जनता आजकल बौखलाई हुई है। रोज नए घोटालों की उनको आदत सी हो गई थी पर अब नए पुराने घोटालों के साथ, कम होती सुरक्षा व्यवस्था और रोज बड़े होते भ्रष्टाचार के किस्से। २ जी, कोयला आबंटन, चिटफंड, बलात्कार।
"अब किस-किस का जिक्र करोगे। रोज नए कारनामे सामने आते हैं इनके," मेट्रो के एक डिब्बे का दृश्य, जो कि इस बार लेडीज़ डिब्बा नहीं था।
वैसे एक बात है लेडीज़ डिब्बे में। मैंने औरतों को मौजूदा राजनीती पे चर्चा करते कम ही सुना था। शायद वो अपने रोजमर्रा के पचड़ों से इतनी घिरी रहती हैं कि राजनीती की बारी ही नहीं आती।
चलो जो भी है। आज इस जरनल डिब्बे में राजनीती पे खूब चर्चा हो रही थी
"सब के सब चोर हैं। पहले पैसा खा लेते हैं। फिर खाना पूर्ती के लिए एक जांच कमेटी बना देंगें," एक अंकल ने कहा।
"अगर बदलाव की सोचो भी तो यही लगता है चोर-चोर मौसेरे भाई," दुसरे महानुभाव ने राजनीती पे अपने ज्ञान का ठप्पा लगते हुए कहा।
"कौन कब किसके खिलाफ बोलेगा और कौन कब किस की गोद में जा बैठेगा, कुछ पता नहीं," पहले वाले अंकल ने कहा।
तो बिना किसी का नाम लिए बड़ी आम सी राजनीती पे चर्चा हो रही थी। दोनों को जल्दी ही उतरना था तो चर्चा ज्यादा देर तक चली नहीं। पर मौजूदा राजनीती के बारे में सोचते हुए मैं ऑफिस की तरफ बढ़ गई। वहां पहुंची तो लगा माहौल कुछ उखड़ा-उखड़ा सा है। पर ज्यादा ध्यान देने का समय नहीं था। बोझिल से माहौल में वैसे ही आपको काम करने में मज़ा आता है और आप कुछ न करते हुए भी खुद को किसी न किसी बात का दोषी मानने लगते हैं।
बस इस माहौल में किसी तरह काम निपटा कर मैं वापसी के सफ़र की तरफ बढ़ गई। इस बार उसी पुराने डिब्बे में यानि लेडीज़ डिब्बे में।
आज लड़कियों की भीड़ नहीं थी ऐसा नहीं कहूँगी पर हाँ कुछ व्यसक या मिडल एज्ड महिलाएं भी थी। एक के हाथ में सब्जियों का थैला था जिसमे वो सीताफल, खीरा और करेला ले कर जा रही थी। मुझे अचानक इन सब्जियों के नाम पे बनने वाले बच्चों के तरह-तरह के मुंह याद आ गए। खैर उस महिला ने बैठे-बैठे दो तीन बार लिफाफा देखा। मानों उनका बस चले तो यहीं से आधी तैयारी कर के जाएँगी। पर शायद उन्हें भी पता था फिलहाल वो देखने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगी और शायद मैं भी। तो मैंने उनके पास से अपनी नज़रे हटा ली।
एक अन्य, उसी उम्र की महिला एक मोटी सी किताब ले कर बैठी थी। थोडा सा पढ़ती फिर किसी सोच में गुम हो जाती मानों कुछ निचोड़ निकाल रही हो। मन में कौतूहल पैदा हुआ। ऐसे कौन से जीवन दर्शन के बारे में पढ़ रही हैं कि दुनिया का होश ही नहीं है। खैर जब वो ऐसे ही सोच में गुम थी तो उन्होंने किताब बंद की। तब देखा कि वो नियमावली है। शायद उस ऑफिस की जहाँ वो काम करती होंगी।
जिस तरह से वो नियमावली में गंभीर मुद्रा में खोई हुई थी लग रहा था किसी गहरी समस्या का समाधान ढूंढ रही हों। ऑफिस में समस्या मतलब—कुछ चल रही राजनीती—जिसका या तो आप हिस्सा बन नहीं पाए या बनना नहीं चाहते।
लगा सही है औरतें यूं राजनीती पर चर्चा नहीं करती तो घर के अन्दर, मोहल्ले की, ऑफिस इत्यादि की राजनीती का हिसा तो बन ही जाती हैं ... जाने अनजाने में।
