लगभग एक साल पहले की बात है। दिल्ली में राजीव चौक पर खड़े, मैं दौड़ते-भागते लोगों के रेले के बीच में मानों बुत बने खड़ी थी और लोग इतनी तेजी से इधर से उधर चल रहे थे की लग रहा था कि बंद आँखों से भी वे वहां पहुँच जायेंगे जहाँ कि मेट्रो में उन्हें जाना है।
आज लगभग एक साल बीत जाने पर ऐसा लग रहा है कि उस बुत के पैरों में भी वही स्प्रिंग लग गए हैं और बिना अभिव्यक्तियों के वो भी उस रेले के साथ बस बढ़ता ही चला जा रहा है।
बहुत बदलाव आये इस एक साल में। अच्छा बुरा समय। कभी जिन्दगी खींच कर एक रास्ते पर ले जाती, तो कभी मैं उसको उस डगर पर ले जाती जहाँ मैं जाना चाहती थी।
और जो दिखने वाले बदलावों में था वो था मेरा सफ़र, जो कि तिगुनी रफ़्तार से बढ़ गया था। तो अब जितना मेट्रो से सफ़र होता था उतना ही बस से भी और शायद उतना ही पैदल भी। पर अब आम से लोगों की रोजमर्रा की ख़ास कहानियाँ कुछ दूर सी लगने लगी थी। और जब इस बात का एहसास हुआ तो खुद से ही शिकायत की। अपनी थकी हुई सी भावनाओं को झंझोड़ कर फिर से अपने सफ़र की शुरुआत की। बिल्कुल उस बच्चे की तरह जो पहली बार स्कूल जा रहा हो। जितने सच्चे भाव आप एक बच्चे के मुँह पर देख सकते हैं वो किसी वयस्क के चेहरे पर विरले ही देखने को मिलते हैं।
सफ़र की शुरुआत में ही उस निश्छल बचपन से मुलाकात हो गई। सात आठ साल का बच्चा स्कूल यूनिफार्म में। दो-तीन साल बड़ी बहन ने उसका और अपना बैग पकड़ा हुआ था। लड़के के दोनों पैरों में क्ल्चेस लगे थे।
सोचा जिस दिन जिन्दगी आशा का दमन छोड़ देगी तो उस दिन जिन्दगी का क्या हश्र होगा?
एक सलाम किया उस संघर्ष को जो वो बच्चा अपनी जिन्दगी के लिए कर रहा था और उस परिवार को जो उसको मुश्किलों में जीना भी सिखा रहा था, और उनसे लड़ना भी।
हमने जल्दी से मुस्कुराहटों का आदान प्रदान किया और अपने-अपने रास्तों पर बढ़ गए। उसने मेरी आँखों में अपने लिए सम्मान के भाव पढ़ लिए थे शायद और मैंने उसकी आँखों में दृढ़ता के। लगा शुरुआत अच्छी हुई है तो अंत भी अच्छा ही होगा।
अब बारी बस की थी। बस में २०-२२ की लड़की। गोद में एक डेढ़ साल के बच्चे को सँभालने की कोशिश कर रही थी। कभी अपनी साड़ी का गिरता पल्लू संभालती और कभी लुढ़कता हुआ बच्चा। पता चल रहा था कि उस छोटी सी माँ को अभी बहुत कुछ सीखना था। वो बच्चे को कभी गोदी में लिटाती तो कभी कंधे पर। पर बच्चे की बेकरारी कायम थी। धूप खिड़की से छन-छन कर आ रही थी।
गर्मी में उसकी पूरी बाजू की शर्ट भी उसे परेशान कर रही थी। तो मैंने एक अनुभवी माँ होने का सर्टिफिकेट दिखाए बिना उससे कहा, "इसे प्यास लगी है।"
उसने कहा, "अभी आनंद विहार पर ही तो पानी पिलाया था।"
मैंने फिर कहा, "गर्मी में बड़ों की हालत ख़राब हो रही है, यह तो फिर एक बच्चा है।"
