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| Photo by Nick V as published in NixPixMix |
मौसम
बदल रहा है। गर्मी ने विदाई ले ली है और ठण्ड हौले से दस्तक दे रही है।
मौसम लेकिन सब पर एक ही तरह से असर नहीं करता। कुछ लोग मौसम के अनुरूप ढलने
में समय नहीं लेते जबकि कुछ लोगों को उसे अपनाने में या उसके साथ चलने में काफी वक़्त लगता है। हर कोई मौसम को अपने पैमाने पर ही आंकता है।
तो मौसम का मिला जुला असर आजकल मेट्रो में भी देखने को
मिल रहा है। कुछ लोग तो आधी बाजू वाली टी-शर्ट में नज़र आते हैं तो कुछ ने
स्वेटर के साथ शाल या जैकेट भी पहनी होती है। इन दिनों ना चाहते हुए भी
मुझे दूसरे वर्ग का साथ देना पड़ रहा है। तबीयत थोड़ी नासाज़ होने के कारण
वैसे तो घर से निकलना ही थोड़ा कम हो रहा है, अगर निकलती भी हूँ तो मेरे
'तीमारदार' बस लिहाफ ओढ़ाने की ही कसर छोड़ते हैं।
मेरे आस पास रहने वाले मेरे शुभचिंतक मुझे यह एहसास दिलवाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह उम्र के अगले पड़ाव की दस्तक है।
खैर,
हम मौसम की बात कर रहे थे। तो मेट्रो में एक लड़की ने पसीना बहाने वाली
गर्मी में पहने जाने वाली एक पतली सी टी-शर्ट और कैप्री पहनी हुई थी। मन
में सोचा क्या यह लड़की आज मौसम के साथ बगावत करने के लिए निकली है ?
वो लगातार फ़ोन पे बात कर रही थी। रह-रह कर उसका स्वर
तेज हो जाता। बात ऑफिस के माहौल की हो रही थी जिसमें अचानक आया बदलाव उसकी
समझ से परे था। एक तरफ़ा बातचीत के कुछ अंशों ने मुझे भी परेशान कर दिया।
"मैं नहीं समझ पा रही कि अचानक सबको मुझसे क्या
प्रॉब्लम हो गई है... मेरे ऑफिस पहुँचते ही कामों की लम्बी लिस्ट मुझे
पकड़ा दी जाती है। ऑफिस में कहीं भी, कुछ भी गलत होता है तो मेरा ही नाम
लिया जाता है।"
"पता नहीं।"
"शायद अनिल सर जब से गए हैं तब से।"
"अरे! अब उन्होंने अगर कुछ किया है तो मैं क्या कर सकती हूँ?"
एक विराम...
एक ठंडी आह...
"चल ठीक है बाद में बात करती हूँ।"
अचानक
आये बदलाव को ले कर रोष था, पर उससे ज्यादा झलक रही थी उस रोष को सही जगह
पर न जता पाने की असमर्थता और पूरे माहौल की असहजता को न सह पाने की
विवशता। शायद उस बदलाव के आगे उसको मौसम के थपेड़े ज्यादा भारी नहीं लग रहे
थे।
माथे पर बल डाले और लगभग पैर झटकते हुए वो अपने गंतव्य
पर उतर गई। इन सबसे कोई समाधान मिलना मुझे तो सम्भव नहीं लग रहा था। पर
फ़िलहाल वो किसी समाधान की तलाश में नहीं थी शायद। सर्द मौसम में गर्म कॉफ़ी
के घूँट की तरह उसे बस किसी ऐसे शख्स की तलाश थी जो सिर्फ उसको सुने।
उसके जाने के बाद डिब्बे में सन्नाटा था यह तो नहीं कहूँगी पर हाँ मैं काफी देर तक उसी के बारे में सोचती रही। तो शायद मेरा ध्यान किसी और चीज़ पर नहीं गया।
वर्तमान में वापिस आते ही आस पास का माहौल फिर से जीवंत हो उठा। मेरी बगल में बैठी एक मोहतरमा पूरी तरह से अपने फ़ोन में बजने वाले गाने में मगन थी। उनके होंठ तो गुनगुना ही रहे थे, पैर भी उसकी धुन पर थिरक रहे थे।
बड़ा सकूं मिलता है ऐसे लोगों को देख कर जो हर पल का लुत्फ़ उठाने की
कोशिश करते हैं। जिंदगी अगर सिर्फ हसीं पल ही ले कर आए तो हमारे होंठो पे
कभी-कभी अचानक आने वाली मुस्कुराहट हमें कभी भी गुदगुदा नहीं पाएगी।
उस मोहतरमा कि तरफ से नज़रें हटाई तो सामने ४५-५० साल की दो महिलाएं बैठी हुई थी। किसी मुद्दे पर, जो उनके हाव भाव के मुताबिक काफी गम्भीर लग रहा था, दोनों चर्चा कर रही थी।
बात करते करते उनकी मुख मुद्रा अचानक बड़ी कठोर हो जाती, फिर वो धीरे-धीरे नरम पड़ती पर बात कभी भी मुस्कुराहट तक नहीं पहुँच पाई। उनकी भाव भंगिमा से पता चल रहा था कि उनके घर की परिस्थितियां इस समय उनके अनुकूल नहीं हैं। बीच-बीच में उनकी मुद्राओं की कठोरता का कम होना इस तरफ इशारा दे रहा था कि वो इन समस्याओं से जूझ तो रही हैं पर अभी तक उनका समाधान नहीं मिल पाया है।
प्रीत विहार आने वाला था, मैं उठ गई। देखा तो वो दोनों
औरतें भी उठ गई। उनकी बातों का क्रम खत्म होने को था। और अब हल्की सी
मुस्कुराहट होठों के कोने से झाँक रही थी।
लगा वो अपने सारे दुःख, तकलीफें, समस्याएं छोड़ने के लिए ही मेट्रो में आई थी। एक गुबार जो हमारे -साथ चलता है, उसको अगर निकाल दिया जाए तो आगे नए हादसों, नई परिस्तिथियों को झेलने की शक्ति मिल जाती है।
कितनी समस्याएं जिंदगी में ऐसी होती हैं जो अपने हल से पहले दिल से बाहर आने का रास्ता ढूंढ़ती हैं।
यह सही है कि सिर्फ कहने भर से उनसे मुक्ति तो नहीं मिलती पर समाधान मिलने की एक झीनी सी उम्मीद जरूर बंध जाती है और आगे बढ़ने के लिए वो उम्मीद ही काफी होती है।
स्टेशन पर उतरते ही ठण्ड के एक झोंके ने मेरा स्वागत किया। पर फिलहाल मैं उस झोंके को अपनी सोच पर हावी नहीं होने देना चाहती थी। मन में यह सवाल उठ रहा था कि क्या आने वाले मौसम की तरह आने वाली समस्याओं का पूर्वानुमान सम्भव है? क्या समस्याओं के अधखुले सिरे उनको और जटिल बना देते हैं? और क्या कई बार सिर्फ गुबार निकालना ही काफी है…।
© उपमा डागा पार्थ २०१३
© उपमा डागा पार्थ २०१३

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