आज लगभग दो महीने हो गए दोबारा ऑफिस जॉइन किये हुए लेकिन अभी भी लगता है घर और बाहर की जिन्दगी में पूरी तरह सांमजस्य नहीं बिठा पाई हूँ। ऐसा लगता है एक काम करती हूँ तो दूसरा छूट जाता है। चूँकि एक समाचार वाचक के रूप में मुझे रोज ऑफिस जाने की ज़रुरत नहीं होती इसलिए घर वालों की अपेक्षाएँ भी शायद कम नहीं हुई है।
घर और बाहर की इसी खींचातानी में अभी तक जो 'सुपर वुमन' का टाइटल मिला हुआ था, वो छिनता हुआ सा नज़र आ रहा था। तो एक नाराज़गी सी थी। अब यह नाराज़गी सारे काम न कर पाने की वज़ह से थी या एकदम से बढ़ी जिम्मेवारियों को अच्छे से न निभा पाने की मेरी खुद की धारणा की वज़ह से थी—पता नहीं।
खैर घर के कामों को किसी तरह निपटा कर और बच्चों को पढ़ने की हिदायत दे कर मैं अपने सफ़र की तरफ चल पड़ी—खुद से थोड़ी नाराज़ सी।
मेट्रो में थोड़ी भीड़ थी, पर गाड़ी छोड़ने का टाइम नहीं था। सोच के मुताबिक बैठने की जगह नहीं थी। थकान बहुत हो रही थी, पर कोई चारा नहीं थी। तो खड़ी रही एक कोने में चुपचाप। तभी देखा, डिब्बे में कोने वाली सीट पर दो युवक बैठे है। लेडीज़ डिब्बे में युवक! यह मुझे हैरान करने के लिए काफी था। बैठने को तरसती मैं सोचने लगी कि कैसे बेशरम हैं—इतनी औरतें खड़ी है और यह दोनों बैठे है।
पर कोई इनको उठा क्यों नहीं रहा? यह सवाल दिमाग में आया। चूँकि वो मुझसे पहले से बैठे थे तो लगा हो सकता है लोगों ने बोला हो और उनकी बदतमीजी की वज़ह से सब चुप हों। मैंने सोचा जिस स्टेशन पर भी उतरेंगे उसी पे पुलिस पकड़ के फाइन ठोकेगी तब इनकी सारी अकड़ निकल जाएगी।
मैं यही सब सोच ही रही थी कि राजीव चौक आ गया। उनको भी शायद वहीं उतरना था। कोने में बैठे युवक ने अपनी गोद में रखा बैग अपना साथ वाले का पकड़ाया और सीट से नीचे उतर गया। उसके साथी ने अपना और उसका सामान उठाया और चलने लगा। उसने सीट के नीचे से अपनी चप्पल निकाली और अपने हाथ में पहन ली। अब तक मैं देख चुकी थी कि उसके दोनों पैर नहीं थे।
मैं सब देख कर एकदम सन्न थी। चेहरे से बिलकुल समान्य दिखने वाला इंसान कैसे खुद को ढो रहा है। अपनी सोच पे इतनी शर्मिंदगी हुई कि खुद से ही नज़रें नहीं मिला पा रही थी। पर उसके चेहरे पे कोई शिकन नहीं थी। मानों भागवान के इस फैसले को भी उसने हँसते हुए स्वीकार कर लिया हो। और मैं इसी पशोपश में थी कि शारीरिक अपंगता झेलनी ज्यादा मुश्किल है या मानसिक।
वापसी में राजीव चौक पे एक भरी हुई मेट्रो खड़ी थी। इतनी भीड़ में जाने की हिम्मत सी नहीं हुई इसलिए उसे जाने दिया। अगली मेट्रो चार मिनट बाद थी। जैसे ही मेट्रो आई सब जल्दी से चढ़ गए। पर गाड़ी अभी भी रुकी हुई थी। तभी एक व्हील चेयर पर एक अंकल जी को लेकर दो मेट्रो कर्मी आये। अब बिना कोई देर किए मैंने उन्हें अपनी सीट दे दी। अंकल जी ने सूट पहन रखा था। व्हील चेयर से सीट पर आ के बैठने में उनकी सांस फूल गई। पास खड़ी एक लड़की ने अपनी पानी की बोतल उनकी तरफ यह कहते हुए बढ़ाई कि सुच्चा पानी है। "सुच्चा पानी" सुन के पंजाब की याद आ गई।
अंकल जी ने पानी की बोतल ले ली और लगभग आधी पी ली। जब वापिस करने लगे तो उसने कहा, "पी लीजिये अंकल। मुझे तो अगले स्टैंड पर उतरना ही है।"
"बस बेटा। अब मैं वैशाली तक पहुँच जाऊंगा।"
"भांजी की शादी में जा रहा हूँ। भात देनी है न। तो मुझे तो जाना ही है," उनकी बातें जारी थी। अचानक बोले, "बेटा, फ़ोन है तुम्हारे पास? मेरा मोबाइल घर छूट गया है।" फिर बिना जवाब का इंतजार किये वो नंबर बोलने लगे। लड़की से फ़ोन लेते ही उन्होंने फ़ौरन कहा, "हाँ। बैठ गया हूँ मेट्रो में। चलो पहुँच के फ़ोन करता हूँ।"
