गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

एकांत

हमारी जिंदगी में चारों तरफ इतनी कहानियां बिखरी पड़ी हैं कि अगर पढ़ने लगो तो जिंदगी ही  ख़त्म  हो जाए, पर कहानी चलती रहे। और अगर न देखो तो बिना कुछ देखे सुने पूरी जिंदगी कट जाये।

मुझे  भी ऐसी कई कहानियां मिलती हैं—रोज। कुछ पूरी, कुछ अधूरी, कुछ धीरे-धीरे आगे बढ़ती  हुई और कुछ अपना अंत तलाशती हुई।

शायद इनमें से कोई कहानी आपके आस पास भी घट रही हो या फिर आप ही की हो।

वही मेट्रो, वही लेडीज़ कम्पार्टमेंट, पर आज रोज के मुकाबले भीड़ कम थी या मेरे आज के राशि फल में कुछ अच्छा लिखा था। पहले सांस लेते हुए खड़े होने की जगह, फिर दो स्टॉप के बाद बैठने के लिए सीट। आज तो मेरे सितारे बुलंदी पर थे। सीट पर बैठते ही एक नजर डिब्बे में घुमाई। सामने सारी कॉलेज की लड़कियाँ दो तीन के झुंड में बैठी बातें करने में बिजी थी। मेरी साथ वाली सीट में बैठी लड़की कानों में ईयर फ़ोन लगा कर बैठी थी। मानो दुनिया में रह कर उससे निर्लेप हो कर रहने के  लिए ही उसने जन्म लिया हो। दूसरी तरफ बैठी लड़की सर नीचे किये सो रही थी, या शायद तबियत ठीक नहीं थी उसकी। पर साथ बैठी उसकी सहेली बीच बीच में उसके सर पे हाथ फेर रही थी। मुझे एयरटेल का वो ऐड याद आ गया—क्योंकि हर एक फ्रेंड जरूरी होता है, और साथ ही अपने गिने चुने दोस्त।

इतने में एक चार पांच साल की बच्ची अपनी सीट से उठ कर ट्रेन में घूमने लगी। मेरे अंदर की छिपी हुई टीचर ने कहा उसको चोट लगेगी डांट कर बिठा दो पर किसी तरह मैंने उसको यह कह के चुप करवा दिया कि उसकी माँ साथ है संभाल लेगी। वो बच्ची कविता सुना रही थी और अपने प्रश्नों के पुलिंदों में से बहुत से सवाल पूछ रही थी। पर उसकी माँ बिलकुल शांत बैठी थी, बिना किसी एहसास के, न शैतानियों पे गुस्सा, न भोलेपन पे प्यार।

मैं हैरान थी कि ऐसे कैसे कर रही है वो। तभी मेरा ध्यान उसके हाथ में पकड़े फोन पर गया। उसकी उँगलियाँ मैसेज टाइप करती थी और एक सरसरी नजर डिब्बे में डाल लेती थी। इतने में जवाब आ जाता शायद और उसकी उदासी की रेखा और गहरी हो जाती। मुझे जगजीत सिंह की वो ग़ज़ल याद आ
गई—बहुत रोई हुई लगती हैं आँखें, मेरी ख़ातिर जरा काजल लगा लो। शायर ने शायद ऐसा ही सूनापन देख कर यह शेर लिखा होगा। बीच-बीच में तो वो मोबाइल की टोन से भी घबरा जाती थी। कभी-कभी हम लोगों से कुछ इस क़दर घिरे होते हैं कि अपनी ही आवाज़ हमें शोर लगने लगती है।

ऐसा लग रहा था कि वो थोड़ा एकांत चाहती थी जो चाहने से भी उसे नहीं मिल रहा था। साथ आई बेटी भी उसे नहीं छोड़ पा रही थी। क्योंकि मन की इन गुत्थियों की थाह जब हम समझदार लोग ही नहीं लगा पाते तो बच्चे तो फिर बच्चे हैं।

"मम्मा, आप इतनी चुप क्यों हो," बेटी ने पूछा।

"कुछ नहीं," उसने छोटा सा जवाब दिया।

"तो फिर आप मुझसे बातें क्यों नहीं कर रही," बेटी ने फिर से कहा।

"कर तो रही हूँ।"

"हम नानी के घर क्यों जा रहे हैं," बेटी बोली।

वो बिल्कुल चुप।

"पापा कब
आएँगे?" 

