इस भीड़ की वज़ह से मेट्रो खाली होते हुए भी उसमें बैठने की जगह नहीं थी। मैं खड़े खड़े उन हँसते मुस्कुराते चेहरों की तरफ देख रही थी जो बदलाव से खुश थे। रोजमर्रा की जिंदगी के बदलाव से, किसी और से मिलने का बदलाव।

दो-तीन साल की एक बच्ची ने साथ बैठी महिला के हाथों की तरफ देख कर अपनी मम्मी को बोला, "मम्मी! मेहँदी"। मम्मी  मुस्कुरा दी और वो आंटी भी। फिर उसके पैरों की तरफ देख कर बोली, "मम्मी! नेलपॉलिश"। दोनों औरतें फिर मुस्कुराई। वो फिर आँखों की तरफ देख कर बोली, "मम्मी! लाइनर"। वो महिला जिसकी शान में उस बच्ची ने कसीदे पढ़े थे, उठते हुए बोली, "बड़ी स्वीट है", और बाय कहते हुए उतर गई। अब उस बच्ची के सामने एक नया चेहरा था। मैंने उसकी मम्मी को बोला, "बहुत ध्यान से सब देखती है।" तो वो हँसते हुए बोली, "मेकअप का बहुत शौंक है इसको।" मैं मुस्कुरा दी। उसका ध्यान अब पूरा मुझ पर था। मैंने हँसते हुए कहा, "बेटा, यहाँ तुम शौंक पूरा नहीं कर पाओगी। कुछ नहीं मिलेगा यहाँ तुम्हारे मतलब का।" इतने में वो चिल्ला के बोली, "मम्मी! लिपस्टिक।" 

हम दोनों हस पड़े। मैंने यह वाकई सोचा नहीं था। उसकी मम्मी ने हँसते हुए कहा, "आप इसकी नज़रों से बच नहीं सकते।" मैं मुस्कुरा दी और वो चली गई। अब एक सरदार बच्चा मेरे पास सरक गया। उसकी मम्मी और भाई भी थे साथ में। अपने  बच्चों, खास कर उस छोटे बेटे को व्यस्त रखने के लिए उसकी मम्मी बार-बार अपने स्मार्ट फोन पर एक गाना चलाती, वो छोटा सा सरदार उठता और पैर हल्के से चलाने लगता पर पूरी तरह नाच नहीं रहा था। उसकी मम्मी ने मेरी तरफ देख कर कहा कि घर पे तो अब तक खूब तेज डांस शुरू हो जाता है। मैंने प्यार से मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा।

अचानक मुझे कुछ भूख सी लगी तो याद आया कि मेरे पर्स में एक चुइंगम पड़ी है तो निकाल कर मुँह में डाली और थोड़ी देर बाद इधर उधर देखते हुए गुब्बारा फुला दिया। यह करना था कि छोटे सरदार जी मेरे पास आ कर बैठ  गए। गाना वाना छोड़ कर लगातार मेरे मुँह की तरफ देखने लगे। मैंने उसके लिए फिर से गुब्बारा फुलाया। उसने खुश हो कर अपने भाई और मम्मी की तरफ देखा फिर दोबारा मेरी तरफ कि फिर फुलाओ। अब मैं फरमाईश पर गुब्बारे फुला रही थी। दो तीन बार ऐसा करने पर मैंने कहा अब बस। फिर वो अपनी मम्मी की तरफ घूम कर उनके मुँह की तरफ देखने लगा। उसकी मम्मी ने हँसते हुए कहा मेरे पास नहीं है। मैंने कहा, "अब  स्टेशन पर उतरते ही सबसे पहला यही काम करना," और मैंने हँसते हुए उनसे विदा ले ली।

मेट्रो की सीढियाँ उतरते हुए सोच रही थी बदलाव सबको दीखता है और अच्छा भी लगता है, पर उस बदलाव के लिए या यूं कहिए कि बदलाव दिखाने के लिए खुद को बदलना क्या तर्कसंगत है? यही सोचते हुए मैं अपने काम की तरफ बढ़ गई। 

वापसी में ठण्ड के मीठे से एहसास को खुद में समेटे हुए अपने  ठंडे से हाथों को रगड़ कर गरम करने की कोशिश कर रही थी। मैंने अपने बचपन को याद करते हुए मुँह से दो तीन बार हवा निकाली पर वो मुँह से छल्ले बन के निकलते थे वो नहीं निकल पाये। थोड़ी सी उदासी हुई कि अभी भी उतनी ठण्ड नहीं आई जितनी बचपन में हुआ करती थी। बचपन वाली उस ठण्ड में मम्मी पूरी बांह वाले स्वेटर के साथ एक आधी बाजू वाला स्वेटर तो पहनाती ही थी कभी-कभी दो के ऊपर एक और भी पहना दिया जाता था। स्कार्फ़ और जुराबें तो होती ही थी। दस्ताने मेरे लिए बहुत जरूरी नहीं थे क्योंकि मेरे हाथ उनमें भी ठन्डे ही रहते थे। ख़ैर! मेरे बचपन वाली ठण्ड ज्यादा ठंडी थी यह तय था इसलिए सर्दी होते हुए भी कम लग रही थी। 

