रविवार, 9 दिसंबर 2012

माँ बेटी

पिछले तीन दिनों से मेट्रोस्तान मेरे सामने दो चरित्रों की कहानियां बार-बार सामने ला रहा है। पर चरित्र वही होते हुए भी कहनियाँ अलग-अलग थी। लोग कहते हैं हर सिक्के के दो पहलू होते हैं पर मुझे तो लगा जितनी बार सिक्का उछालोगे एक नया ही पहलू सामने आएगा।

पात्र हैं—माँ बेटी। तो क्यों न शुरुआत मैं खुद से करूँ।

दो तीन दिन से मम्मी की बहुत याद आ रही है। वैसे माँ की याद के लिए दिल का एक कोना हमेशा ही रिज़र्व रहता है, पर ज्यादा आने का कारण है—रोज-रोज की यह बढ़ती ठण्ड। मेरी मम्मी की एक बहुत ही प्यारी आदत है—शायद माँ होने के कारण—सर्दियाँ शुरू होते ही, जब भी मैं बाहर निकलती वो हर बार कहती: "शाल ले जाओ।"

चूँकि मेरी सर्दियाँ थोड़ी देर से शुरू होती हैं तो मैं कहती, "मम्मी अभी से? अभी तो आइसक्रीम खाने का टाइम आया है।" और मैं हँसते हुए चली जाती।

इतने सालों में न उनका सवाल बदला और न मेरा जवाब।

एक बार बहुत संजीदगी से मैंने उनसे पूछा, "जब आपको पता है की मैं शाल नहीं ले के जाऊँगी, तो आप कहती क्यों हो?" वो बड़ा मुस्कुरा के बोली, "बेटा, माँ के दिल को लॉजिक समझ में नहीं आते। मुझे जब दिख रहा है कि किसी चीज़ से तुम्हे नुकसान हो रहा है तो मैं तो तुम्हे रोकूंगी न। और शायद मेरी पगली को कभी समझ आ जाये कि सर्दियों में शाल ओढ़ी जाती है, आइसक्रीम नहीं खाई जाती," मम्मी ने लगभग मेरा कान मरोड़ते हुए कहा। फिर हम दोनों हंसने लगे।

और आजकल मैं कुछ तो मिस कर रही थी...

दूसरा पात्र

वापसी में राजीव चौक से एक भीड़ ने मानों मुझे मेट्रो में रख दिया हो। तो बैठने का सवाल ही नहीं था। मैं एक जगह सहारा ले कर खड़ी हो गई। ८:३० के करीबन समय था। मेरे पीछे खड़ी लड़की का मोबाइल बजा।

उसने फ़ोन उठाते ही कहा, "जी मम्मी।"

"मेट्रो में।"

"जी। आज थोड़ी देर हो गई।"

"आपको बताया था न हम लोग रागिनी के यहाँ मिलने वाले थे।"

"सब लोग मतलब सब।" सब कहते हुए उसने दसेक नाम गिनवा दिए जिनमें से दो तीन लड़को के थे और मम्मी को शायद यही पता करना था।

"जी। पहनी हुई है जैकेट।"

"खाया था खाना। मम्मी पार्टी के लिए जायेंगे और खाना नहीं खाऊँगी? आप भी न..."

मुझे लगा माओं की सिर्फ शक्ल बदलती है, उनकी बुनियादी चिंताएं विश्व स्तर पर शायद वही होती हैं। देर होने पे डांटते हुए भी उसे चिंता हो रही थी की बेटी ने खाया कि नहीं। सर्दियों के कपड़े पहने कि नहीं। हे माँ! तुम धन्य हो।

"मम्मी। अभी भी मैं सबसे पहले उठ के आई हूँ।" उसकी सफाईया जारी थी।

"अब हो गई देर, बताओ क्या करूँ ?"

"ठीक है आगे से नहीं जाउंगी।" उसने झुंझुला कर बात करनी चाही।

"तो फिर आप ही तो कह रही हो?"

"अच्छा बाबा। हो गई गलती। आगे से नहीं होगा।"

पुरे रास्ते वो अपनी माँ को यकीं दिलवाती रही कि वो अपनी दोस्त के यहाँ से आ रही है और देर जो आज हुई है फिर नहीं होगी।

मुझे लगा अगर माँ-बाप बेटी को कहीं बाहर भेज रहे हैं, पढ़ने या नौकरी के लिए—तो इतना यकीं तो अपनी औलाद पर रखना ही पड़ेगा कि वो हिफाज़त से रहेगी, बचपन से सिखाये संस्कारों के साथ। और उस लड़की के चेहरे पे सच्चाई तो थी। खैर गलत शायद कोई भी नहीं था अपनी जगह पे।

माँ बेटी को जिस डोर ने बाँधा होता है, उसका धागा, धागा होते हुए भी, बहुत मजबूत होता है।

तीसरा पात्र

वही मेट्रो, और लगभग वही समय—रात के ८:३०।

यह टाइम शायद वो होता है जब माओं की चिंता की घड़ी सबसे तेज चलती है।

फ़ोन बजा।

"हूँ। मेट्रो में।"

