शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

बदलता मौसम

Photo by Nick V as published in NixPixMix
मौसम बदल रहा है। गर्मी ने विदाई ले ली है और ठण्ड हौले से दस्तक दे रही है। मौसम लेकिन सब पर एक ही तरह से असर नहीं करता। कुछ लोग मौसम के अनुरूप ढलने में समय नहीं लेते जबकि कुछ लोगों को उसे अपनाने में या उसके साथ चलने में काफी वक़्त लगता है। हर कोई मौसम को अपने पैमाने पर ही आंकता है। 

तो मौसम का मिला जुला असर आजकल मेट्रो में भी देखने को मिल रहा है। कुछ लोग तो आधी बाजू वाली टी-शर्ट में नज़र आते हैं तो कुछ ने स्वेटर के साथ शाल या जैकेट भी पहनी होती है। इन दिनों ना चाहते हुए भी मुझे दूसरे वर्ग का साथ देना पड़ रहा है। तबीयत थोड़ी नासाज़ होने के कारण वैसे तो घर से निकलना ही थोड़ा कम हो रहा है, अगर निकलती भी हूँ तो मेरे 'तीमारदार' बस लिहाफ ओढ़ाने की ही कसर छोड़ते हैं। 

मेरे आस पास रहने वाले मेरे शुभचिंतक मुझे यह एहसास दिलवाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह उम्र के अगले पड़ाव की दस्तक है। 

खैर, हम मौसम की बात कर रहे थे। तो मेट्रो में एक लड़की ने पसीना बहाने वाली गर्मी में पहने जाने वाली एक पतली सी टी-शर्ट और कैप्री पहनी हुई थी। मन में सोचा क्या यह लड़की आज मौसम के साथ बगावत करने के लिए निकली है ?

वो लगातार फ़ोन पे बात कर रही थी। रह-रह कर उसका स्वर तेज हो जाता। बात ऑफिस के माहौल की हो रही थी जिसमें अचानक आया बदलाव उसकी समझ से परे था। एक तरफ़ा बातचीत के कुछ अंशों ने मुझे भी परेशान कर दिया।

"मैं नहीं समझ पा रही कि अचानक सबको मुझसे क्या प्रॉब्लम हो गई है... मेरे ऑफिस पहुँचते ही कामों की लम्बी लिस्ट मुझे पकड़ा दी जाती है। ऑफिस में कहीं भी, कुछ भी गलत होता है तो मेरा ही नाम लिया जाता है।"

"पता नहीं।"

"शायद अनिल सर जब से गए हैं तब से।"

"अरे! अब उन्होंने अगर कुछ किया है तो मैं क्या कर सकती हूँ?"

एक विराम...
एक ठंडी आह...

"चल ठीक है बाद में बात करती हूँ।"

अचानक आये बदलाव को ले कर रोष था, पर उससे ज्यादा झलक रही थी उस रोष को सही जगह पर न जता पाने की असमर्थता और पूरे माहौल की असहजता को न सह पाने की विवशता। शायद उस बदलाव के आगे उसको मौसम के थपेड़े ज्यादा भारी नहीं लग रहे थे। 

माथे पर बल डाले और लगभग पैर झटकते हुए वो अपने गंतव्य पर उतर गई। इन सबसे कोई समाधान मिलना मुझे तो सम्भव नहीं लग रहा था। पर फ़िलहाल वो किसी समाधान की तलाश में नहीं थी शायद। सर्द मौसम में गर्म कॉफ़ी के घूँट की तरह उसे बस किसी ऐसे शख्स की तलाश थी जो सिर्फ उसको सुने।

उसके जाने के बाद डिब्बे में सन्नाटा था यह तो नहीं कहूँगी पर हाँ मैं काफी देर तक उसी के बारे में सोचती रही। तो शायद मेरा ध्यान किसी और चीज़ पर नहीं गया। 

वर्तमान में वापिस आते ही आस पास का माहौल फिर से जीवंत हो उठा। मेरी बगल में बैठी एक मोहतरमा पूरी तरह से अपने फ़ोन में बजने वाले गाने में मगन थी। उनके होंठ तो गुनगुना ही रहे थे, पैर भी उसकी धुन पर थिरक रहे थे। 

बड़ा सकूं मिलता है ऐसे लोगों को देख कर जो हर पल का लुत्फ़ उठाने की कोशिश करते हैं। जिंदगी अगर सिर्फ हसीं पल ही ले कर आए तो हमारे होंठो पे कभी-कभी अचानक आने वाली मुस्कुराहट हमें कभी भी गुदगुदा नहीं पाएगी। 

उस मोहतरमा कि तरफ से नज़रें हटाई तो सामने ४५-५० साल की दो महिलाएं बैठी हुई थी। किसी मुद्दे पर, जो उनके हाव भाव के मुताबिक काफी गम्भीर लग रहा था, दोनों चर्चा कर रही थी। 

बात करते करते उनकी मुख मुद्रा अचानक बड़ी कठोर हो जाती, फिर वो धीरे-धीरे नरम पड़ती पर बात कभी भी मुस्कुराहट तक नहीं पहुँच पाई। उनकी भाव भंगिमा से पता चल रहा था कि उनके घर की परिस्थितियां इस समय उनके अनुकूल नहीं हैं। बीच-बीच में उनकी मुद्राओं की कठोरता का कम होना इस तरफ इशारा दे रहा था कि वो इन समस्याओं से जूझ तो रही हैं पर अभी तक उनका समाधान नहीं मिल पाया है। 

प्रीत विहार आने वाला था, मैं उठ गई। देखा तो वो दोनों औरतें भी उठ गई। उनकी बातों का क्रम खत्म होने को था। और अब हल्की सी मुस्कुराहट होठों के कोने से झाँक रही थी। 

लगा वो अपने सारे दुःख, तकलीफें, समस्याएं छोड़ने के लिए ही मेट्रो में आई थी। एक गुबार जो हमारे -साथ चलता है, उसको अगर निकाल दिया जाए तो आगे नए हादसों, नई परिस्तिथियों को झेलने की शक्ति मिल जाती है। 

कितनी समस्याएं जिंदगी में ऐसी होती हैं जो अपने हल से पहले दिल से बाहर आने का रास्ता ढूंढ़ती हैं। 

यह सही है कि सिर्फ कहने भर से उनसे मुक्ति तो नहीं मिलती पर समाधान मिलने की एक झीनी सी उम्मीद जरूर बंध जाती है और  आगे बढ़ने के लिए वो उम्मीद ही काफी होती है। 

स्टेशन पर उतरते ही ठण्ड के एक झोंके ने मेरा स्वागत किया। पर फिलहाल मैं उस झोंके को अपनी सोच पर हावी नहीं होने देना चाहती थी। मन में यह सवाल उठ रहा था कि क्या आने वाले मौसम की तरह आने वाली समस्याओं का पूर्वानुमान सम्भव है? क्या समस्याओं के अधखुले सिरे उनको और जटिल बना देते हैं? और क्या कई बार सिर्फ गुबार निकालना ही काफी है…।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

सोमवार, 16 सितंबर 2013

मुस्कुराता बचपन

लगभग एक साल पहले की बात है। दिल्ली में राजीव चौक पर खड़े, मैं दौड़ते-भागते लोगों के रेले के बीच में मानों बुत बने खड़ी थी और लोग इतनी तेजी से इधर से उधर चल रहे थे की लग रहा था कि बंद आँखों से भी वे वहां पहुँच जायेंगे जहाँ कि मेट्रो में उन्हें जाना है।

