मेट्रो लाइफ में कितनी भाग दौड़ है, यह पता तो था पर
रफ़्तार कभी-कभी इतनी तकलीफ़देह भी हो सकती है इसका पता आजकल चल रहा है। कहीं
निकलती हूँ तो लगता है जैसे जंग पर जा रही हूँ। फौज़ी जैसे बुलेट-प्रूफ
जैकेट पहन कर निकलते हैं वैसी ही कुछ तैयारी मेरी भी होती है। एक चौड़ी
बेल्ट, जिसको पहन के ऐसा लगता है कि सांस बड़े एहसान के साथ आ रही है। और
साथ में अमेरजेंसी किट की तरह एक हीट पैड।
खैर इन सब से सुसज्जित जब मैं मेट्रो में चढ़ी तो मेरी अच्छी
किस्मत कि मुझे बैठने की जगह मिल गई। मेट्रो में जगह मिलना मानों दुखती रग
पर मलहम। शायद इस समय इससे अच्छा उदाहरण मुझे सूझ भी नहीं पाएगा।
सीट पर बैठते ही मेरी नज़र सामने बैठी एक लड़की पर पड़ी। गोरा रंग, सामान्य कद और तीखे नयन नक्श, पर उस के सारे शरीर पर, चेहरे, बाजूओं पर काले निशान थे। तिल नहीं थे पर कुछ निशान थे जो उस के पीछे के खूबसूरत से चेहरे को छुपा रहे थे। तभी मेरा ध्यान उसके साथ बैठी लड़की पर पड़ा, जिस का रंग उस से सांवला था पर बाकी सब कुछ उससे मिलता था। दोनों बहनें थी शायद और निशान दोनों के चेहरे पर थे। हाँ, उनके पैरों पर वो निशान नहीं थे। और उन्होंने अपने शरीर के उस हिस्से को बहुत अच्छे से सजा रखा था। सुन्दर सी नेल पॉलिश और खूबसूरत सी जूती उनको और दिलक़श बना रही थी। पर उनको इस बात का इल्म था कि शायद ही किसी की नज़रें उनके चेहरे को छोड़ पैरों तक जाएगी। ईश्वर की इस 'नाइंसाफी' पर वो उस से तो नराज़ थी ही खुद से भी ख़फ़ा थी। और दुनिया से छुपने की भी कोशिश कर रही थी।
कमाल की बात यह थी
कि पूरे सफ़र के दौरान दोनों ने आपस में कोई बात नहीं की। बस अजनबी की तरह
बिना एक दूसरे को देखे, पूरे डिब्बे में निगाहें घुमा रही थी। मानों देख
रहीं हो कि कौन-कौन उनकी तरफ़ या कहूँ उनके निशानों की तरफ घूर रहा है।
दोनों बहुत ही असहज हो रही थी। खुद से ज्यादा लोगों के बारे में सोच कर
परेशान थी वो। मुझे लगा मैंने कुछ देर और उनकी तरफ देखा तो उन्हें लगेगा कि
मैं भी उन्हें घूर रही हूँ या उन पर हंस रही हूँ।
पर तभी मैंने देखा कि उनके साथ बैठी एक लड़की उनको नहीं
मुझे घूर रही है। पर मुझ में क्या असमान्य बात नज़र आ रही थी उसको, जो वो
इतनी गहरी नज़र से देख रही थी? तभी मेरा हाथ मेरी बेल्ट पर गया। ओह! तो उस
की नज़र में यह था मेरा विकार। हंसी आई यह सोच कर कि उसके दिमाग के घोड़े पता
नहीं कहाँ-कहाँ दौड़ रहे होंगे। सोच रही होगी कितनी छोटी सी उम्र है। पता
नहीं कितनी गम्भीर चोट होगी। और भी बहुत कुछ, जहाँ तक उसकी सोच उसको ले जा
सकती होगी।
मुझे तभी अपनी बेटी की कही बात याद आ गई। घर से निकलते
समय उसने कहा था, "मम्मा, बेल्ट को सूट के ऊपर नहीं अंदर लगाओ।" उस समय