अगर स्पर्धा सिर्फ खुद को सर्वश्रेष्ट साबित करने की हो तो उसके परिणाम जाने कितनों के व्यक्तित्व संवार सकते हैं। पर अगर यही होड़ खुद को सर्वश्रेष्ट के अलावा दूसरों को हीन, निर्गुण साबित करने की हो तो वो राजनीती बन जाती है। राजनीती पता नहीं क्यों हमेशा जोड़-तोड़ पे ही टिकी होती है। और इस विद्धा में परांगत होना, हर किसी के बूते की बात नहीं होता। मेरे जैसे कई तो प्रवेश परीक्षा में भी न पहुँच पायें शायद।
उनकी परेशानी थोड़ा परेशान कर रही थी मुझे। पर विषाद की रेखाएं उनके चेहरे से कम करने के लिए मैं क्या कर सकती थी यह समझ नहीं पा रही थी।
इतने में उनके साथ वाली सीट खाली हुई तो वहां पर एक करीने से तैयार हुई महिला आ कर बैठी। उसके पास एक खूबसूरत सा पर्स और एक प्यारा सा बैग था। बैग जूट का था पर इतना सुंदर था कि उसे थैला कहने को मन नहीं किया। बैठते ही उन्होंने पहले पर्स के बाहर की जिप खोली। एक रूमाल निकाला और ना दिखने वाला पसीना पोंछा। फिर उसी करीने से उसको वापिस उसी जेब में रख दिया।
मैंने मन में सोचा मुझे तो रूमाल ढूँढने के लिए भी पर्स की हर जिप खोलनी पड़ेगी। उस पे भी उसमें कागज और पेन तो हर जेब में मिल जायेंगे पर रूमाल मिलेगा कि नहीं इस की कोई गांरटी नहीं है। खैर जो अच्छी आदतें मुझ में नहीं हैं वो किसी और में देखती हूँ तो उनके लिए 'वाह' जरूर निकलता है।
तो उन्होंने अपना प्यारा सा जूट बैग खोला और उसमें से एक किताब निकाली। मैंने फिर मन में कहा, "एक और किताब।" मुझे ज्यादा शॉक न देते हुए उन्होंने जब वो किताब खोली तो पता चला कि वो एक लाइफ स्टाइल मैगज़ीन थी। मैंने चैन की सांस ली।
वो एक-एक कर पन्ना पलटने लगी। अचानक मैंने देखा कि उनके एक तरफ बैठी लड़की, जिसने अभी तक अपनी कोर्स की किताब में सर घुसाया हुआ था, उसने अपना ध्यान अपनी किताब से हटा कर, पूरी एकाग्रता के साथ मैगजीन में लगा दिया। शायद इसे ही डिसट्रेकशन या भटकाव कहते हैं जो आज कल के बच्चों और युवाओं में बहुत पाया जाता है।
खैर मैं उसे बहुत कुछ कह नहीं सकती थी तो चुप रही।
अचानक देखा नियमावली वाली महिला ने भी अपना सर किताब में से निकाल कर मैगजीन में घुसा दिया। मैगजीन ने रबड़ का काम करते हुए उसके माथे पर उभरी सारी लकीरों को परे कर दिया।
बिना लकीरों के उनका माथा काफी अच्छा लग रहा था। शायद सभी का लगता है या मुझे ऐसा पसंद है। लगा ऑफिस में जो व्यर्थ की राजनीती चलती है उसकी जगह पर अगर कोई रुचिकर कार्यक्रम शुरू हो तो माहौल कुछ सुधर जाये। पर साथ ही किसी इश्तहार के नीचे लगे सितारे याद आये जो कह रहे हों 'शर्तें लागू'। तो शर्त बस इतनी है कि इस रुचि में भी होड़ की राजनीती न शामिल हो।
पर कुछ चीज़ों के जवाब हमें कभी नहीं मिलते।
तो अब एक ही मैगजीन तीनों ही पढ़ रही थी, एक जैसी जिज्ञासा के साथ। इतने में मैगजीन वाली महिला का स्टॉप आ गया और वो उतर गई। तो पहले तो लड़की ने वापिस अपना सर किताब में घुसा दिया मानों मम्मी देखने आई हो कि बेटी पढ़ रही है या नहीं। और नियमावली वाली महिला, जिसने अभी तक अपनी ऊँगली को बुकमार्क बना कर किताब में डाला हुआ था, मानों वापिस धरातल पर आ गई हो और धीरे से उन्होंने ऊँगली वाली जगह से किताब पुन खोल ली और माथे पे मिटी हुई रेखाएं वापिस अपनी जगह पर आ गई।
मेरा स्टॉप आ गया था और मैं सोच में डूबी, उस महिला की मदद करने में असमर्थ उतर रही थी, यह सोचते हुए कि कुछ चीज़ों से निपटने के लिए हमें खुद को अपने तरीके से तैयार करना पड़ता है और वो... वही कर रही थी।