फिर मैंने उसके बिना पूछे, सफ़र में जाते समय, खास कर छोटे बच्चे के साथ रखने वाली चीज़ों की एक पूरी लिस्ट बता दी। पहले मैंने उसकी शर्ट की बाजू ऊपर करवाए, फिर एक मिंट वाली टॉफ़ी दी उसे क्योंकि पानी मेरे पास भी नहीं था। इतने में वो बच्चा मेरे साथ खेलने लग गया। पर मेरे लम्बे से सफ़र का एक पड़ाव ख़तम होने को था और लग रहा था कि अभी भी मेट्रो से काफी दूर थी मैं। बरहाल बच्चे ने बड़े प्यार से मुझे हाथ हिला कर बाय बोला मानों कह रहा हो मम्मी को समझाने के लिए धन्यवाद।
मेट्रो स्टेशन पर जाने के लिए एक एस्कलेटर पर चढ़ी तो उसमें तीन-चार बच्चे, एकदम मलंग, पूरी मस्ती में एस्कलेटर से ऊपर तक जाते फिर नीचे उतारते। यह खेल उन्हें बड़ा मजेदार लग रहा था। बिना मेहनत के मजे करते हुए जाओ फिर भाग के नीचे उतरो।
उसका दूसरी साइड वाला एस्कलेटर काम नहीं कर रहा था और बड़ी हैरानी हुई मुझे यह देख कर कि ग्रुप का सबसे बड़ा लड़का एस्कलेटर के नीचे लगे लाल बटन दबा रहा था मानों वो ही चालू करेगा इसको। मुझे लगा चाहे जिन्दगी ने इनको पूरी सुविधाएँ नहीं दी हैं पर ये खुद को किसी का मोहताज़ नहीं समझते। वे अपनी क़ाबलियत का प्रदर्शन करने का मौका जहाँ भी मिलता है कर देते हैं।
आज लग रहा था मानों चारों तरफ बचपन ही बिखरा हुआ है। अलग-अलग रंगों में। मानों हर रंग मुझे कह रहा हो अपने अन्दर के बच्चे को कभी बड़ा मत होने देना, जो तुझे कभी दुनिया का तो कभी तुम्हारा ही अक्स दिखाता है। मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत थी और इन बिखरे रंगों को खुद में समेटे मैं मेट्रो में चढ़ गई। सीट नहीं थी बैठने को पर सभी खड़ी सवारियों की तरह तस्सली थी—चलो ए.सी तो चल रहा है।
हाल ही में एक सर्वेक्षण हुआ था जिसमें ७४ प्रतिशत दिल्ली-वासिओं ने मेट्रो को दिल्ली के विकास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बताया।
तो बचपन इस मेट्रो में भी था। पर मम्मी पापा के फ़ोन की गेम्स में उलझा हुआ। आस-पास क्या हो रहा है, क्या गुज़र रहा है कुछ पता नहीं क्योंकि मोबाइल की स्क्रीन पर इतनी तेज हरकतें होती है कि दिमाग कुछ और सोच ही नहीं पाता।
मुझे याद है जब बचपन में हम रेल से सफ़र करते थे तो हम भाई बहनों में अक्सर इस बात को ले कर लड़ाई होती थी कि खिड़की के पास कौन बैठेगा। फिर मम्मी मध्यस्ता करते हुए बारी लगा देती थी—खिड़की के पास बैठने की। तो लड़ाईयां यहाँ भी हो रही थी, पर इस बात पे की मोबाइल या टेबलेट कौन लेगा। और मम्मी हमेशा की तरह अपना रोल निभा रही थी—बारी लगाने की। एक-एक गेम लगाने की बारी।
ज्यादा दूर नहीं जाना था। तीन ही स्टॉप थे तो उतर गई। बचपन की खुशबू से सरोबार।
मुझे उनकी भी याद आई जिनके लिए एस्कलेटर भी एक खेल था, उसकी भी जिसकी खेल का दायरा बहुत सीमित था और जिसको उसके दोस्त बैठने वाले खेल खिलाते होंगे—लूडो, कैरम या फिर यही मोबाइल, पर उसका मन पकड़म पकड़ाई या फिर साईकिल चलाने का होगा। लेकिन ऐसे में भी उस बच्चे और उसके माँ-बाप ने उसके लिए नए आयाम तय कर रखे हैं जिसमें थकना मन है और हौसला हारने पर प्रतिबंध।
