१६ दिसम्बर यानी आज से ८ दिन पहले चलती बस में एक पैरा मेडिकल की छात्र के साथ सामूहिक बलात्कार, दरिंदगी से उसके और उसके साथी की पिटाई। फिर हैवानियत की हदें पार करके उन दोनों को निर्वस्त्र बीच सड़क पे फेंकना। कौन सी अवस्था ज्यादा मार्मिक है यह निर्णय कर पाना बहुत मुश्किल था।
दिल दहला देने वाली इस घटना ने सबको झिंझोड़ के रख दिया था। लोग सड़कों पर उतर आए। सरकार इस उमड़ते हुए सैलाब को रोकने में मानों नाकाम सी हो गई हो।
यह सब घटना क्रम इतनी तेजी से हुआ कि सोचने की शक्ति खत्म सी हो गई। मन खिन्न था पर रोजमर्रा के काम चूँकि निपटाने ही होते है तो बस वही किसी तरह पूरे हो पा रहे थे। ऐसे में पता चला कि सरकार ने रोष की इस आंधी को रोकने के लिए धारा १४४ लगा दी और भीड़ को रोकने के लिए मेट्रो के ९ स्टेशन बंद कर दिए। मेरी किस्मत यह कि इनमें से ७ स्टेशन मेरे रास्ते में थे। तो आज परेशानियों के इस भवंर में एक परेशानी यह भी थी कि ड्यूटी पर कैसे पहुंचा जाए। टाइम बचाने के लिए मैंने सबसे आसान काम किया—लंच छोड़ दिया। तो बचे न पूरे १० मिनट, जो मेरे लिए काफी थे।
मेट्रो मिलने का तो सवाल नहीं था तो बस से जाने का सोचा, पर मुझे रूट का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था। और स्टॉप पे खड़े-खड़े सुना कि ट्रैफिक का बहुत बुरा हाल है। तो इकलौते बचे उपाय के तौर पे मैंने ऑटो लेने में ही अपनी भलाई समझी।
ऑटो वाले को जैसे ही मैंने कहा "आकाशवाणी?"
तो उसने मुझसे पूछा, "मैडम जाम तो नहीं होगा?"
मुझे हंसी भी आई और गुस्सा भी। "मैं क्या ऑटो चलाती हूँ ? आपको पता होना चाहिए।" खैर वो तैयार हो गया जाने को।
मैं ऑटो में बैठ कर भी अपनी नज़रें घड़ी से हटा नहीं पा रही थी।
सड़कों पे बसें लदी हुई थी लोगों से। और मेट्रो स्टेशन बाहर से ही वीरान लग रहे थे। जगह-जगह लोग खड़े थे—बस, ऑटो जो भी मिले लेने को तैयार। परेशान और बेबस। एक जगह से दूसरी जगह कैसे जाया जाए इसी सोच में उलझे हुए से।
जनता के गुस्से, नाराज़गी या रोष का जवाब देने का सरकार का यह तरीका मेरी तो समझ में नहीं आया। जहाँ लोगों को सवालों की शक्ल में भी परेशानी मिलती है और मुश्किलों के हल के तौर पे भी दिक्कतें।
आई टी ओ पहुँच कर देखा तो एक लम्बा जाम मेरा इंतजार कर रहा था। १५ मिनट बाद हम किसी तरह थोड़ा सा आगे बढ़े तो आगे पुलिस वाले से ट्रैफिक का हाल सुन कर ऑटो वाले ने यू टर्न ले लिया। ट्रैफिक था, पर थोड़ा कम। मैं एक बार बाहर भीड़ को देखती और फिर घड़ी को। आज ऑटो से तेज शायद मेरी घड़ी चल रही थी।
रास्ते भर लोग मेरे ऑटो को रोकते रहे, खाली समझ कर। पर मेरी मंजिल अभी भी दूर थी।
सड़क पे खड़ा, ऑटो में बैठा और झुंझलाता हुआ हर इंसान आज मेट्रो को बहुत मिस कर रहा था। और मैं भी...
इन दिक्कतों में मैंने एक बात महसूस की। गली, मोहल्ला, नुक्कड़, बस स्टॉप—हर जगह लोग सिर्फ इसी की चर्चा कर रहे थे। सब गालियाँ दे रहे थे और मौत की सजा मांग रहे थे उन वहशियों के लिए।
माँ-बाप भी अचानक बच्चों से छुपाने की जगह बात कर रहे थे—जुर्म की, होने की वज़ह की, उसके असर का। अब इन सबके साथ वो बच्चों को बड़ा करने की कोशिश में थे या खुद के डर पे काबू पाने की... यह तो पता नहीं पर चर्चा जारी थी हर जगह।
इस माहौल में कभी जाम में फंसते, तो कभी रुकते रुकाते किसी तरह मैं आकशवाणी पहुँच गई। अपने टाइम से थोड़ा से लेट। पर... पहुंची तो।
एक और बात नोटिस की मैंने इन ८ दिनों में—अचानक पुरुषों ने थोड़ा और तमीज से पेश आना शुरू कर दिया था। यह जानते हुए भी कि वो हादसे में शामिल नहीं थे, उसका हिस्सा नहीं थे, पर उन ६ लोगों ने पूरी कौम पे जो कलंक लगाया है शायद इससे कुछ कालिख कम हो जाए... यह संभला हुआ माहौल, यह गुस्सा, यह रोष में हिस्सेदारी—सब सबूत थे कि अगर वहशी सैकड़ों की तादाद में बढ़े हैं तो इंसान हजारों, लाखों की तादाद में। तो गिनती कम नहीं थी और अब तो हौसलों में भी कमी नहीं थी।
इन्हीं सब के बीच एक छोटा सा मिशन अभी बाकी था। जी हाँ... मेरा घर वापसी का मिशन... वो भी बिना मेट्रो के...