© उपमा डागा पार्थ २०१३
"अब किस-किस का जिक्र करोगे। रोज नए कारनामे सामने आते हैं इनके," मेट्रो के एक डिब्बे का दृश्य, जो कि इस बार लेडीज़ डिब्बा नहीं था।
वैसे एक बात है लेडीज़ डिब्बे में। मैंने औरतों को मौजूदा राजनीती पे चर्चा करते कम ही सुना था। शायद वो अपने रोजमर्रा के पचड़ों से इतनी घिरी रहती हैं कि राजनीती की बारी ही नहीं आती।
चलो जो भी है। आज इस जरनल डिब्बे में राजनीती पे खूब चर्चा हो रही थी
"सब के सब चोर हैं। पहले पैसा खा लेते हैं। फिर खाना पूर्ती के लिए एक जांच कमेटी बना देंगें," एक अंकल ने कहा।
"अगर बदलाव की सोचो भी तो यही लगता है चोर-चोर मौसेरे भाई," दुसरे महानुभाव ने राजनीती पे अपने ज्ञान का ठप्पा लगते हुए कहा।
"कौन कब किसके खिलाफ बोलेगा और कौन कब किस की गोद में जा बैठेगा, कुछ पता नहीं," पहले वाले अंकल ने कहा।
तो बिना किसी का नाम लिए बड़ी आम सी राजनीती पे चर्चा हो रही थी। दोनों को जल्दी ही उतरना था तो चर्चा ज्यादा देर तक चली नहीं। पर मौजूदा राजनीती के बारे में सोचते हुए मैं ऑफिस की तरफ बढ़ गई। वहां पहुंची तो लगा माहौल कुछ उखड़ा-उखड़ा सा है। पर ज्यादा ध्यान देने का समय नहीं था। बोझिल से माहौल में वैसे ही आपको काम करने में मज़ा आता है और आप कुछ न करते हुए भी खुद को किसी न किसी बात का दोषी मानने लगते हैं।
बस इस माहौल में किसी तरह काम निपटा कर मैं वापसी के सफ़र की तरफ बढ़ गई। इस बार उसी पुराने डिब्बे में यानि लेडीज़ डिब्बे में।
आज लड़कियों की भीड़ नहीं थी ऐसा नहीं कहूँगी पर हाँ कुछ व्यसक या मिडल एज्ड महिलाएं भी थी। एक के हाथ में सब्जियों का थैला था जिसमे वो सीताफल, खीरा और करेला ले कर जा रही थी। मुझे अचानक इन सब्जियों के नाम पे बनने वाले बच्चों के तरह-तरह के मुंह याद आ गए। खैर उस महिला ने बैठे-बैठे दो तीन बार लिफाफा देखा। मानों उनका बस चले तो यहीं से आधी तैयारी कर के जाएँगी। पर शायद उन्हें भी पता था फिलहाल वो देखने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगी और शायद मैं भी। तो मैंने उनके पास से अपनी नज़रे हटा ली।
एक अन्य, उसी उम्र की महिला एक मोटी सी किताब ले कर बैठी थी। थोडा सा पढ़ती फिर किसी सोच में गुम हो जाती मानों कुछ निचोड़ निकाल रही हो। मन में कौतूहल पैदा हुआ। ऐसे कौन से जीवन दर्शन के बारे में पढ़ रही हैं कि दुनिया का होश ही नहीं है। खैर जब वो ऐसे ही सोच में गुम थी तो उन्होंने किताब बंद की। तब देखा कि वो नियमावली है। शायद उस ऑफिस की जहाँ वो काम करती होंगी।
जिस तरह से वो नियमावली में गंभीर मुद्रा में खोई हुई थी लग रहा था किसी गहरी समस्या का समाधान ढूंढ रही हों। ऑफिस में समस्या मतलब—कुछ चल रही राजनीती—जिसका या तो आप हिस्सा बन नहीं पाए या बनना नहीं चाहते।
लगा सही है औरतें यूं राजनीती पर चर्चा नहीं करती तो घर के अन्दर, मोहल्ले की, ऑफिस इत्यादि की राजनीती का हिसा तो बन ही जाती हैं ... जाने अनजाने में।
अगर स्पर्धा सिर्फ खुद को सर्वश्रेष्ट साबित करने की हो तो उसके परिणाम जाने कितनों के व्यक्तित्व संवार सकते हैं। पर अगर यही होड़ खुद को सर्वश्रेष्ट के अलावा दूसरों को हीन, निर्गुण साबित करने की हो तो वो राजनीती बन जाती है। राजनीती पता नहीं क्यों हमेशा जोड़-तोड़ पे ही टिकी होती है। और इस विद्धा में परांगत होना, हर किसी के बूते की बात नहीं होता। मेरे जैसे कई तो प्रवेश परीक्षा में भी न पहुँच पायें शायद।