फिर कोई जवाब नहीं।

मुझे इस आधी अधूरी सी बात से कुछ गंभीरता का एहसास हुआ। मैंने बच्ची को अपने पास बुलाया। उसका नाम पूछा तो उसने कहा, "अद्विता। और आपका?" मानो मेरे सवाल खत्म होने का ही इंतजार रही थी।" मैंने कहा: "उपमा"।

"यह कैसा नाम है," उसने भोलेपन से पूछा। मैं अपनी हँसी रोक नहीं पाई और पूछ बैठी, "क्यों क्या ख़राबी है इसमें?"

"अरे कल को मेरी मम्मी मुझे मैगी या पास्ता बुलाएगी तो मुझे तो भूख ही लग जाएगी," उसने इठलाते हुए जवाब दिया।

मेरे नाम का विश्लेषण करते-करते वो मुझसे ऐसे बातें करने लगी जैसे मेरी जन्मों की बिछड़ी सहेली मुझसे मिली हो। उसने मेरे घर परिवार से ले कर नौकरी तक हर चीज का विवरण ले लिया था।

बच्ची का खेलना बोलना सब जारी था। और माँ को जो थोड़ा अकेलापन चाहिए था वो भी मिल रहा था। हम दोनों को पता था कि हम बस इस क्षणिक सपोर्ट के अलावा एक दूसरे को कुछ नहीं दे सकते। और शायद उसको उस समय सबसे ज्यादा उसी चीज की जरूरत थी।

मेरा स्टेशन आने वाला था। बच्ची फिर माँ के पास पहुंची। "मम्मा ! आपका फेवरेट कलर कौन सा है?" माँ थोड़ा संभल गई थी। मुस्कुराने की असफल कोशिश करती हुई बोली "वाईट"। बच्ची ने नजर दौड़ाई और डिब्बे में लगे एक स्टीकर पे उँगली रखते हुए कहा, "यह वाला मम्मा"। मैंने उठते हुए कहा, ''वेरी गुड! आपको तो कलर भी आते हैं।" उसने बड़े गर्व से अपनी माँ की तरफ देखा। माँ ने बिन बोले मेरी तरफ। मानो कह रही हो इतनी देर के लिए धन्यवाद। मैंने एक स्माइल दी, यानी मेरा जवाब—यही तक का साथ था।

यह खामोशी भी बिना कहे कैसे अपनी जबां समझ लेती है, यह आज तक मेरी भी समझ में नहीं आया।

खैर, उतरते हुए फिर मुड़ के उसकी तरफ देखा बिना बोले यह कहने के लिए कि ईश्वर करे तुम्हारी उदासी जल्दी दूर हो सके। लगा उसकी उदास आँखें मेरे पीछे आ रही हैं—शुक्रिया कहने शायद...

© उपमा डागा २०१२

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

जूनून

आज कोई जल्दी, कोई हड़बड़ी नहीं थी। घर से समय से निकली, बिना भागते दौड़ते हुए। और मेट्रो स्टेशन तक की जब लिफ्ट मिल जाती है तो लगता है मेरे सफ़र की लगभग आधी दुश्वारियां खत्म हो गई हों।