उसको पता था कि फ़ोन माँ का है और वो कुछ कहेंगी। उसके हावभाव दिखा रहे थे कि उफ़! मम्मी  मुझे पूछने के लिए फ़ोन कैसे कर सकती हैं। मैं अब इतनी बड़ी हो गई हूँ। और आप मुझसे बच्चों वाले सवाल पूछती रहती हो।

"अरे मम्मी। आ रही हूँ। देर कहाँ हुई है? आप तो ऐसे शोर मचा रही हो जैसे १२ बज गए हों।" विरोधाभास उसके एक-एक शब्द में झलक रहा था।

"ठीक है। हाफ एन ऑवर लग जाएगा," कह के उसने सर झटकते हुए फ़ोन रख दिया।

पास में खड़े उसके ग्रुप की दूसरी लड़की ने इशारे से, बिना अपना ईरफ़ोन हटाये, पूछा क्या हुआ।

उसने उसी झल्लाहट में जवाब दिया, "मम्मी थी यार। खुद तो मस्ती कर लेती हैं जब मेरी बारी आती है तो इनको रूल्स याद आ जाते हैं।"

लगा बराबरी के इस दौर ने माँ से बच्चों की चिंता करने का हक शायद छीन लिया है। या फिर अधिकारों ने अपना दबदबा इतना कर लिया है की कर्तव्य दूर कहीं दुबक के बैठ गया है।

और उसको गुस्सा सिर्फ अधिकार छिनने का था, कर्तव्य और जवाबदेही... यह शब्द नए ही लग रहे थे उसके लिए।

चौथा पात्र

अगला दिन, दोपहर के चार बजे।

मेट्रो में भीड़ बहुत ज्यादा नहीं थी। पर जैसा कि हर स्टॉप पे होता है। चढ़ने वाले नए लोग सीट तलाशते हुए चढ़ते हैं।

एक माँ ३-४ साल के बच्चे को गोद में उठाये अन्दर घुसी। एक सीट पर एक महिला एक बच्ची के साथ बैठी थी। बच्ची की उम्र भी वही थी ३-४ साल। चढ़ने वाली महिला ने बच्चे को सरकने को कहा। बच्ची ने मना कर दिया। माँ ने उसको उठने को कहा। बच्ची भी जिद पे थी, उसने मना कर दिया। माँ ने उसको उठा के जोर से खड़ा कर दिया और गुस्से में उसको एक थप्पड़ मारा। बच्ची जोर से रोना शुरू हो गई। जब तक हम सबको कुछ समझ आता, उसने जोर-जोर से ४-५ थप्पड़ मार दिए। डिब्बे में बैठे सब लोग सन्न रह गए। सब लोग बच्ची को चुप करवाने की कोशिश करने लगे, पर वो रोए जा रही थी और रोते-रोते सिर्फ अपनी माँ की तरफ देख रही थी। माँ कुछ भी सुनने के मूड में नहीं थी।

"यह हर बार ऐसा ही करती है। मैं इस बार इसको बोल के लायी थी। पर यह फिर बदतमीज़ी कर रही है।" और साथ-साथ उसको आँखे दिखाए जा रही थी।

बच्ची का रोना जारी था, लेकिन उसने जैसे पसीजने से इंकार कर दिया था।

सब उसको अपनी-अपनी तरह से चुप करवाने की कोशिश कर रहे थे, पर वो अजनबियों की इस भीड़ में एकमात्र पहचान वाले चेहरे को ही रोते हुए देखे जा रही थी। और परिचित चेहरा अचानक धुंधला सा क्यों हो रहा था, यह शायद आंसुओं से भीगी उसकी आँखें समझ नहीं पा रही थी।

उसके रोने से पूरा डिब्बा परेशां हो गया, पर माँ अभी भी उसको डाँट रही थी। तभी एक महिला आगे आई। उसने बच्ची को थोडा पानी पीने के लिए दिया। उसने मना कर दिया। फिर उसने उसको छोटा सा एक टैडी बियर दिखाया। बच्ची थोड़ी सी चुप हुई। फिर लोगो के समझाने पर माँ ने उसको पानी पिलाया और उसे गोद में ले लिया। धीरे-धीरे माहौल शांत हुआ। डिब्बे में सब लोग माँ के व्यवहार पर छीटाकशी कर रहे थे। माँ अभी भी नाराज़ थी अपनी बेटी से। छोटी-सी बच्ची से इतनी नाराज़गी की असली वज़ह क्या थी यह तो वो ही बता सकती थी। पर लोग एक माँ के ऐसे रूप को देख कर सिर्फ अपना पसंदीदा काम कर रहे थे—बातें बनाने का।  

मैं अवाक् थी—माँ बेटी के रिश्तों के इन अलग-अलग समीकरणों को देख कर। पर नया शायद कुछ नहीं था...

कहानियां सब सच्चाई बयां कर रही थी आज के युग की। पर कुछ सच्चाइयां माँए नहीं सुनना चाहती थी और कुछ बेटियाँ। स्वीकारने और सुधराने में से कौन सा रास्ता इख्त्यार करना है—यह फैसला दोनों को ही लेने की जरूरत है।

बस यही सोचते सोचते मैंने अपने सब कहानियों और उनके पात्रों से विदा ले ली। उनको सोचने की पूरी आज़ादी देते हुए मैं अपने सफ़र की तरफ बढ़ गई।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

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