रविवार, 2 नवंबर 2014

थैंक यू

खुद की गुलामी करते करते जब कोई उकता जाए तो उसे कभी कभी अपने आप को मौसम के हवाले कर देना चाहिए। अच्छा लगता है मौसम में ख़ुशी की सोंधी सी महक का एहसास करके जो बस जिंदगी के खुशगवार रंग की तस्वीर आँखों के आगे कर देती है।

पिछले एक हफ्ते से मैं रोज इस महक को महसूस कर रही थी। सड़कें, बस स्टॉप यहाँ तक कि मेट्रो भी ऐसा लगता था कि मानों सारे शहर ने कूरियर वालों के यहाँ नौकरी कर ली हो और मेट्रो पब्लिक ट्रांसपोर्ट न बन कर कूरियर कंपनी की गाड़ी हो।

उपहारों से भरे, लदे फदे लोग। हाँ गिनती सब के हाथ में अलग अलग होती थी।

जिनके हाथ में कोई डिब्बा नहीं होता वो लदे फदे लोगों को गाड़ी में जगह देने में पूरी दरियादिली दिखाते। मानों कह रहे हो, देखो आज हमारी बारी नहीं थी पर कल अगर हमारे हाथ में कुछ हो तो हमारी भी इतने ही प्यार से मदद करना।

मैं रोज त्यौहारों की चमक वाले चेहरों की रौनक बटोर कर ऑफिस और घर के कामों में ताल मेल बिठा रही थी। और वो एक अदद दिवाली की छुट्टी कब आ के कब चली गई पता भी नहीं चला।

खैर! अच्छा या बुरा दौर अपनी रफ़्तार कम नहीं करता। फर्क सिर्फ इतना है कि अच्छे दौर के रुकने का हम इसरार करते हैं और बुरे दौर के गुजरने का इंतज़ार।

तो जिंदगी खास से आम बनने के लिए लगातार आवाज़ दे रही थी और जिंदगी को आप दूसरी आवाज़ लगाने की जिद तो कर सकते हैं, पर उसको अनसुना नहीं कर सकते। तो आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी आवाज़ पे एक बार फिर दौड़ने को तैयार थे सब। वो अलग बात है की मेरा रोल नंबर पहला था। जी! मेरी ड्यूटी इतवार से शुरू हो रही थी।

खुद को घसीटने में थोड़ी देर हुई तो भागते हुए सोचा कि घड़ी इतनी तेज़ कैसे चल सकती है। यह बात ज्यादा महसूस तब हुई जब प्लेटफार्म पर पैर रखते ही मेट्रो ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए। पैर पटक कर खुद को चोट पहुँचाने से अच्छा मैंने इंतज़ार करना समझा।

पूरे ६ मिनट बाद आई मेट्रो। और इस ६ मिनट में मैंने १६ बार तो घड़ी देखी ही होगी, यह जानते हुए भी कि बार बार देखने पर भी घड़ी की सुई तेज नहीं चलेगी। भीड़ थी मेट्रो में तो बैठने की जगह नहीं मिली। कोने में खड़ी परेशान होते होते मुझे लगा अब  मेट्रो से पहले तो पहुँचने से रही। तो खुद को थोड़ा शांत करते हुए एक ठंडी सांस छोड़ी और डिब्बे में नज़र दौड़ाई।

डिब्बे में कुछ खास बदलाव नहीं था। "मैं और मेरा फ़ोन" का इश्तहार बनी लड़कियां नज़र आई चारों तरफ। इक्का-दुक्का पढ़ने वाली लड़कियाँ। इन्हें देख कर मुझे बड़ी ख़ुशी होती थी। यह मुझे किताबों के जिन्दा होने का एहसास करवाती है।

पर इस भीड़ में वो सबसे अलग थी। बहुत ख़ूबसूरत नहीं — साधारण से चेहरे वाली। पर एक अजीब सी चुप्पी थी उसके चेहरे पे। त्यौहारों की रौनक के बाद ऐसी मायूसी। थोड़ी ही देर में उसकी आँखों से आंसू भी टपकने लगे। वो भी कोई खास कोशिश नहीं कर रही थी उनको रोकने की। बस बीच-बीच में उसके हाथ आँखों पे जाते और वो आंसू साफ़ कर लेती।

मैं उसके पास जा कर उसकी मुश्किलें बढ़ाना नहीं चाहती थी। क्योंकि जो कुछ भी दबा-दबा था सब बाहर आ रहा था। शायद उसे वक़्त चाहिए था। एक सफर तक का वक़्त।

अचानक उसके फोन की घंटी बजी। उसने पहले अपने आंसू पोंछे, फिर खुद पे पूरी तरह काबू पा कर फ़ोन उठाया। बात करते करते आँखों पे रह गई नमी भी सूखने लगी।

फ़ोन पे दूसरी तरफ से शब्दों का मरहम लगा कि नहीं पता नहीं पर अब उसमे एक जिद नज़र आ रही थी — खुद से लड़ने की। पानी की कुछ बूंदे कई बार मिटटी को इतना मजबूत कर देती हैं कि वहाँ कीचड़ नहीं होता बल्कि एक बुनियाद बन जाती है।

मुझे अचानक मेट्रो स्टेशन के एस्कलेटर के पास मिली आंटी की याद आई। ७०-७५ साल उम्र रही होगी आंटी की। एस्कलेटर पर चढ़ने से हिचक रही थी। मैंने उनके पीछे खड़े होकर उनका इंतज़ार किया फिर कहा लाइए मैं आपको ले चलू आंटी। आंटी ने मुड़ कर मेरी तरफ देखा और बोला, "थैंक यू बेटा। पर अगर इस बार तुम मेरा हाथ पकड़ कर ले गई तो मैं हर बार चढ़ने से पहले तुम्हे कहाँ से ढूंढूगी।" मैं हैरान, या कहूँ तो नतमस्तक थी उनके इस ज़ज्बे को देख कर।

वो फिर बोली, "तुम बस मुझे यह बताओ कैसे और क्या करना है।" मैंने उनको पहले रेलिंग पकड़ने, फिर पैर रखने से ले कर सब कुछ बता दिया और उनके जाने का इंतज़ार किया। उनके चढ़ने के बाद मैं भी चल दी। प्लेटफार्म पर पहुँच कर उन्होंने फिर से मेरा धन्यवाद किया और कहा अब अगली बार मुझे चढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

आज एक बार फिर लगा कितनी सही थी वो। एक बार अगर हम अपनी कमजोरी पे काबू पाने की कोशिश करे तो वो कमजोरी अगली बार हम पर उतनी या फिर बिलकुल भी हावी नहीं हो पायेगी। और यह करने के लिए किसी के बढ़े हुए हाथ की नहीं, बल्कि आपने खुद का हाथ बढ़ाने की जरूरत होती है।

वो मेरे साथ ही राजीव चौक उतरी। मैं अभी भी चोर आँखों से उसे देख थी। पर उसने शायद डिब्बे में ही मेरी चोरी पकड़ ली थी। हम कुछ कदम साथ चले उतने में उसने एक फीकी सी मुस्कान मेरी तरफ़ डाली। और बड़े अपनेपन से मुझे यह जताया कि अब वो ठीक है। एक मूक सी तसल्ली थी… पर  काफी थी… दोनों के लिए शायद।

पटेल चौक की तरफ बढ़ते हुए अपनी लिखी कुछ पंक्तियाँ यूं ही याद आ गई।

माना कि आसां नहीं है इम्तिहाने-जिंदगी,
मेरे हौसलों की इबारत भी मगर,
हर मसले का हल रखती है…

© उपमा डागा पार्थ २०१४

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