प्लेटफ़ॉर्म की सीढ़ियां चढ़ रही थी तो देखा मेट्रो आ गई। लोग भाग के चल दिए चढ़ने। मैंने अपने लिए मेट्रो की एक नियमावली तैयार कर ली थी। अगर आप टाइम से चल रहे हों और मेट्रो में भीड़ ज्यादा है तो उसे निकल जाने दो। तीन से चार मिनट बाद अगली मेट्रो आ जाएगी जो कम भीड़ वाली होगी।

तो मैं भागी नहीं, बस लोगो को देखती रही, जो मेरी नियमावली को नकारते हुए या अंजान होते हुए घर से टाइम पर नहीं निकले थे।

एक अंकल, आंटी मेरे आगे-आगे थे। अंकल आंटी को जल्दी चलने को कह रहे थे। आंटी मानो भीड़ वाली मेट्रो में चढ़ने को तैयार नहीं थी, पर अंकल को मना भी नहीं कर पा रही थी इसलिए चल रही थी। जब तक दरवाज़े तक पहुँचती, गाड़ी ने अपने स्वचालित दरवाज़े को नमस्कार की मुद्रा में बंद कर दिया। मानो कह रही हो दौड़ने के लिए धन्यावाद।

अंकल डांटने लगे, "तुम्हारे कारण गाड़ी चली गई। थोड़ा जल्दी नहीं चल सकती थी..."

मैं उनके बिलकुल पास से गुज़रते हुए थोड़ा आगे निकल आई। पीछे मुड़ के आंटी की तरफ देखा तो पाया कि उन्होंने जवाब में अंकल को कुछ नहीं कहा था पर एक छुपी हुई मुस्कान थी उनके चेहरे पे जैसे कह रही हो, ''अपनी बात मनवाने के लिए रुठना या जिद करना जरूरी तो नहीं।" मैं मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई, लेडीज कम्पार्टमेंट की तरफ।

चार मिनट बाद मेट्रो आई। पहले की अपेक्षा खाली थी। मतलब मेरी नियम सही थे। जगह मिली और मैं मन ही मन मेट्रोस्तान की अपनी नियमावली पर गर्व करने लगी।

लोग अभी चढ़ ही रहे थे, इतने में दो- तीन कॉलेज की लड़कियाँ आई और एक नज़र डिब्बे में दौड़ाई। कहीं खाली सीट न देख कर वहीं दरवाज़े के पास आलथी पालथी मार कर बैठ गई। मानो कह रही हो, "इस सीट से तो हमें कोई नहीं उठा सकता।" सही है! शायद आज की पीढ़ी में जो बिंदासपन है वो हमारी पीढ़ी से थोड़ा ज्यादा है। पर यह वाला अच्छा लगा।

एक कोशिश मैंने और की कि देखूं कितनी औरतों, लड़कियों के पास फ़ोन हैं और उनमें से कितनों ने इअर फ़ोन लगा रखे हैं। पर लगा यह डाटा इकट्ठा करने के लिए सिर्फ मेरी क्षमता कम पड़ जाएँगी। एक सरसरी नज़र मारने से पता चला फ़ोन तो मेरे हिसाब से सब के पास थे और ७० प्रतिशत ने इअर फ़ोन लगा रखा था। जैसे कह रही हो बाहर के शोर से अच्छा है कुछ ऐसा सुनो कि जो कानों को भी अच्छा लगे। और शायद यही वज़ह है कि आजकल के लेडीज कम्पार्टमेंट में उतना शोर नहीं होता।

खैर! गाड़ी बढ़ते हुए मंडी हाउस पहुंची। वहाँ से एक व्यक्ति, जिसने आँखों पर काला चश्मा चढ़ा रखा था और हाथों में छड़ी पकड़ी हुई थी, और हम लोग बोलचाल की भाषा में जिसे अँधा कहते हैं, को सहारा देते हुए दूसरे व्यक्ति ने उसे अंदर छोड़ दिया। किसी भी महिला ने उसके डिब्बे में दाखिल होने पर कोई आपत्ति नहीं की। मेरे सामने वाली लड़की ने उठ कर अपनी सीट उसको दी। लेकिन उस व्यक्ति ने यह कह कर मना कर दिया कि उसे पास में ही जाना है।