आज लगभग एक साल बीत जाने पर ऐसा लग रहा है कि उस बुत के पैरों में भी वही स्प्रिंग लग गए हैं और बिना अभिव्यक्तियों के वो भी उस रेले के साथ बस बढ़ता ही चला जा रहा है।
बहुत बदलाव आये इस एक साल में। अच्छा बुरा समय। कभी जिन्दगी खींच कर एक रास्ते पर ले जाती, तो कभी मैं उसको उस डगर पर ले जाती जहाँ मैं जाना चाहती थी।
और जो दिखने वाले बदलावों में था वो था मेरा सफ़र, जो कि तिगुनी रफ़्तार से बढ़ गया था। तो अब जितना मेट्रो से सफ़र होता था उतना ही बस से भी और शायद उतना ही पैदल भी। पर अब आम से लोगों की रोजमर्रा की ख़ास कहानियाँ कुछ दूर सी लगने लगी थी। और जब इस बात का एहसास हुआ तो खुद से ही शिकायत की। अपनी थकी हुई सी भावनाओं को झंझोड़ कर फिर से अपने सफ़र की शुरुआत की। बिल्कुल उस बच्चे की तरह जो पहली बार स्कूल जा रहा हो। जितने सच्चे भाव आप एक बच्चे के मुँह पर देख सकते हैं वो किसी वयस्क के चेहरे पर विरले ही देखने को मिलते हैं।
सफ़र की शुरुआत में ही उस निश्छल बचपन से मुलाकात हो गई। सात आठ साल का बच्चा स्कूल यूनिफार्म में। दो-तीन साल बड़ी बहन ने उसका और अपना बैग पकड़ा हुआ था। लड़के के दोनों पैरों में क्ल्चेस लगे थे।
सोचा जिस दिन जिन्दगी आशा का दमन छोड़ देगी तो उस दिन जिन्दगी का क्या हश्र होगा?
एक सलाम किया उस संघर्ष को जो वो बच्चा अपनी जिन्दगी के लिए कर रहा था और उस परिवार को जो उसको मुश्किलों में जीना भी सिखा रहा था, और उनसे लड़ना भी।
हमने जल्दी से मुस्कुराहटों का आदान प्रदान किया और अपने-अपने रास्तों पर बढ़ गए। उसने मेरी आँखों में अपने लिए सम्मान के भाव पढ़ लिए थे शायद और मैंने उसकी आँखों में दृढ़ता के। लगा शुरुआत अच्छी हुई है तो अंत भी अच्छा ही होगा।
अब बारी बस की थी। बस में २०-२२ की लड़की। गोद में एक डेढ़ साल के बच्चे को सँभालने की कोशिश कर रही थी। कभी अपनी साड़ी का गिरता पल्लू संभालती और कभी लुढ़कता हुआ बच्चा। पता चल रहा था कि उस छोटी सी माँ को अभी बहुत कुछ सीखना था। वो बच्चे को कभी गोदी में लिटाती तो कभी कंधे पर। पर बच्चे की बेकरारी कायम थी। धूप खिड़की से छन-छन कर आ रही थी।
गर्मी में उसकी पूरी बाजू की शर्ट भी उसे परेशान कर रही थी। तो मैंने एक अनुभवी माँ होने का सर्टिफिकेट दिखाए बिना उससे कहा, "इसे प्यास लगी है।"
उसने कहा, "अभी आनंद विहार पर ही तो पानी पिलाया था।"
मैंने फिर कहा, "गर्मी में बड़ों की हालत ख़राब हो रही है, यह तो फिर एक बच्चा है।"