मेट्रो आने पर लगा आज तो जगह मिल ही जाएगी और आज अपने पूर्वानुमान में मैं गलत  नहीं थी। बैठ कर नज़र दौड़ाई तो ज्यादातर लड़कियाँ और औरतें अपने मोबाइल फ़ोन पर व्यस्त थी। एक बड़ी-बड़ी और बोलती आँखों वाली लड़की मेरे सामने बैठी थी। उसकी मम्मी कुछ अपनी ही सोचों में ग़ुम थी। बच्ची ने हाथ में एक लिफ़ाफ़ा पकड़ रखा था और जिस अधिकार से उसने वो लिफाफा पकड़ रखा था और जिस तरह वो बार-बार उसे देख रही थी यह निश्चित था कि उसमें उसका ही सामान था। तो उस शांत सी लड़की ने, अपनी मम्मी को तंग न करते हुए, डिब्बे में एक नज़र दौड़ाई। कोई उसकी तरफ देख नहीं रहा था और सब अपनी वर्चुअल दुनिया में व्यस्त थे। उसने अपने पास बैठी महिला के मोबाइल पर नज़र डाली उसने एयरफोन लगाए हुए थे अब वो गाने सुन रही थी या कुछ और कर रही थी पता नहीं, पर बच्ची को उसकी काल्पनिक दुनिया में मज़ा नहीं आया और वो वापिस इधर उधर देखने लगी। 

उसने वापिस डिब्बे में नज़र दौड़ाई। मेरी तरफ वाली सीट पर बैठी दो लड़कियाँ किसी बात पर हंस रही थी। अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से इस बड़ी सी दुनिया को निहारती वो बच्ची उनको हँसते देख कर मुस्कुराई मानों कह रही हो कोई तो है यहाँ पर जो वर्चुअल में नहीं वास्तविकता में जीता है।

यमुना बैंक से भीड़ का एक रेल चढ़ा। चित्रकार को अचानक एक बड़ा सा कैनवास दे दिया जाता है पेंट करने को और वो सोच में हो कि वो कहाँ से शुरू करे। कुछ ऐसी ही हालत उस लड़की की भी थी। वो जैसे चेहरे को पढ़ना चाहती थी, हर हंसी के साथ मुस्कुराना चाहती थी।

दोनों माँ बेटी एक दूसरे की तरफ ना देखते हुए भी एक ही दिशा में देख रही थी। तो बच्ची में जो ठहराव सा दिख रहा था वो माँ की वज़ह से था। दोनों की निगाहें जब टकराती तो जैसे दो गंभीर लोग एक दूसरे को देख कर मुस्कुराते हैं वहीँ भाव उनके चेहरे पर भी  आते थे। 

मैं उस बच्ची से  प्रभावित हो कर उसकी तरफ देख रही थी। अचानक मुझे लगा कि मेरा अक्स थोडा छोटा हो कर, कद और उम्र में, मेरे सामने बैठा है। और बिन कही कहानियाँ बीनने की कोशिश कर रहा हो। 

अच्छा लगा देख कर कोई तो है जो इस दुनिया को, उसके हर रंग को, उसके लोगों को देखना समझना चाहता है। अब इस चाहत का नतीज़ा जो चाहे निकले। 

हम लोग साथ ही साथ बाहर निकले तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछा, "इसमें आपका सामान है।" उसने मुस्कुरा कर हाँ कहा। बात करते हुए उस शांत सी दिखने वाली लड़की में एक चंचलता भी दिखी और कुछ शैतानी भी। तो उस लिफाफे में उसकी रंग बिरंगी नई पंजाबी जूती थी और एक पर्स भी जो बहुत इसरार के बाद भी उसने मुझे नहीं दिखाया। 
उसको बाय कह के निकली तो लगा मेरे सारे सवालों के जवाब हैं मेरे पास।

विचारों की घुटन को भावों की धूप लगाते रहना पड़ेगा और साथ ही दिखावे वाले बदलाव से अच्छा है खुद को, अपनी वास्तविकता को सहेज कर रख लूँ। और जहाँ तक पूरे साल में या आगे क्या कुछ करने का सवाल है तो उसका सीधा सा जवाब यही है कि हमें तो सफ़र करते रहना है, सफ़र में जितनी दास्तानें मिलेंगी वो सुनते जाना है और कही मौका मिला तो अपनी दास्ताँ भी सुनाते जाना है। 

जिंदगी के इन अनसुलझे सवालों का राजदार मैं ही हूँ,
तमाशा है गर यह दुनिया तो तमाशबीन मैं ही हूँ... 

© उपमा डागा पार्थ २०१४