आज लगभग एक साल बीत जाने पर ऐसा लग रहा है कि उस बुत के पैरों में भी वही स्प्रिंग लग गए हैं और बिना अभिव्यक्तियों के वो भी उस रेले के साथ बस बढ़ता ही चला जा रहा है।

बहुत बदलाव आये इस एक साल में। अच्छा बुरा समय। कभी जिन्दगी खींच कर एक रास्ते पर ले जाती, तो कभी मैं उसको उस डगर पर ले जाती जहाँ मैं जाना चाहती थी।

और जो दिखने वाले बदलावों में था वो था मेरा सफ़र, जो कि तिगुनी रफ़्तार से बढ़ गया था। तो अब जितना मेट्रो से सफ़र होता था उतना ही बस से भी और शायद उतना ही पैदल भी। पर अब आम से लोगों की रोजमर्रा की ख़ास कहानियाँ कुछ दूर सी लगने लगी थी। और जब इस बात का एहसास हुआ तो खुद से ही शिकायत की। अपनी थकी हुई सी भावनाओं को झंझोड़ कर फिर से अपने सफ़र की शुरुआत की। बिल्कुल उस बच्चे की तरह जो पहली बार स्कूल जा रहा हो। जितने सच्चे भाव आप एक बच्चे के मुँह पर देख सकते हैं वो किसी वयस्क के चेहरे पर विरले ही देखने को मिलते हैं।

सफ़र की शुरुआत में ही उस निश्छल बचपन से मुलाकात हो गई। सात आठ साल का बच्चा स्कूल यूनिफार्म में। दो-तीन साल बड़ी बहन ने उसका और अपना बैग पकड़ा हुआ था। लड़के के दोनों पैरों में क्ल्चेस लगे थे।

सोचा जिस दिन जिन्दगी आशा का दमन छोड़ देगी तो उस दिन जिन्दगी का क्या हश्र होगा?

एक सलाम किया उस संघर्ष को जो वो बच्चा अपनी जिन्दगी के लिए कर रहा था और उस परिवार को जो उसको मुश्किलों में जीना भी सिखा रहा था, और उनसे लड़ना भी।

हमने जल्दी से मुस्कुराहटों का आदान प्रदान किया और अपने-अपने रास्तों पर बढ़ गए। उसने मेरी आँखों में अपने लिए सम्मान के भाव पढ़ लिए थे शायद और मैंने उसकी आँखों में दृढ़ता के। लगा शुरुआत अच्छी हुई है तो अंत भी अच्छा ही होगा।

अब बारी बस की थी। बस में २०-२२ की लड़की। गोद में एक डेढ़ साल के बच्चे को सँभालने की कोशिश कर रही थी। कभी अपनी साड़ी का गिरता पल्लू संभालती और कभी लुढ़कता हुआ बच्चा। पता चल रहा था कि उस छोटी सी माँ को अभी बहुत कुछ सीखना था। वो बच्चे को कभी गोदी में लिटाती तो कभी कंधे पर। पर बच्चे की बेकरारी कायम थी। धूप खिड़की से छन-छन कर आ रही थी।

गर्मी में उसकी पूरी बाजू की शर्ट भी उसे परेशान कर रही थी। तो मैंने एक अनुभवी माँ होने का सर्टिफिकेट दिखाए बिना उससे कहा, "इसे प्यास लगी है।"

उसने कहा, "अभी आनंद विहार पर ही तो पानी पिलाया था।"

मैंने फिर कहा, "गर्मी में बड़ों की हालत ख़राब हो रही है, यह तो फिर एक बच्चा है।"

फिर मैंने उसके बिना पूछे, सफ़र में जाते समय, खास कर छोटे बच्चे के साथ रखने वाली चीज़ों की एक पूरी लिस्ट बता दी। पहले मैंने उसकी शर्ट की बाजू ऊपर करवाए, फिर एक मिंट वाली टॉफ़ी दी उसे क्योंकि पानी मेरे पास भी नहीं था। इतने में वो बच्चा मेरे साथ खेलने लग गया। पर मेरे लम्बे से सफ़र का एक पड़ाव ख़तम होने को था और लग रहा था कि अभी भी मेट्रो से काफी दूर थी मैं। बरहाल बच्चे ने बड़े प्यार से मुझे हाथ हिला कर बाय बोला मानों कह रहा हो मम्मी को समझाने के लिए धन्यवाद।

मेट्रो स्टेशन पर जाने के लिए एक एस्कलेटर पर चढ़ी तो उसमें तीन-चार बच्चे, एकदम मलंग, पूरी मस्ती में एस्कलेटर से ऊपर तक जाते फिर नीचे उतारते। यह खेल उन्हें बड़ा मजेदार लग रहा था। बिना मेहनत के मजे करते हुए जाओ फिर भाग के नीचे उतरो।

उसका दूसरी साइड वाला एस्कलेटर काम नहीं कर रहा था और बड़ी हैरानी हुई मुझे यह देख कर कि ग्रुप का सबसे बड़ा लड़का एस्कलेटर के नीचे लगे लाल बटन दबा रहा था मानों वो ही चालू करेगा इसको। मुझे लगा चाहे जिन्दगी ने इनको पूरी सुविधाएँ नहीं दी हैं पर ये खुद को किसी का मोहताज़ नहीं समझते। वे अपनी क़ाबलियत का प्रदर्शन करने का मौका जहाँ भी मिलता है कर देते हैं।

आज लग रहा था मानों चारों तरफ बचपन ही बिखरा हुआ है। अलग-अलग रंगों में। मानों हर रंग मुझे कह रहा हो अपने अन्दर के बच्चे को कभी बड़ा मत होने देना, जो तुझे कभी दुनिया का तो कभी तुम्हारा ही अक्स दिखाता है। मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत थी और इन बिखरे रंगों को खुद में समेटे मैं मेट्रो में चढ़ गई। सीट नहीं थी बैठने को पर सभी खड़ी सवारियों की तरह तस्सली थी—चलो ए.सी तो चल रहा है।

हाल ही में एक सर्वेक्षण हुआ था जिसमें ७४ प्रतिशत दिल्ली-वासिओं ने मेट्रो को दिल्ली के विकास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बताया।

तो बचपन इस मेट्रो में भी था। पर मम्मी पापा के फ़ोन की गेम्स में उलझा हुआ। आस-पास क्या हो रहा है, क्या गुज़र रहा है कुछ पता नहीं क्योंकि मोबाइल की स्क्रीन पर इतनी तेज हरकतें होती है कि दिमाग कुछ और सोच ही नहीं पाता।

मुझे याद है जब बचपन में हम रेल से सफ़र करते थे तो हम भाई बहनों में अक्सर इस बात को ले कर लड़ाई होती थी कि खिड़की के पास कौन बैठेगा। फिर मम्मी मध्यस्ता करते हुए बारी लगा देती थी—खिड़की के पास बैठने की। तो लड़ाईयां यहाँ भी हो रही थी, पर इस बात पे की मोबाइल या टेबलेट कौन लेगा। और मम्मी हमेशा की तरह अपना रोल निभा रही थी—बारी लगाने की। एक-एक गेम लगाने की बारी।

