बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

जूनून

आज कोई जल्दी, कोई हड़बड़ी नहीं थी। घर से समय से निकली, बिना भागते दौड़ते हुए। और मेट्रो स्टेशन तक की जब लिफ्ट मिल जाती है तो लगता है मेरे सफ़र की लगभग आधी दुश्वारियां खत्म हो गई हों।

प्लेटफ़ॉर्म की सीढ़ियां चढ़ रही थी तो देखा मेट्रो आ गई। लोग भाग के चल दिए चढ़ने। मैंने अपने लिए मेट्रो की एक नियमावली तैयार कर ली थी। अगर आप टाइम से चल रहे हों और मेट्रो में भीड़ ज्यादा है तो उसे निकल जाने दो। तीन से चार मिनट बाद अगली मेट्रो आ जाएगी जो कम भीड़ वाली होगी।

तो मैं भागी नहीं, बस लोगो को देखती रही, जो मेरी नियमावली को नकारते हुए या अंजान होते हुए घर से टाइम पर नहीं निकले थे।

एक अंकल, आंटी मेरे आगे-आगे थे। अंकल आंटी को जल्दी चलने को कह रहे थे। आंटी मानो भीड़ वाली मेट्रो में चढ़ने को तैयार नहीं थी, पर अंकल को मना भी नहीं कर पा रही थी इसलिए चल रही थी। जब तक दरवाज़े तक पहुँचती, गाड़ी ने अपने स्वचालित दरवाज़े को नमस्कार की मुद्रा में बंद कर दिया। मानो कह रही हो दौड़ने के लिए धन्यावाद।

अंकल डांटने लगे, "तुम्हारे कारण गाड़ी चली गई। थोड़ा जल्दी नहीं चल सकती थी..."

मैं उनके बिलकुल पास से गुज़रते हुए थोड़ा आगे निकल आई। पीछे मुड़ के आंटी की तरफ देखा तो पाया कि उन्होंने जवाब में अंकल को कुछ नहीं कहा था पर एक छुपी हुई मुस्कान थी उनके चेहरे पे जैसे कह रही हो, ''अपनी बात मनवाने के लिए रुठना या जिद करना जरूरी तो नहीं।" मैं मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई, लेडीज कम्पार्टमेंट की तरफ।

चार मिनट बाद मेट्रो आई। पहले की अपेक्षा खाली थी। मतलब मेरी नियम सही थे। जगह मिली और मैं मन ही मन मेट्रोस्तान की अपनी नियमावली पर गर्व करने लगी।

लोग अभी चढ़ ही रहे थे, इतने में दो- तीन कॉलेज की लड़कियाँ आई और एक नज़र डिब्बे में दौड़ाई। कहीं खाली सीट न देख कर वहीं दरवाज़े के पास आलथी पालथी मार कर बैठ गई। मानो कह रही हो, "इस सीट से तो हमें कोई नहीं उठा सकता।" सही है! शायद आज की पीढ़ी में जो बिंदासपन है वो हमारी पीढ़ी से थोड़ा ज्यादा है। पर यह वाला अच्छा लगा।

एक कोशिश मैंने और की कि देखूं कितनी औरतों, लड़कियों के पास फ़ोन हैं और उनमें से कितनों ने इअर फ़ोन लगा रखे हैं। पर लगा यह डाटा इकट्ठा करने के लिए सिर्फ मेरी क्षमता कम पड़ जाएँगी। एक सरसरी नज़र मारने से पता चला फ़ोन तो मेरे हिसाब से सब के पास थे और ७० प्रतिशत ने इअर फ़ोन लगा रखा था। जैसे कह रही हो बाहर के शोर से अच्छा है कुछ ऐसा सुनो कि जो कानों को भी अच्छा लगे। और शायद यही वज़ह है कि आजकल के लेडीज कम्पार्टमेंट में उतना शोर नहीं होता।

खैर! गाड़ी बढ़ते हुए मंडी हाउस पहुंची। वहाँ से एक व्यक्ति, जिसने आँखों पर काला चश्मा चढ़ा रखा था और हाथों में छड़ी पकड़ी हुई थी, और हम लोग बोलचाल की भाषा में जिसे अँधा कहते हैं, को सहारा देते हुए दूसरे व्यक्ति ने उसे अंदर छोड़ दिया। किसी भी महिला ने उसके डिब्बे में दाखिल होने पर कोई आपत्ति नहीं की। मेरे सामने वाली लड़की ने उठ कर अपनी सीट उसको दी। लेकिन उस व्यक्ति ने यह कह कर मना कर दिया कि उसे पास में ही जाना है।

अंगहीनता के बावजूद उसने खुद को कमजोर साबित नहीं होने दिया और एक मुस्कान के साथ अपनी छड़ी की मदद से खड़ा हो गया।

तभी मैंने देखा कि वो कुछ गुनगुना रहा है। हाथों को ताल में कभी ऊपर कभी नीचे ले जा रहा था। बिना किसी की परवाह किये।

देख कर खुद पे शर्मिंदगी सी हुई। लगा, यह है जूनून। हम पूर्ण होते हुए भी कितने पल सिर्फ अपने जुनून के लिए जीते हैं। जबकि वो जो हमारी नज़र में अपूर्ण है, सिर्फ अपने जुनून के लिए जी रहा है, बिना लोगों की परवाह किये, पूरे विश्वास के साथ।

राजीव चौक आने की घोषणा सुन कर उसने पूछा कि राजीव चौक ही है न। जैसे कह रहा हो मुझे तो पता है पर तुम लोगों को लगे न कि मैंने पूछा नहीं।

हम दोनों ही राजीव चौक उतरे। वो गाते हुए और मैं कुछ सोचते हुए।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

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