कारण समझ में नहीं आया था। शायद वो बेल्ट मुझे सामान्य से असमान्य बना रही
थी। और असमान्य लोगों या चीज़ों को लोगों की बहुत अलग-अलग प्रतिक्रियायें
झेलनी पड़ती हैं।
ख़ैर मैंने उस आतुर लड़की से नज़रें नहीं चुराई। एक
मुस्कराहट के साथ उसकी तरफ देखा, पर वो मेरी मुस्कराहट भी नहीं झेल पाई और
उसने नज़रें घुमा ली। उसके पास मुझसे पूछने के लिए सवाल भी नहीं थे जबकि
मेरे पास सब जवाब थे। उसके पास सिर्फ संवेदना थी जो वो देना चाहती थी पर
मैं लेना नहीं।
क्या अगर किसी को कोई शारीरिक विकार या असमान्यता है
तो उसको समान्य व्यवहार करने का हक़ नहीं है? क्या जरूरी है हर समय उस
असमान्यता को ओढ़े रखना? मुस्कुराहट जैसी छोटी ख़ुशी से भी खुद को महरूम
करना?
क्यों हम ऐसी कमियों को छुपाने की कोशिश करते हैं जिनके
होने में या जिनके ठीक होने में हमारा कोई हाथ नहीं होता? या फिर जिस
असमान्यता को हम छुपा नहीं पाते तो उनको ले कर हम लोगों से नज़रें चुराने
लगते हैं?
एक असमान्यता या विकार या कमी या जो भी नाम देना
चाहें, एक इंसान को दूसरे से अलग नहीं करती। और ना ही उसकी बाकी खूबियों को
कम कर देती है।
किन्ही कारणों से कुछ काम
प्रतिबंधित हो सकते हैं या उनको करने का तरीका दूसरों से अलग हो सकता है पर
यह सब चीज़ें क्या इतनी सक्षम हैं कि हमारी विचार धारा, जीवन धारा ही बदल
दें? आप कुछ समय के लिए कमजोर पड़ सकते हो, खुद से रूठ सकते हो पर जीने की
हिम्मत नहीं छोड़ सकते।
मेरी मुस्कुराहट की प्रतिक्रिया बता रही थी सकारात्मक
मनोवृति (सोच) बनाए रखना बहुत मुश्किल नहीं है। जब लोगों को आत्मविश्वास
दिखता है तो संवेदना की जगह आँखों में प्रशंसा झलकने लगती है।
वो दोनों लड़कियां मेरे गंतव्य से एक स्टॉप पहले उतर गई, आपस में उसी अजनबियत के साथ।
मैं उन दोनों के लिए कुछ ख़ास कर नहीं पाई। पर उनको मेरी नहीं खुद की ज्यादा जरूरत थी और यह बात समझने में उनको शायद समय लगेगा।
प्रीत विहार आ गया था। मैं धीरे-धीरे सीढियां उतर कर
नीचे आई तो देखा लिफ्ट से २०-२२ साल का एक लड़का धीमे क़दमों से बाहर आ रहा
था। समान्य चाल नहीं थी उसकी। पैर थोड़े टेढ़े थे, पर वो एक छड़ी के सहारे
धीरे-धीरे चल रहा था।
और मुझे ख़ुशी इस बात की थी कि उस का ध्यान लोगों
की तरफ नहीं था। वो आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराहट ओढ़े, अपनी सुविधा के
अनुसार आगे बढ़ रहा था। और उसका दमकता चेहरा संवेदना की किसी आहट का मोहताज़
नहीं था।
© उपमा डागा पार्थ २०१४
शारीरिक विकारों की अपेक्षा मानसिक अपंगता मनुष्यों का अातमविशवास ज्यादा कमजोर करती है। मनुष्य की सहमति के बिना उसे कोई इनफिरियर नहीं बना सकता।
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