ज्यादा दूर नहीं जाना था। तीन ही स्टॉप थे तो उतर गई। बचपन की खुशबू से सरोबार।

मुझे उनकी भी याद आई जिनके लिए एस्कलेटर भी एक खेल था, उसकी भी जिसकी खेल का दायरा बहुत सीमित था और जिसको उसके दोस्त बैठने वाले खेल खिलाते होंगे—लूडो, कैरम या फिर यही मोबाइल, पर उसका मन पकड़म पकड़ाई या फिर साईकिल चलाने का होगा। लेकिन ऐसे में भी उस बच्चे और उसके माँ-बाप ने उसके लिए नए आयाम तय कर रखे हैं जिसमें थकना मन है और हौसला हारने पर प्रतिबंध।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

राजनीति

जनता आजकल बौखलाई हुई है। रोज नए घोटालों की उनको आदत सी हो गई थी पर अब नए पुराने घोटालों के साथ, कम होती सुरक्षा व्यवस्था और रोज बड़े होते भ्रष्टाचार के किस्से। २ जी, कोयला आबंटन, चिटफंड, बलात्कार।

"अब किस-किस का जिक्र करोगे। रोज नए कारनामे सामने आते हैं इनके," मेट्रो के एक डिब्बे का दृश्य, जो कि इस बार लेडीज़ डिब्बा नहीं था।

वैसे एक बात है लेडीज़ डिब्बे में। मैंने औरतों को मौजूदा राजनीती पे चर्चा करते कम ही सुना था। शायद वो अपने रोजमर्रा के पचड़ों से इतनी घिरी रहती हैं कि राजनीती की बारी ही नहीं आती।

चलो जो भी है। आज इस जरनल डिब्बे में राजनीती पे खूब चर्चा हो रही थी

"सब के सब चोर हैं। पहले पैसा खा लेते हैं। फिर खाना पूर्ती के लिए एक जांच कमेटी बना देंगें," एक अंकल ने कहा।

"अगर बदलाव की सोचो भी तो यही लगता है चोर-चोर मौसेरे भाई," दुसरे महानुभाव ने राजनीती पे अपने ज्ञान का ठप्पा लगते हुए कहा।

"कौन कब किसके खिलाफ बोलेगा और कौन कब किस की गोद में जा बैठेगा, कुछ पता नहीं," पहले वाले अंकल ने कहा।

तो बिना किसी का नाम लिए बड़ी आम सी राजनीती पे चर्चा हो रही थी। दोनों को जल्दी ही उतरना था तो चर्चा ज्यादा देर तक चली नहीं। पर मौजूदा राजनीती के बारे में सोचते हुए मैं ऑफिस की तरफ बढ़ गई। वहां पहुंची तो लगा माहौल कुछ उखड़ा-उखड़ा सा है। पर ज्यादा ध्यान देने का समय नहीं था। बोझिल से माहौल में वैसे ही आपको काम करने में मज़ा आता है और आप कुछ न करते हुए भी खुद को किसी न किसी बात का दोषी मानने लगते हैं।

बस इस माहौल में किसी तरह काम निपटा कर मैं वापसी के सफ़र की तरफ बढ़ गई। इस बार उसी पुराने डिब्बे में यानि लेडीज़ डिब्बे में।

आज लड़कियों की भीड़ नहीं थी ऐसा नहीं कहूँगी पर हाँ कुछ व्यसक या मिडल एज्ड महिलाएं भी थी। एक के हाथ में सब्जियों का थैला था जिसमे वो सीताफल, खीरा और करेला ले कर जा रही थी। मुझे अचानक इन सब्जियों के नाम पे बनने वाले बच्चों के तरह-तरह के मुंह याद आ गए। खैर उस महिला ने बैठे-बैठे दो तीन बार लिफाफा देखा। मानों उनका बस चले तो यहीं से आधी तैयारी कर के जाएँगी। पर शायद उन्हें भी पता था फिलहाल वो देखने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगी और शायद मैं भी। तो मैंने उनके पास से अपनी नज़रे हटा ली।

एक अन्य, उसी उम्र की महिला एक मोटी सी किताब ले कर बैठी थी। थोडा सा पढ़ती फिर किसी सोच में गुम हो जाती मानों कुछ निचोड़ निकाल रही हो। मन में कौतूहल पैदा हुआ। ऐसे कौन से जीवन दर्शन के बारे में पढ़ रही हैं कि दुनिया का होश ही नहीं है। खैर जब वो ऐसे ही सोच में गुम थी तो उन्होंने किताब बंद की। तब देखा कि वो नियमावली है। शायद उस ऑफिस की जहाँ वो काम करती होंगी।

जिस तरह से वो नियमावली में गंभीर मुद्रा में खोई हुई थी लग रहा था किसी गहरी समस्या का समाधान ढूंढ रही हों। ऑफिस में समस्या मतलब—कुछ चल रही राजनीती—जिसका या तो आप हिस्सा बन नहीं पाए या बनना नहीं चाहते।

लगा सही है औरतें यूं राजनीती पर चर्चा नहीं करती तो घर के अन्दर, मोहल्ले की, ऑफिस इत्यादि की राजनीती का हिसा तो बन ही जाती हैं ... जाने अनजाने में।

अगर स्पर्धा सिर्फ खुद को सर्वश्रेष्ट साबित करने की हो तो उसके परिणाम जाने कितनों के व्यक्तित्व संवार सकते हैं। पर अगर यही होड़ खुद को सर्वश्रेष्ट के अलावा दूसरों को हीन, निर्गुण साबित करने की हो तो वो राजनीती बन जाती है। राजनीती पता नहीं क्यों हमेशा जोड़-तोड़ पे ही टिकी होती है। और इस विद्धा में परांगत होना, हर किसी के बूते की बात नहीं होता। मेरे जैसे कई तो प्रवेश परीक्षा में भी न पहुँच पायें शायद।

उनकी परेशानी थोड़ा परेशान कर रही थी मुझे। पर विषाद की रेखाएं उनके चेहरे से कम करने के लिए मैं क्या कर सकती थी यह समझ नहीं पा रही थी।

इतने में उनके साथ वाली सीट खाली हुई तो वहां पर एक करीने से तैयार हुई महिला आ कर बैठी। उसके पास एक खूबसूरत सा पर्स और एक प्यारा सा बैग था। बैग जूट का था पर इतना सुंदर था कि उसे थैला कहने को मन नहीं किया। बैठते ही उन्होंने पहले पर्स के बाहर की जिप खोली। एक रूमाल निकाला और ना दिखने वाला पसीना पोंछा। फिर उसी करीने से उसको वापिस उसी जेब में रख दिया।

मैंने मन में सोचा मुझे तो रूमाल ढूँढने के लिए भी पर्स की हर जिप खोलनी पड़ेगी। उस पे भी उसमें कागज और पेन तो हर जेब में मिल जायेंगे पर रूमाल मिलेगा कि नहीं इस की कोई गांरटी नहीं है। खैर जो अच्छी आदतें मुझ में नहीं हैं वो किसी और में देखती हूँ तो उनके लिए 'वाह' जरूर निकलता है।