फिर मैंने उसके बिना पूछे, सफ़र में जाते समय, खास कर छोटे बच्चे के साथ रखने वाली चीज़ों की एक पूरी लिस्ट बता दी। पहले मैंने उसकी शर्ट की बाजू ऊपर करवाए, फिर एक मिंट वाली टॉफ़ी दी उसे क्योंकि पानी मेरे पास भी नहीं था। इतने में वो बच्चा मेरे साथ खेलने लग गया। पर मेरे लम्बे से सफ़र का एक पड़ाव ख़तम होने को था और लग रहा था कि अभी भी मेट्रो से काफी दूर थी मैं। बरहाल बच्चे ने बड़े प्यार से मुझे हाथ हिला कर बाय बोला मानों कह रहा हो मम्मी को समझाने के लिए धन्यवाद।
मेट्रो स्टेशन पर जाने के लिए एक एस्कलेटर पर चढ़ी तो उसमें तीन-चार बच्चे, एकदम मलंग, पूरी मस्ती में एस्कलेटर से ऊपर तक जाते फिर नीचे उतारते। यह खेल उन्हें बड़ा मजेदार लग रहा था। बिना मेहनत के मजे करते हुए जाओ फिर भाग के नीचे उतरो।
उसका दूसरी साइड वाला एस्कलेटर काम नहीं कर रहा था और बड़ी हैरानी हुई मुझे यह देख कर कि ग्रुप का सबसे बड़ा लड़का एस्कलेटर के नीचे लगे लाल बटन दबा रहा था मानों वो ही चालू करेगा इसको। मुझे लगा चाहे जिन्दगी ने इनको पूरी सुविधाएँ नहीं दी हैं पर ये खुद को किसी का मोहताज़ नहीं समझते। वे अपनी क़ाबलियत का प्रदर्शन करने का मौका जहाँ भी मिलता है कर देते हैं।
आज लग रहा था मानों चारों तरफ बचपन ही बिखरा हुआ है। अलग-अलग रंगों में। मानों हर रंग मुझे कह रहा हो अपने अन्दर के बच्चे को कभी बड़ा मत होने देना, जो तुझे कभी दुनिया का तो कभी तुम्हारा ही अक्स दिखाता है। मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत थी और इन बिखरे रंगों को खुद में समेटे मैं मेट्रो में चढ़ गई। सीट नहीं थी बैठने को पर सभी खड़ी सवारियों की तरह तस्सली थी—चलो ए.सी तो चल रहा है।
हाल ही में एक सर्वेक्षण हुआ था जिसमें ७४ प्रतिशत दिल्ली-वासिओं ने मेट्रो को दिल्ली के विकास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बताया।
तो बचपन इस मेट्रो में भी था। पर मम्मी पापा के फ़ोन की गेम्स में उलझा हुआ। आस-पास क्या हो रहा है, क्या गुज़र रहा है कुछ पता नहीं क्योंकि मोबाइल की स्क्रीन पर इतनी तेज हरकतें होती है कि दिमाग कुछ और सोच ही नहीं पाता।
मुझे याद है जब बचपन में हम रेल से सफ़र करते थे तो हम भाई बहनों में अक्सर इस बात को ले कर लड़ाई होती थी कि खिड़की के पास कौन बैठेगा। फिर मम्मी मध्यस्ता करते हुए बारी लगा देती थी—खिड़की के पास बैठने की। तो लड़ाईयां यहाँ भी हो रही थी, पर इस बात पे की मोबाइल या टेबलेट कौन लेगा। और मम्मी हमेशा की तरह अपना रोल निभा रही थी—बारी लगाने की। एक-एक गेम लगाने की बारी।
ज्यादा दूर नहीं जाना था। तीन ही स्टॉप थे तो उतर गई। बचपन की खुशबू से सरोबार।
मुझे उनकी भी याद आई जिनके लिए एस्कलेटर भी एक खेल था, उसकी भी जिसकी खेल का दायरा बहुत सीमित था और जिसको उसके दोस्त बैठने वाले खेल खिलाते होंगे—लूडो, कैरम या फिर यही मोबाइल, पर उसका मन पकड़म पकड़ाई या फिर साईकिल चलाने का होगा। लेकिन ऐसे में भी उस बच्चे और उसके माँ-बाप ने उसके लिए नए आयाम तय कर रखे हैं जिसमें थकना मन है और हौसला हारने पर प्रतिबंध।
© उपमा डागा पार्थ २०१३