उनकी परेशानी थोड़ा परेशान कर रही थी मुझे। पर विषाद की रेखाएं उनके चेहरे से कम करने के लिए मैं क्या कर सकती थी यह समझ नहीं पा रही थी।
इतने में उनके साथ वाली सीट खाली हुई तो वहां पर एक करीने से तैयार हुई महिला आ कर बैठी। उसके पास एक खूबसूरत सा पर्स और एक प्यारा सा बैग था। बैग जूट का था पर इतना सुंदर था कि उसे थैला कहने को मन नहीं किया। बैठते ही उन्होंने पहले पर्स के बाहर की जिप खोली। एक रूमाल निकाला और ना दिखने वाला पसीना पोंछा। फिर उसी करीने से उसको वापिस उसी जेब में रख दिया।
मैंने मन में सोचा मुझे तो रूमाल ढूँढने के लिए भी पर्स की हर जिप खोलनी पड़ेगी। उस पे भी उसमें कागज और पेन तो हर जेब में मिल जायेंगे पर रूमाल मिलेगा कि नहीं इस की कोई गांरटी नहीं है। खैर जो अच्छी आदतें मुझ में नहीं हैं वो किसी और में देखती हूँ तो उनके लिए 'वाह' जरूर निकलता है।
तो उन्होंने अपना प्यारा सा जूट बैग खोला और उसमें से एक किताब निकाली। मैंने फिर मन में कहा, "एक और किताब।" मुझे ज्यादा शॉक न देते हुए उन्होंने जब वो किताब खोली तो पता चला कि वो एक लाइफ स्टाइल मैगज़ीन थी। मैंने चैन की सांस ली।
वो एक-एक कर पन्ना पलटने लगी। अचानक मैंने देखा कि उनके एक तरफ बैठी लड़की, जिसने अभी तक अपनी कोर्स की किताब में सर घुसाया हुआ था, उसने अपना ध्यान अपनी किताब से हटा कर, पूरी एकाग्रता के साथ मैगजीन में लगा दिया। शायद इसे ही डिसट्रेकशन या भटकाव कहते हैं जो आज कल के बच्चों और युवाओं में बहुत पाया जाता है।
खैर मैं उसे बहुत कुछ कह नहीं सकती थी तो चुप रही।
अचानक देखा नियमावली वाली महिला ने भी अपना सर किताब में से निकाल कर मैगजीन में घुसा दिया। मैगजीन ने रबड़ का काम करते हुए उसके माथे पर उभरी सारी लकीरों को परे कर दिया।
बिना लकीरों के उनका माथा काफी अच्छा लग रहा था। शायद सभी का लगता है या मुझे ऐसा पसंद है। लगा ऑफिस में जो व्यर्थ की राजनीती चलती है उसकी जगह पर अगर कोई रुचिकर कार्यक्रम शुरू हो तो माहौल कुछ सुधर जाये। पर साथ ही किसी इश्तहार के नीचे लगे सितारे याद आये जो कह रहे हों 'शर्तें लागू'। तो शर्त बस इतनी है कि इस रुचि में भी होड़ की राजनीती न शामिल हो।
पर कुछ चीज़ों के जवाब हमें कभी नहीं मिलते।
तो अब एक ही मैगजीन तीनों ही पढ़ रही थी, एक जैसी जिज्ञासा के साथ। इतने में मैगजीन वाली महिला का स्टॉप आ गया और वो उतर गई। तो पहले तो लड़की ने वापिस अपना सर किताब में घुसा दिया मानों मम्मी देखने आई हो कि बेटी पढ़ रही है या नहीं। और नियमावली वाली महिला, जिसने अभी तक अपनी ऊँगली को बुकमार्क बना कर किताब में डाला हुआ था, मानों वापिस धरातल पर आ गई हो और धीरे से उन्होंने ऊँगली वाली जगह से किताब पुन खोल ली और माथे पे मिटी हुई रेखाएं वापिस अपनी जगह पर आ गई।
मेरा स्टॉप आ गया था और मैं सोच में डूबी, उस महिला की मदद करने में असमर्थ उतर रही थी, यह सोचते हुए कि कुछ चीज़ों से निपटने के लिए हमें खुद को अपने तरीके से तैयार करना पड़ता है और वो... वही कर रही थी।
© उपमा डागा पार्थ २०१३