बड़े-बुजुर्ग आज भी हर चीज़ में किफ़ायत करते हैं फिर चाहे वो फ़ोन पे बात करने की हो या फिर मेट्रो से शादी में जाने की। जितनी देर में उन्होंने बात ख़त्म की हम लोग तब तक शायद सिर्फ हेलो ही बोल पाते हैं।
अंकल फिर बोले, "मेरी बीवी थी। पता है भांजी की शादी अमरीका में हो रही है, बहुत सी रस्में होगी।" मानों सब को शादी के बारे में सब कुछ बता देना चाहते हों। पर मेरे दिमाग में एक ही बात घूम रही थी—रिश्तेदारी, फ़र्ज़, रस्मे और निभाना क्या सिर्फ इसी पीढ़ी के साथ ख़तम हो जायेगा? क्या इनके घर में ऐसा कोई नहीं था जो फ़र्ज़ निभाने की इनकी चाह को पूरा कर पाता। एक मामा को भात की रस्म के लिए उसकी भांजी के पास छोड़ आता। पर मेरे सवाल सिर्फ मेरे अन्दर थे और बाहर सिर्फ अंकल की बातें सुनाई दे रही थी, जो वो सुना रहे थे या कह लीजिए जो वो सुनाना चाह रहे थे।
तभी अगले स्टेशन से फिर एक व्हील चेयर अन्दर आती दिखाई दी। इस बार जो उस चेयर पे थे, बहुत भारी या कहिए मोटे थे। और व्हील चेयर ठेलने वालों से उनको ठेला नहीं जा रहा था। बड़ी मुश्किल से लोग उनको अन्दर ला पाए। उनके पैर बहुत सूजे हुए थे और दोनों पैरों पर मोटी मोटी पट्टियाँ बंधी थी। चेयर से सीट पर बैठते हुए वो अपने आप को संभाल नहीं पाए और सीट पर गिर से गए। दो सीट तो पहले ही उनके लिए खाली कर दी गई थी, पर वो अपना बोझ संभल नहीं पाये और टेढ़े से हो कर सीट पर अधलेटे से हो गए।
मैंने उनको सहारा दे के सीधा करना चाहा पर मुझ अकेली के बस की बात नहीं थी। मैंने उन लोगों को डांटते हुए कहा, "सीधा तो करो उनको।"
"अरे इतनी बुरी हालत है तो घर से निकलते क्यों हैं," वो लोग झल्लाते हुए बोले।
मेरा ध्यान उनके पैरों पर पड़ा। देखा पैरों के नाखून बहुत भद्दे और बड़े हो रखे थे। पता नहीं कितने महीनों से कटे नहीं थे। उनके मुँह से सिर्फ करहाने की आवाजें आ रही थी। भारी शारीर, पैरों में पट्टियाँ, बड़े हुए नाखून और दर्द न बयां करने की लाचारी। पता नहीं कितने आंसू छुपाये होंगे उन्होंने अपने अन्दर और कौन-कौन सा दर्द पी रहे होंगे अकेले। किस मजबूरी में और कहाँ से अपने आप को अकेले लिए वो कहाँ जा रहे थे।
सवाल आपस में ही टकरा रहे थे और जवाब हमेशा की तरह नदारद थे।
मेरा स्टॉप आ गया था। उन मोटे अंकल के लिए भी व्हील चेयर आ गई थी। सिर्फ दो स्टॉप का सफ़र तय करना था उनको और उसके लिए वो लोगों की बातें भी सुन रहे थे और खुद को भी भोग रहे थे। जाने यहाँ से उन्हें कहाँ और कैसे जाना था। मेट्रो कर्मी ज्यादा से ज्यादा उन्हें गेट तक छोड़ सकते थे। उसके बाद...
उनकी दशा देख कर मन छलनी सा हो गया, बस आँखों में आंसू ही नहीं आए। लाचारी को आज मैंने देखा नहीं महसूस किया था। और सुबह जो नाराज़गी थी खुद से वो अपने आप कहीं दूर चली गई थी। जिस थकान, अकेलेपन और अपेक्षाओं से मैं खुद को दबा हुआ महसूस कर रही थी वो भी अब कहीं आस पास नहीं थे। उदास होते हुए भी उस ना नज़र आने वाले भगवान के आगे मेरा सर झुक गया। लगा मेरे पास तो बहुत कुछ है—खुद को और लोगों को देने के लिए। और मैं बहुत कुछ कर सकती हूँ सिर्फ और सिर्फ अपनी मदद से।
एक अरज सी निकली मन से—हे भगवान! कभी भी मुझे इतना मजबूर मत करना कि लोगों की आँखों से मेरे लिए बेचारगी के आंसू आये।
© उपमा डागा पार्थ २०१२
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