तो उन्होंने अपना प्यारा सा जूट बैग खोला और उसमें से एक किताब निकाली। मैंने फिर मन में कहा, "एक और किताब।" मुझे ज्यादा शॉक न देते हुए उन्होंने जब वो किताब खोली तो पता चला कि वो एक लाइफ स्टाइल मैगज़ीन थी। मैंने चैन की सांस ली।

वो एक-एक कर पन्ना पलटने लगी। अचानक मैंने देखा कि उनके एक तरफ बैठी लड़की, जिसने अभी तक अपनी कोर्स की किताब में सर घुसाया हुआ था, उसने अपना ध्यान अपनी किताब से हटा कर, पूरी एकाग्रता के साथ मैगजीन में लगा दिया। शायद इसे ही डिसट्रेकशन या भटकाव कहते हैं जो आज कल के बच्चों और युवाओं में बहुत पाया जाता है।

खैर मैं उसे बहुत कुछ कह नहीं सकती थी तो चुप रही।

अचानक देखा नियमावली वाली महिला ने भी अपना सर किताब में से निकाल कर मैगजीन में घुसा दिया। मैगजीन ने रबड़ का काम करते हुए उसके माथे पर उभरी सारी लकीरों को परे कर दिया।

बिना लकीरों के उनका माथा काफी अच्छा लग रहा था। शायद सभी का लगता है या मुझे ऐसा पसंद है। लगा ऑफिस में जो व्यर्थ की राजनीती चलती है उसकी जगह पर अगर कोई रुचिकर कार्यक्रम शुरू हो तो माहौल कुछ सुधर जाये। पर साथ ही किसी इश्तहार के नीचे लगे सितारे याद आये जो कह रहे हों 'शर्तें लागू'। तो शर्त बस इतनी है कि इस रुचि में भी होड़ की राजनीती न शामिल हो।

पर कुछ चीज़ों के जवाब हमें कभी नहीं मिलते।

तो अब एक ही मैगजीन तीनों ही पढ़ रही थी, एक जैसी जिज्ञासा के साथ। इतने में मैगजीन वाली महिला का स्टॉप आ गया और वो उतर गई। तो पहले तो लड़की ने वापिस अपना सर किताब में घुसा दिया मानों मम्मी देखने आई हो कि बेटी पढ़ रही है या नहीं। और नियमावली वाली महिला, जिसने अभी तक अपनी ऊँगली को बुकमार्क बना कर किताब में डाला हुआ था, मानों वापिस धरातल पर आ गई हो और धीरे से उन्होंने ऊँगली वाली जगह से किताब पुन खोल ली और माथे पे मिटी हुई रेखाएं वापिस अपनी जगह पर आ गई।

मेरा स्टॉप आ गया था और मैं सोच में डूबी, उस महिला की मदद करने में असमर्थ उतर रही थी, यह सोचते हुए कि कुछ चीज़ों से निपटने के लिए हमें खुद को अपने तरीके से तैयार करना पड़ता है और वो... वही कर रही थी।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

मंगलवार, 28 मई 2013

हग डे

घर से निकले अभी थोड़ा ही समय हुआ था कि मोबाइल में हरकत हुई। मोबाइल उठा कर देखा तो एक मैसेज था। पढ़ा तो पता चला कि आज वलर्ड फ्रेंडस हग डे है। 

बड़ा भावनात्मक सा सन्देश था। उस संदेश में दोस्ती को इस ढंग से दर्शाया गया था कि मेरी कई यादें ताज़ा हो गई। दोस्तों के साथ बिताए कई लम्हें आँखों के सामने से एक रील की तरह निकल गए। साथ ही सोचा, आज से पहले सुना नहीं कभी इस दिन के बारे में। पर जहाँ दोस्ती की बात आती है तो लगता है इसको मनाने के लिए तो साल के ३६५ दिनों में ही कुछ न कुछ होना चाहिए।

एक क्राय डे, साथ रोने का दिन। आल स्माइल्स डे, सिर्फ मुस्कुराने का दिन। फाइट डे, झगड़े का दिन। पैच अप डे, मनाने का दिन।

फिर सोचा अभी तो नहीं पर जिस तरह से इस मसरूफियत भरी जिन्दगी में हम गुम होते जा रहे हैं तो जल्द ही हमें झगड़ने और मनाने के लिए भी दिन बनाने पड़ेंगे। खैर, इस सन्देश के साथ नए पुराने कई चेहरे मेरी आँखों के सामने आ गए। कुछेक के साथ तो कभी हमने पूरी दुनिया देखी थी, पर आज हालत यह है कि हम बस, दुनिया के साथ साथ उन्हें देख रहे हैंफेसबुक पर या किसी भी सोशल नेटवर्किंग साईट पर।

आरोप प्रत्यारोप में न फंसते हुए मैं सिर्फ उन यादों को ताज़ा करने की कोशिश करती हूँजो खुशनुमा रही थी कभी।

एक सच यह भी है कि जब हम दोस्तों के साथ होते हैं तो हमारी दुनिया, बड़ी छोटी सी हो कर, बस उन्हीं के आस पास घूमती रहती है। लेकिन जैसे ही वो चेहरे हमसे जुदा होते हैं तो हम बहुत बड़ी सी दुनिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन अकेले। और इस गोल घूमती धरती का चक्र पूरा करते हुए कोई नया हाथ कभी हमारी तरफ बढ़ता है, कभी हम नए हाथ की तरफ बढ़ते हैं। चक्र चलता रहता है, पर छूटने की कसक कहीं न कहीं रह जाती है।

तो इन्हीं मिश्रित से जज्बातों के साथ मैं मेट्रो में दाखिल हो गई। दिमाग में वो सन्देश और कौतूहल अभी भी था। मुझे लगा शायद यह दिवस शायद मेरे लिए नया हो पर युवा पीढ़ी के लिए तो यह जाना पहचाना होगा। तो आँखे तलाश रही थी, उन दोस्तों को जो आज का दिन मना रहे थे। 

मेट्रो में अक्सर दोस्तों की जोड़ियाँ या झुँड देखने को मिलते हैं। कोई दूसरे के कंधे पर सर रख कर सो रहा होता है तो कोई पूरे दिन की राम कहानी सुना रहा होता है। इकठ्ठे हंसने का, उदास चेहरों पे ख़ुशी लाने का, दिल की भड़ास निकलने का मंजर अक्सर देखने में आता है। तो मुझे लगा 'हग डे' की रौनक देखने की सबसे अच्छी जगह मेट्रो ही है। पर ऐसा कुछ नहीं दिखा कि लगे आज वैलेंटाइन डे जितनी रौनक है। बल्कि आज तो आम दिनों से भी कम रौनक लग रही थी। सब अपने आप में गुम, अपने लिए कुछ तलाशने में लगे हुए थे। बिना इस की परवाह किए कि इस तालाश में कोई उनसे बिछड़ा तो नहीं।

फिर थोड़ा सकारात्मक होते हुए सोचा कि जैसे मैं इतने सारे दिन इजाद करने का सोच रही हूँ किसी और ने हग डे बना कर एक शुरुआत की हो। तो दिमाग में आया कि अब अगला दिन बस मैं शुरू करूंगी। क्राय डे वाला। कहते हैं न कि हंस तो हम किसी के भी सकते हैं, पर रोने के लिए कुछ कन्धों को ही हक देते हैं। तो उस दिन अपने दोस्त के साथ, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, एक बार तो आँखे गीली कर ही लेनी चाहिए। तो जैसे बारिश के बाद की धूप होती है, वैसी ही मुस्कान आएगी चेहरे पर, रोने के बाद वाली मुस्कान। कोई बोझ न हो न, आत्मा पे न दिल पे।