अंगहीनता के बावजूद उसने खुद को कमजोर साबित नहीं होने दिया और एक मुस्कान के साथ अपनी छड़ी की मदद से खड़ा हो गया।

तभी मैंने देखा कि वो कुछ गुनगुना रहा है। हाथों को ताल में कभी ऊपर कभी नीचे ले जा रहा था। बिना किसी की परवाह किये।

देख कर खुद पे शर्मिंदगी सी हुई। लगा, यह है जूनून। हम पूर्ण होते हुए भी कितने पल सिर्फ अपने जुनून के लिए जीते हैं। जबकि वो जो हमारी नज़र में अपूर्ण है, सिर्फ अपने जुनून के लिए जी रहा है, बिना लोगों की परवाह किये, पूरे विश्वास के साथ।

राजीव चौक आने की घोषणा सुन कर उसने पूछा कि राजीव चौक ही है न। जैसे कह रहा हो मुझे तो पता है पर तुम लोगों को लगे न कि मैंने पूछा नहीं।

हम दोनों ही राजीव चौक उतरे। वो गाते हुए और मैं कुछ सोचते हुए।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

मेट्रोस्तान

कितने साल हो गए ठीक से याद नहीं। शायद सात या आठ।

पिछले आठ सालों से कुछ किया नहीं है, ऐसा नहीं है। पर लोगों के शब्द  कोष के पन्ने पलटें तो उस काम की परिभाषा उसमें नहीं मिलेगी। "अच्छा! घर पे ही रहते हो। फिर तो खूब समय होता होगा आपके पास।" या फिर "हाउ लकी! यार हम तो छुट्टी के लिए तरस जाते हैं।"

खैर मैंने अपनी परिभाषाएं कभी लोगों की किताबों में खोजने की कोशिश नहीं की। बढते हुए बच्चे, उनकी जरूरतें, उनका मीठा सा बचपन, उनकी मान मुनहार, उनका लाड़। सब एक-एक पल जिया है मैंने। उनका विश्वास कि मम्मी है हमारे पास
हर पल।

मैं यह बिलकुल नहीं कहती कि जो काम काजी महिलाएं हैं वो बच्चों के पास नहीं होती। बिलकुल होती हैं। उनकी कार्यक्षमता, उनकी दोहरी भूमिका को मैं हमेशा सलाम करती हूँ।

यह समय कैसे निकला पता ही नहीं चला। जब मेरे घुटनों चलते, तुतलाते बच्चे, चलने और भागने लगे और इस बड़ी सी दुनिया में खुद को सहज महसूस करने लगे तो लगा कि अब कुछ समय निकला जा सकता है कुछ करने का, कुछ ऐसा काम जो अभी तक बैक सीट पर था। ऐसे में पता चला कि आकशवाणी में न्यूज़ कास्टर  का चयन होने वाला है। आवेदन जमा कराने का आखरी दिन था। बस किसी तरह भाग-दौड़ कर फॉर्म जमा करवा दिया। टेस्ट दिया, पास हो गए। फिर इंटरव्यू और सेलेक्शन।

मेरे साथ सब लोग खुश थे—पति, बच्चे, माँ, दोस्त। उन्हें ख़ुशी थी मेरी लोगों के परिभाषित शब्द कोष  में आने की और मुझे कुछ नया करने की।

पहले कुछ दिन ट्रेनिंग के लिए जाना था। तो पहले दिन निकल पड़ी मैं भगवन का नाम ले कर वापिस भागती दौड़ती दिल्ली की भीड़ भरी सड़कों पर। अपना रूट बनाया तो घर से बस स्टॉप, फिर बस से प्रीत विहार मेट्रो स्टेशन। मेट्रो से राजीव चौंक, फिर राजीव चौंक से पटेल चौंक और फिर हमारा आकाशवाणी भवन।