मेट्रो मिलने का तो सवाल नहीं था तो बस से जाने का सोचा, पर मुझे रूट का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था। और स्टॉप पे खड़े-खड़े सुना कि ट्रैफिक का बहुत बुरा हाल है। तो इकलौते बचे उपाय के तौर पे मैंने ऑटो लेने में ही अपनी भलाई समझी।
ऑटो वाले को जैसे ही मैंने कहा "आकाशवाणी?"
तो उसने मुझसे पूछा, "मैडम जाम तो नहीं होगा?"
मुझे हंसी भी आई और गुस्सा भी। "मैं क्या ऑटो चलाती हूँ ? आपको पता होना चाहिए।" खैर वो तैयार हो गया जाने को।
मैं ऑटो में बैठ कर भी अपनी नज़रें घड़ी से हटा नहीं पा रही थी।
सड़कों पे बसें लदी हुई थी लोगों से। और मेट्रो स्टेशन बाहर से ही वीरान लग रहे थे। जगह-जगह लोग खड़े थे—बस, ऑटो जो भी मिले लेने को तैयार। परेशान और बेबस। एक जगह से दूसरी जगह कैसे जाया जाए इसी सोच में उलझे हुए से।
जनता के गुस्से, नाराज़गी या रोष का जवाब देने का सरकार का यह तरीका मेरी तो समझ में नहीं आया। जहाँ लोगों को सवालों की शक्ल में भी परेशानी मिलती है और मुश्किलों के हल के तौर पे भी दिक्कतें।
आई टी ओ पहुँच कर देखा तो एक लम्बा जाम मेरा इंतजार कर रहा था। १५ मिनट बाद हम किसी तरह थोड़ा सा आगे बढ़े तो आगे पुलिस वाले से ट्रैफिक का हाल सुन कर ऑटो वाले ने यू टर्न ले लिया। ट्रैफिक था, पर थोड़ा कम। मैं एक बार बाहर भीड़ को देखती और फिर घड़ी को। आज ऑटो से तेज शायद मेरी घड़ी चल रही थी।
रास्ते भर लोग मेरे ऑटो को रोकते रहे, खाली समझ कर। पर मेरी मंजिल अभी भी दूर थी।
सड़क पे खड़ा, ऑटो में बैठा और झुंझलाता हुआ हर इंसान आज मेट्रो को बहुत मिस कर रहा था। और मैं भी...
इन दिक्कतों में मैंने एक बात महसूस की। गली, मोहल्ला, नुक्कड़, बस स्टॉप—हर जगह लोग सिर्फ इसी की चर्चा कर रहे थे। सब गालियाँ दे रहे थे और मौत की सजा मांग रहे थे उन वहशियों के लिए।
माँ-बाप भी अचानक बच्चों से छुपाने की जगह बात कर रहे थे—जुर्म की, होने की वज़ह की, उसके असर का। अब इन सबके साथ वो बच्चों को बड़ा करने की कोशिश में थे या खुद के डर पे काबू पाने की... यह तो पता नहीं पर चर्चा जारी थी हर जगह।
इस माहौल में कभी जाम में फंसते, तो कभी रुकते रुकाते किसी तरह मैं आकशवाणी पहुँच गई। अपने टाइम से थोड़ा से लेट। पर... पहुंची तो।
एक और बात नोटिस की मैंने इन ८ दिनों में—अचानक पुरुषों ने थोड़ा और तमीज से पेश आना शुरू कर दिया था। यह जानते हुए भी कि वो हादसे में शामिल नहीं थे, उसका हिस्सा नहीं थे, पर उन ६ लोगों ने पूरी कौम पे जो कलंक लगाया है शायद इससे कुछ कालिख कम हो जाए... यह संभला हुआ माहौल, यह गुस्सा, यह रोष में हिस्सेदारी—सब सबूत थे कि अगर वहशी सैकड़ों की तादाद में बढ़े हैं तो इंसान हजारों, लाखों की तादाद में। तो गिनती कम नहीं थी और अब तो हौसलों में भी कमी नहीं थी।
इन्हीं सब के बीच एक छोटा सा मिशन अभी बाकी था। जी हाँ... मेरा घर वापसी का मिशन... वो भी बिना मेट्रो के...
© उपमा डागा पार्थ २०१२