मैं मेट्रो से नज़रें हटा कर दरवाज़े के पास आ गई। मुझे अपने किसी दोस्त का इंतज़ार नहीं था, खासकर मेट्रो में, तो मैं राजीव चौक पर उतर गई। अपनी बंधी बंधाई रूटीन के साथ। राजीव चौक हमेशा की तरह लोगों को इधर से उधर पहुँचाने में व्यस्त था और लोग भागने में। इस बीच में वो सन्देश मैंने अपने कुछ नए पुराने दोस्तों को भेजा। कुछेक का जवाब आया तो बाकियों ने चुप्पी साध ली। मैंने शायद उम्मीद ज्यादा लगा रखी थी और परिणाम आशानुकूल नहीं थे। तो हल्की सी उदासी के बादलों ने मेरी मुस्कान को घेर लिया था।

फिर अपने दिमाग को झटक कर मैं चल दी, अगली मेट्रो पकड़ने। चलते-चलते राजीव चौक पर बने कैफ़े कॉफ़ी डे के सामने से निकली। अक्सर वहां से निकलते हुए मैं एक बार नज़र उठा कर देख लेती हूँ। दो कारण हैंएक तो कॉफ़ी की खुशबू अपने आप में इतना अच्छी  होती है। उसकी महक मानों चारों तरफ बिखर कर हमें अपने पास बुला रही हो। दूसरी उसकी टैग लाइनअ लोट कैन हैपन ओवर अ कप ऑफ़ कॉफ़ी , जितनी बार भी पढ़ती हूँ, अच्छी लगती है। वहां बैठे दोस्त, उनकी लम्बी लम्बी बातें। हालाँकि यह भी सच है कि बहुत सी बिजनेस मीटिंगस भी होती हैं यहाँ पर। पर मेरा ध्यान ज्यादा उनपे नहीं जाता। खैर स्वभाववश मैंने उधर नज़र दौड़ाई तो अच्छा लगा।

दोस्तों के दो-एक झुंड बाहर ही खड़े थे और हँसते हुए एक दूसरे को "हैप्पी हग डे" कह रहे थे। उन आवाज़ों में जो गूँज थी, जो जोश था और सबसे ज्यादा, जो भाव थे, उसने मेरे सारे गिले शिकवे दूर कर दिए। मैंने रुक कर दूर से उनकी तरफ देखा, और बढ़ गई अपनी अगली मेट्रो पकड़ने, अपने दोस्तों को याद करते हुए।

अच्छा लगता है जिन्दगी की बेरंग सी तस्वीर में दोस्ती के चंद बिखरे से रंग देख कर। हाँ यह जरूर है कि इस बार यह रंग मेरे मेट्रोस्तान के बाहर बिखरे हुए थे लेकिन फिर भी इनकी ख़ूबसूरती कम नहीं थी।


© उपमा डागा पार्थ २०१३

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

भरोसा

कोई बोझ नहीं है, फिर भी यह दिल बोझिल सा क्यों है,
सब पे इनयात है, पर खुद से खफा खफा सा क्यों है।

तो कुछ ऐसा ही आलम था पिछले कुछ दिनों से, यूं सबसे कटी बैठी थी मानों कुछ खो गया हो मेरा या फिर रूठ गई हूँ किसी से, पर ऐसा कुछ, याद करने पे भी याद नहीं आया। तो अगर किसी से नराज़गी नहीं थी, तो क्या खुद से...

खैर! दिल की इस कथित 'नाराज़गी' का दर्द झेलती बेचारी 'मैं' अपनी मेट्रो में सिर्फ आ-जा ही रही थी। फिर एक दिन मन ने कमांड सँभालते हुए कहा कि चलो आज फिर से सफ़र किया जाये। तो अपनी दुनिया से मेट्रोस्तान की तरफ, बड़े दिनों बाद, मैंने अपने कदम बढ़ा दिए।

आज मेट्रो का माहौल कुछ अलग था, बहत खुशनुमा था या सब लोग बैठे हुए थे। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शायद सिर्फ कलेंडर की चंद तारीखें ही बदली थी, लोग, मेट्रो, उनका बर्ताव सब वैसा ही था, जैसा पहले था। सही भी है - किसी के होने न होने से अगर दुनिया अपनी रफ़्तार कम या ज्यादा करने लगे तो दुनिया का नाम बदल के कुछ और ही रखना पड़ेगा...

तभी सामने बैठी एक महिला के हाथ में सुडोको की किताब देखी। न चाहते हुए भी चेहरे पे एक मुस्कान आ ही गई। मेरा मानना है कि सुडोको एक ऐसा खेल है जो आपको सोचने पे मजबूर कर देता है और सोच की धार को और तेज कर देता है। और एक बार जिसे इसकी 'लत' लग जाती है, वो तो बस इसी का हो कर रह जाता है। तो इन सारे लक्षणों से पता चल रहा था कि वो सामने बैठी महिला इसी लत से पीड़ित थी... मेरी तरह।

उसके साथ दो बच्चे थे। ७-८ साल की बेटी और ४-५ साल का बेटा। बेटी को झपकी आ रही थी और वो बेटे पर गिरने लगी। बेटा, किसी भी शैतान भाई की तरह, उसे तंग करने लगा। बेटी ने, भाई-बहन के झगड़े की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए, उसे डांटना शुरू कर दिया। मम्मी को अंपायर की भूमिका निभाने के लिए अपना सुडोको छोड़ना पड़ा। दोनों को शांत करने के बाद वो वापिस अपने सुडोको में बिजी हो गई। बीच में नज़र मिली तो मैंने पूछा, "कितने का टारगेट है?" तो उसने हँसते हुए कहा, "जितना पूरा हो जाये, बच्चों के साथ और स्टेशन आने तक।"

जनून - अच्छा लगा जनून देख कर। शौक जब जनून बन जाये तो उसे करने में अलग ही मजा आता है। तो उसको, उसके जनून के साथ छोड़ कर, एक नज़र डिब्बे में घुमाई तो अपना चिर परिचित माहौल नज़र आया। कुछेक लोग गाना सुनने में मग्न थे और दो एक लडकियां नोट्स बना रही थी। देख के लगा कैसे अपने एक-एक पल को यह लोग अपने तरीके से जी रहे हैं।

इतने में मेट्रो की भीड़ थोड़ी कम होती दिखी। दो बच्चों के पास सीट देख कर मैं भी बैठ गई। १२ -१३ साल की एक लड़की अपने १० -११ साल के भाई के साथ बैठी हुई थी। लड़की की आँखों में चंचलता और हल्की शरारत थी। लड़का बेफिक्र और मस्तमौला था। दोनों की बातों और हरकतों से लग रहा था कि वो पहली बार अकेले मेट्रो में सफ़र कर रहे थे। वो लोग  बचपन का एक बहुत प्यारा सा खेल, जो हमने भी अपने समय में बहुत खेला था, खेल रहे थे ।