पहला दिन और लम्बा चौड़ा रास्ता। सबने कहा कि ऑटो या टैक्सी ले लेना पर मुझे इस सिमटी-सिमटी जिन्दगी से ही तो बाहर निकलना था। बच्चों को हमेशा कहती थी कि हमें जिन्दगी के हर रूप के लिए तैयार रहना चाहिए। हर तरह की आदत होनी चाहिए। तो रोज ऑटो से जाना मुश्किल नहीं था पर शायद, फिर मैंने जो सिखाया था, वो सिर्फ किताबी होता। और ऑटो में जिन्दगी नहीं  चलती, सिर्फ मूक बैठे हम होते हैं। लोगों को अगर जानना, पढ़ना है तो किसी पब्लिक ट्रासपोर्ट से जाओ। ऐसा मेरा मानना है।

तो एक नए रस्ते की तरफ कदम बढ़ाने को मैं भी चल पड़ी।

बस स्टॉप पर पहुँचने के पाँच मिनट बाद बस आई। खचाखच भरी हुई। घड़ी पर नज़र डाली और अपने सिद्धांतों पर भी। किसी पर भी पुनर्विचार करने का टाइम नहीं था। बस में बस चढ़ गई किसी तरह। दो स्टॉप के बाद ही मेट्रो स्टेशन था, पर लगा बेकार ही नहा धो कर आये। पसीने से तरबतर।

दिमाग में कितने चेहरे घूम गए—मुस्कुराते हुए—मानों कह रहे हो "हमने कहा था न"।

पर फिलहाल समय नहीं था उनके कटाक्षों का जवाब देने का। तो जी बस हम मेट्रो में भी चढ़ गए। हमारे शुभ चिंतकों ने तगीद की थी की लेडीज़ कम्पार्टमेंट में ही चढ़ना। सो हमने अक्षरश पालन किया उस बात का। डिब्बे में चढ़ के लगा मानों अचानक लड़कियों, औरतों की संख्या कुछ बढ़ सी गई है। सब समाए जा रही थी उसी एक डिब्बे में। ऐसा लग रहा था मेरे चारों ओर सबने घेराबंदी की हुई है। "बेचारी बड़े दिनों बाद आई है, कहीं गिर न जाये।" वि आइ पी ट्रीटमेंट।

खैर एक फायदा हुआ मेट्रो  का—दोबारा नहाना नहीं पड़ा और आख़िरकार हम राजीव चौंक पहुँच गए।

फ्लेशबैक का सीन दिखाने के लिए पुरानी फिल्मों में हीरो या हीरोइन को सेंटर में रख कर डायरेक्टर तेज-तेज कैमरा घुमाता था, वैसे ही कुछ हाल मेरा था।

इतना बड़ा स्टेशन, लोगों से ठसाठस भरा हुआ और लोग एक स्पीड से, नपे तुले क़दमों से, निर्धारित दिश में बस बढ़ते जा रहे थे।

हमने भी चारों तरफ नज़र  दौड़ाई और संकेत चिन्हों को फ़ॉलो करते हुए बढ़ना शुरू हो गए अपने गंतव्य की ओर।

आखिरी पड़ाव चूँकि कुछ ही पलों का था तो हम जल्द ही वहां पहुँच गए। फिर देखते, ढूंढते हुए, एग्जिट की तरफ बड़े।

मेट्रो स्टेशन के बाहर पहुँच कर मैंने एक विजयी मुस्कान के साथ स्टेशन से विदा ली और खुद को कहा, "
मेट्रोस्तान में आपका स्वागत है उपमा जी। अब आपको इसकी रोजाना डोज़ मिलती रहेगी।"

और फिर जिन्दगी चल पड़ी मेट्रो रफ्तार से।

© उपमा डागा
२०१२