आओ मीलो
शीलो शालो
कच्चा धागा
रेस लगा लो
दस पत्ते कच्चे
हिरन के बच्चे 
हिरन गया पानी में
पकड़ा उसकी नानी ने,

यह गाते गाते वो एक बार सामने वाले के हाथ पे ताली मारते, एक बार अपने। इतना बोलने के बाद लड़की ने कहा, "पर नानी तो स्वर्ग चली गयी।" दोनों मुस्कुरा दिए। जितनी सहजता से उन्होंने नानी के जाने की बात की, वो बचपन में ही संभव है शायद।

जिस मासूमियत से वो खेल रहे थे, मैं मुस्कुराते हुए उसमें अपने बचपन की छवि देख रही थी। मैंने नज़र उठा कर ऊपर देखा तो पता चला कि उनको निहारने वाली मैं अकेली नहीं थी। दो तीन और महिलाएं भी मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। एक दूसरे को देख कर हमारी मुस्कान और गहरी हो गई। शायद वास्तविकता के माया जाल में उलझे हम सब उस किनारे को देख कर खुश हो रहे थे जो कहीं दूर छूट गया था और त्रासदी यह कि वहां लौट के जाना संभव नहीं है।

पर मेरा वहां बैठना लड़के को पसंद नहीं आया क्योंकि मेरे आने से जगह कम होने के कारण उनका खेल बंद हो गया। जैसे ही एक महिला उठ कर गई तो उसने अपनी बहन को आगे होने को कहा। जगह मिलने पर उनके चेहरे खिल उठे और उन्होंने फिर से खेलना शुरू कर दिया।

खेल के बीच बीच में भाई पूछता, "पता तो चल नहीं रहा कहाँ पहुंचे हैं।" तो बहन अपना फर्ज़ निभाते हुए कहा, "पहुँच जाएंगे।" जब उसने दो तीन बार पूछा तो एक स्टेशन पे मेट्रो के दरवाज़े बंद होने पे मैंने कहा ,"यह यमुना बैंक है। तुम्हे कहाँ जाना है।"

"प्रीत विहार," बहन ने जवाब दिया।

अब घबराने की बारी मेरी थी। "पर यह ट्रेन तो वहां जा ही नहीं रही। यह तो नॉएडा जाएगी।"

"पर मेरी मम्मी ने कहा है राजीव चौंक वाली मेट्रो तुम्हे प्रीत विहार उतारेगी। वहां से मामा तुम्हें लेने आ जायेंगे।"

मुझे पता था माँ की कही बात के आगे मेरा समझाना फ़िज़ूल था। तो मैंने कहा, "मम्मी को फ़ोन लगाओ।"

उसने मम्मी से बात की तो माता जी ने वही बात दोहरा दी। मामा लेने आयेंगे प्रीत विहार पर उतर जाना।

मैंने फ़ोन उसके हाथ से लिया और उनकी भाषा समझते हुए उन्हें पंजाबी में समझाया कि वो गलत ट्रेन में बैठ गए हैं। तो वो थोड़ी चिंतित हो के बोली, "यह बच्चे तो पहली बार अकेले सफ़र कर रहे हैं। क्या करे?"

ज्यादा समय न लेते हुए मैंने कहा, "ठीक है मैं इनको सही ट्रेन में बिठा दूंगी।"

तो उन्होंने बड़ी मेहरबानी कहते हुए निश्चित हो कर फ़ोन रख दिया। बाकी लोग भी उन बच्चों को समझा रहे थे पर अब वो डर गए थे। ज्यादा सोचने का समय न लेते हुए मैं दोनों बच्चों को ले कर उतर गई।

मैं उन्हें रास्ता दिखाते और बताते हुए जा रही थी क्योंकि इस ट्रेन में बैठने के बाद भी उनको अगले स्टेशन से ट्रेन बदलनी थी।

लड़की ने पूछा," वहां जा कर हम किससे पूछे कि कौन सी मेट्रो प्रीत विहार जाएगी?"

मैंने लगभग डांटते हुए कहा, "किसी से नहीं पूछोगे तुम लोग। ऐसा बोर्ड होगा जिस पे वैशाली लिखा होगा।यह बोर्ड  प्लेटफ़ॉर्म पे होगा और ट्रेन के आगे भी लिखा होता है कि ट्रेन कहाँ जा रही है ट्रेन के आगे और प्लेटफार्म पे लिखा होता है। खुद पढना। सब को बताते नहीं चलना की तुम अकेले जा रहे हो।"

दुसरे प्लेटफ़ॉर्म पे पहुँचते ही ट्रेन आती दिखाई दी। फिर से सारी चेतावनियाँ दे कर मैंने उनसे फ़ोन नंबर लिया। और दरवाज़ा बंद होते ही मैंने फ़ोन करना शुरू कर दिया। नेटवर्क न होने के कारण फ़ोन नहीं लग रहा था। ७ -८ बार कोशिश करने पर फ़ोन लगा तो पता चला कि एक आंटी ने वही मेट्रो पकडनी है वो उन्हें चढ़ा देंगी।

मेरी चिंता यथावत थी। प्रीत विहार पहुँचने पे फिर फ़ोन किया तो पता चला कि मामा जी नहीं पहुंचे तो वो लोग रिक्शा से घर जा रहे हैं। मेरा फ़ोन चालू रहा जब तक वो लोग घर नहीं पहुंचे। घबराहट में मैंने उनसे उनका नाम भी नहीं पूछा। फ़ोन पे उनकी मम्मी की दूर से ही आवाज़ सुन कर मैंने फ़ोन रख दिया। मानों अपने कर्तव्य से इतिश्री पा ली हो।

पर मेट्रो की घटना ने मुझे सोचने पे मजबूर कर दिया कि क्या हम आज के दौर में अजनबियों पे इतना भरोसा कर सकते हैं? अगर कहीं ...

उसके आगे सोचने को मैं खुद को ही मना कर देती हूँ।

क्या सोच के खुश होऊं कि  वो बच्चे सही सलामत घर पहुँच गए या यह सोच कर कि लोगों को आज भी इंसानियत पर इतना विश्वास है?

बातें तो दोनों अच्छी हैं पर मुस्कराहट, पता नहीं क्यों पूरी तरह मेरा साथ नहीं दे रही।

मुझे थोडा समय चाहिए ... शायद...

© उपमा डागा पार्थ २०१३

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

न दिखने वाले लोग

मेट्रो तक पहुँचने के पहले पड़ाव के फलस्वरूप अभी मैं सड़क पे ही चल रही थी। चलना शब्द शायद घड़ी की सुईयां न दिखा पाए तो इसलिए मैं वाक्य थोडा सा बदल देती हूँ। तो मैं लगभग भाग रही थी कि अचानक आसमान में कुछ हरकत सी महसूस हुई। वैसे ज्यादातर हम काम के समय हर प्रकार की हरकतों से अपनी आँखे मूँद लेते हैं, पर आज ऐसा कर नहीं पाई। लगा आसमान पर आज कोई सफ़ेद और काले रंग का ब्रश एक साथ चला रहा है। ध्यान से देखा तो २०-२५ कबूतरों का एक टोला एक साथ पंख फैला कर उड़ान भर रहा था।

जैसे स्कूल जा कर अचानक किसी दिन पता चलता है कि आज सारा दिन पढाई नहीं होगी और बच्चे मस्ती में खेलने लगते हैं। कुछ ऐसी ही मस्ती थी उनकी भी। बार बार इक्कठे उड़ते, थोड़ी दूर तक उड़ान भरते, और वापिस लौट आते किसी घर की छत पर। सफ़ेद और भूरे रंग के कबूतर आसमान में आज अपना ही रंग भरने को उत्सुक थे। दूर तक छू कर आते, वापिस रंग भरते और फिर रंगों का दूसरा स्ट्रोक लगाने को तैयार।

एक पल को लगा पता नहीं कितना समय हो गया है यूं सिर्फ मस्ती में अपने मन से उड़ान भरे हुए। पर फिलहाल इन जज्बातों के लिए समय नहीं था। ऐसा घड़ी देख के याद आया। क़दमों की गति अपने आप तेज हो गई।

थोड़ा आगे बढ़ के मैं अपने मन के पक्षी को पीछे मुड़ने से रोक नहीं पाई। कबूतर अभी भी मस्ती में ऊपर नीचे आ जा रहे थे, पर अब उनके ऊपर एक हवाई जहाज जा रहा था। एक सीध में, एक गति में, एक दिशा में, लगातार। बंधे-बंधे क़दमों से, मानों जरा इधर से उधर हुआ तो रास्ता भटक जायेगा।

कभी-कभी मन और दिमाग कैसे हम एक साथ देख पाते हैं। कबूतर और हवाई जहाज...

मेट्रो स्टेशन पर टिकट काउंटर पर काफी भीड़ थी। मेरा नंबर आने में अभी टाइम था। अचानक जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ आने लगी। मेरे से आगे खड़ा एक युवक टिकट काउंटर पर बैठे कर्मचारी को डांट रहा था। "तुम लोगों को काम करने का तरीका नहीं आता। अब तुम लोगों के चक्कर में मुझे इतनी देर हो गई है। मैं कितनी देर खड़ा रहूँ आप लोगों के कारण," वो युवक पता नहीं क्या क्या बोल गया। अगर शीशे की दीवार बीच में न होती तो वो काउंटर पे बैठे कर्मचारी को पीट ही देता।

वो कर्मचारी शराफत से सुनता रहा। बीच में उसने सफाई देने की कोशिश की लेकिन वह युवक कुछ सुनने को तैयार नहीं था। जब मैंने और मेरे पीछे खड़े एक दो और लोगों ने कारण पूछा तो कर्मचारी ने कहा कि उसके पास खुले पैसे नहीं थे तो उसने उस युवक को इंतजार करने को कहा। जिस पर उसने इतना कुछ सुनाया। खैर इंतजार करने के अलावा कोई चारा दोनों के पास नही था। तो मुश्किल से २ या ३ मिनट बाद उसको बकाया पैसे मिल गए। और वापिस सब कुछ सामान्य।

वही खिड़की, वही कर्मचारी, वही उसके चलते हुए हाथ... सामान्य स्तिथि में खिड़की के उस पार हम सिर्फ हाथ बढ़ाते हैं टिकट या बकाया लेने के लिए। लेकिन इन्हीं कुछ परिस्तिथियों में हम कभी-कभी उनका चेहरा भी देख लेते हैं।

काउंटर के बाद यंत्रवत पर्स एक्सरे मशीन में रखा और मैं अपनी चेकिंग के लिए बॉक्स में पहुंची। देखा चेकिंग करने वाली महिला के हाथ भी मशीन की तरह चल रहे थे। बिना मुस्कराहट के, हर एक की एंट्री पे खड़े होना, चेक करना और बाहर भेजना। पता नहीं कितना लोग होंगे जो मुस्कुरा के इनकी तरफ देखते होंगे। कई लोग तो बड़े एहसान के साथ चेकिंग करवाते हैं।

मुस्कुराहटें इनकी ड्यूटी को कम ज्यादा तो नहीं कर सकती पर शायद काम करना थोड़ा आसान बना दे। तो मैं मुस्कुरा दी सिर्फ उसके लिए। और पता चला वो भी मुस्कुराती है। अच्छा लगा यह जान कर।

पर्स उठाने लगी तो देखा पुलिस की वर्दी में बैठा व्यक्ति लगातार मॉनिटर को देखे जा रहा था। सोचा अगर इसका ध्यान कुछ देर के लिए इस मॉनिटर से हट जाये तो क्या होगा। पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी करने के बाद भी उसके पास गलती की गुंजाईश नहीं थी। तो सलाम है उन सभी को जो हमारी सुरक्षा के लिए दिन रात लगे रहते है, बिना हमारे ध्यान में आये या फिर बिना हमारे देखे...

पूरे स्टेशन पर चंद लोग ही होते हैं जो इत्मीनान से चलते हैं बाकी सब तो समय को पकड़ने के लिए भागते हुए ही नज़र आते हैं। मानों जरा सी उन्होंने रफ़्तार कम की तो समय उन्हें छोड़ कर किसी और के पास चला जाएगा।

इस भागादौड़ी में हम कितने लोगों को अनदेखा करते हुए जाते हैं। कभी उन दो हाथों को जो एक मॉडर्न झाड़ू नुमा वाइपर लिए मेट्रो स्टेशन की सफाई करते रहते हैं। और असल में इस बात को पूरा करते हैं—मेरी दिल्ली, स्वच्छ दिल्ली। कभी रेत की बोरियों के पीछे बैठा वो जवान जो किसी भी आपातकालीन स्तिथि से निपटने के लिए हमेशा बन्दूक ताने तैयार नज़र आता है। कितना अजीब लगता होगा उनको... मानों पेन और पेपर लेकर परीक्षा हाल में बैठे हो, लेकिन प्रश्न पत्र कब मिलेगा पता ही नहीं।

इन्ही सब के बीच मैं प्लेटफ़ॉर्म पहुँच गई। गाड़ी बिल्कुल मेरे पास आ कर रुकी। और आज पहली बार मैंने ध्यान दिया कि एक ड्राईवर भी रहता है इसमें। मेट्रो चलने पर बहुत बार बहुत लोगों ने दिल्ली सरकार को धन्यवाद दिया। लेकिन उस मेट्रो की सफलता को यकीनी बनाने के लिए इन ड्राईवरों का क्या योगदान है यह शायद कुछ ही लोग समझ पाएं। अपनी अहमियत को दरकिनार कर यह ड्राईवर, रोज लाखों लोगों के सफ़र को सुरक्षित और निर्विघन बनाने के लिए हमेशा कार्यरत रहते हैं। हर स्टेशन आने पर वो बाहर निकल कर आते हैं और दूर तक नज़र दौड़ा कर देखते हैं, जब उन्हें लगता कि सारे लोग चढ़ गए तब वो अपने केबिन में जा कर मेट्रो के दरवाज़े बंद कर देते हैं। बिना बोले सबकी परवाह करते हुए या फिर सोचें तो मात्र अपनी ड्यूटी निभाते हुए।

ऐसा नहीं है कि यह सब लोग, इनके काम के बारे में हमें पता नहीं है, या हम इनसे अनिभिज्ञ हैं। पर इनकी सेवाओं के लिए धन्यवाद देना तो बहुत दूर की बात है हम कभी उनको एक बार मुस्कुरा के भी देखने के काबिल नहीं समझते। और वो लगातार चलते रहते हैं, काम करते रहते हैं... मशीन की तरह, ताकि हम अपने मन की उड़ान बिना किसी रूकावट के स्वछन्द हो के ले सके।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

अपेक्षाएँ

हर दिन उतने अच्छे नहीं होते कि आप हँसते हुए ही ऑफिस से बाहर निकलो।

तो कुछ वैसा ही दिन था आज मेरे लिए। सर आज कुछ गुस्से में थे और मुझसे भी एक-आध गलती हो गई थी। तो कुल मिला कर आज का दिन मेरा नहीं था। ड्यूटी निपटा कर भी कोई फ़ोन नहीं किया, मानों दुनिया को आज के बारे में बताये बिना निकल जाना चाहती हूँ—छुपते-छुपाते हुए। और जिस दिन जरा सी शाबाशी मिल जाती है तो उस दिन फटाफट स्माइली वाले मेसैज भेज देती हूँ। आज तो बस थके-थके क़दमों से बढ़ रही थी मेट्रो स्टेशन की तरफ। गुस्सा नहीं था डांट का, पर ऐसे में मुस्कराहट किसी छोटे बच्चे की तरह दुबक के कोने में छिप जाती है।

मेट्रो में ढलके-ढलके क़दमों से चढ़ गई। लगा सब लोग मुझे ही घूर रहे हैं। मेरी कहानी पढ़ने को आतुर। लगा आज मेट्रोस्तान में कोई और खबर नहीं छपी मेरी कहानी के अलावा। और यकीन मानिए मैं अपनी आज की कहानी, या यूं कहिए मेरी डांट की कहानी, बिलकुल नहीं बाँटना चाहती थी। किसी के भी साथ नहीं। बड़ी तकलीफ होती है यह मानने में कि कोई काम हम उतनी कुशलता से नहीं कर पाए जैसा हम से कहा गया था। उम्मीदों के तराजू के बाट में जब हमारा पलड़ा झुक जाता है तो हम यह समझ ही नहीं पाते कि अब कैसे इसको पूरा करें। 

दुखी नहीं थी पर चुप थी। लगा अपेक्षाओं ने मेरे सारे शब्द, हौंसले ताक़ पर रख दिए हों। शायद इसलिए बच्चों को टेस्ट में कम नंबर लाने पर मैं डांटती हूँ तो असल में वो चुप नहीं होते, बल्कि अपेक्षाएँ उनके सर चढ़ कर उनके सारे शब्द ले लेती हैं और हमें लगता है कि उनके पास कोई जवाब नहीं है।

हम बच्चों को हमेशा सबसे ऊपर, सबसे अव्वल देखना चाहते हैं, पर क्या उनको इस दौड़ में भगाते भगाते हम कभी यह अनुभव कर पाते हैं कि कई बार वो गलती इसलिए नहीं करते कि उनको वो सबक याद नहीं होता बल्कि शायद उस दिन वो थके होते हैं। पूरा सप्ताह, पूरा महीना, पूरा साल उनको सिर्फ खुद को साबित करना होता है—पढ़ाई में, खेलों में, व्यवहार में, और पता नहीं कहाँ कहाँ। और किसी भी माँ-बाप की कसौटियां, अपेक्षाएँ छतों को भी लांघते हुए आकाश जितनी तो होती ही हैं। और हर छलांग में वो हर बार आकाश छू ही आये यह जरुरी तो नहीं। पर माँ-बाप यह समझते नहीं हैं या ज़माने की रीत निभाते हुए समझना नहीं चाहते हैं—पता नहीं।

तो आज मुझे सीट नहीं चाहिए थी और न ही कोई कहानी। एक कोने में हैंडल को पकड़े खड़ी थी। अचानक देखा पास वाली सीट पर एक छोटी सी बच्ची, अपनी मम्मी की गोद में बैठी मेरा सूट खींच रही थी।

मैंने जब उसकी तरफ देखा तो उसने इतनी बड़ी मुस्कान बिखेर दी मानों कह रही हो कि जो काम वो करना चाह रही थी उसमें उसे ‘ए’ ग्रेड मिल गया है।

बच्चों की मासूमियत कभी तो सारे गम भुला देती है और कभी यह एहसास दिला कर उदास कर जाती है कि हम बड़े क्यूँ हुए। उस समय यह दोनों एहसास थे मेरे अंदर।

खैर, उसकी मुस्कान के आगे मेरे ढलके से मुंह ने हार मान ली और मैंने भी कोशिश करके उतनी ही बड़ी मुस्कान वापिस कर दी।

मुस्कान वापिस पा कर वो खुश हो गई और बस एक दोस्ती की शुरुआत हो गई। तो अब मेरी वो दोस्त मुझसे खेल रही थी। कभी सूट पकड़ कर, कभी पर्स की चैन पकड़ कर। पकड़ती, देखती कि मैंने देखा कि नहीं। फिर हंसती और मैं देख कर उसको पकड़ने का नाटक करती तो वो खिलखिला कर हँसने लगती।

उसके इस प्यारे से खेल ने मेरा मूड थोड़ा ठीक कर दिया। अचानक याद आया कि मेरे पर्स में दो टॉफी हैं।

मुझे लगा मेरे मूड की इस संजीवनी—नाम मुझे पता नहीं था, न मैंने पूछने की जरूरत समझी क्योंकि हम दोनों ने एक दूसरे को अपना परिचय मुस्कुराहटों के साथ ही दिया था—को टॉफ़ी दे कर कम से कम धन्यवाद तो कर ही सकती हूँ।

जैसे ही मैंने उसको टॉफ़ी दी तो एक तो उसने निकल कर उसी समय खा ली, दूसरी हाथ से गिर गई। वो मम्मी की गोद से उतरी, टॉफ़ी उठाई और फिर बैठने लगी, पर बैठने से पहले टॉफ़ी फिर गिर गई। वो फिर झुकी और टॉफ़ी उठाई। लगता था जहाँ एक तरफ टॉफ़ी उसे सताने की जिद पर थी, वहीं उसने भी ठान ली थी कि तुमसे तो मैं नहीं हारूँगी।

ऐसा तीन चार बार हुआ। गिरना, उठाना, बैठने से पहले फिर गिरना। पांचवी बार तक उसके मुंह वाली टॉफ़ी ख़तम हुई तो उसने बैठने से पहले हाथ में पकड़ी हुई टॉफ़ी का रैपर खोल कर उसे भी मुंह में डाल लिया। और माँ की गोद में बैठ गई—एक विजयी मुस्कान के साथ।
जब परिचय मुस्कान का हो तो तो मुस्कान ही हमें सब कुछ कह देती है, जो शब्द शायद न कह पाए।

बस जो बात में खुद को इतनी देर से नहीं समझा पाई वो उसने मुझे समझा दी। "कोशिश करती जाओ, सफलता पीछे-पीछे आ ही जाएगी।"

और मैंने उसकी तरफ देखा और सोचा कि कौन कहता है गुरु हमेशा कुछ कह के, अपने अनुभव के आधार पर ही हमें कुछ सिखा सकता है, आज मेरे इस न बोलने वाले गुरु ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया था।

तो मैं तैयार थी—अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ, फिलहाल उतरने के लिए, पर अगले सफ़र के इंतज़ार के साथ...

© उपमा डागा पार्थ २०१३