कभी कभी होता है कि हालात इतने ज्यादा गतिशील हो जाते हैं कि प्रतिक्रियाएँ कहीं पीछे छूटती चली जाती हैं। जैसे बैग में एक किताब रखी हुई हो जिसके पहले कुछ पन्ने तो पढ़ लिए हो पर हर सफर में साथ होने पर भी उसको पूरा न पढ़ पाए।
पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ कुछ ऐसा ही हो रहा था। आधी-आधी पढ़ी किताबों की गिनती बढ़ती जा रही थी। और मैं मानों एक ऐसे समय का इंतज़ार कर रही थी जब मैं सिर्फ और सिर्फ पढ़ सकूँ। पर समय की बेरहमी से मैं क्या सभी लोग अच्छे से वाकिफ हैं।
बड़े दिनों के बाद खुद से जिद करके सोचा… चलो आज एक किताब पूरी की जाए।
मेट्रो आने में अभी चार मिनट थे। महीनों, दिनों, घंटों की रफ़्तार से कटती जिंदगी में मिनटों का पता सिर्फ इंतज़ार में ही चलता है। और मेट्रो के मिनटों के इंतज़ार में भीड़ की तदाद भी दुगनी रफ़्तार से बढ़ती जाती है। मैं कतार में पाँचवे या छठे नंबर पर थी। तभी एक मेट्रो कर्मी, एक व्यक्ति का हाथ थामे उसे लेडीज डिब्बे की तरफ ले आया। आँखों की रौशनी से महरूम था वो। रुकते ही उसने पूछा कितनी देर है मेट्रो आने में? मेट्रो कर्मी ने २ मिनट का समय बताया।
गाड़ी की आवाज़ सुन के उसने साथ आये आए व्यक्ति से गाड़ी का नंबर पूछा। मेट्रो कर्मी ने बताया ७६४४। मेट्रो रुकने पर मेट्रो कर्मी उसे हाथ पकड़ कर अंदर ले आया। सीट पर बैठी लड़की ने उसे देख कर सीट दे दी। वो पहले मना करते हुए अंतत उसे धन्यवाद करता हुआ बैठ गया। मेरी नज़र सीट के ऊपर लगे एक इश्तहार के बोर्ड पर पड़ी। आसान कर्ज़े के जरिए अपनों के लिए खुशियाँ बांटने का सन्देश दे रहा था वो किसी बैंक का इश्तहार। पर यह देख कर मुझे लगा कि खुशियां बांटने का दायरा सिर्फ अपनों तक ही सीमित नहीं है।
अभी मेट्रो चली नहीं थी। एक २८ -२९ साल का आदमी और एक उसी की उम्र की महिला का हाथ पकड़े अंदर आया। औरत की तबीयत ठीक नहीं थी इसीलिए उस आदमी को उसके साथ अंदर आने दिए गया। उस औरत की शक्ल पे ही दर्द झलक रहा था और आँखों में दबाया हुआ कोई जख़्म। उसने किसी से सीट नहीं मांगी पर एक लड़की ने उसका जर्द सा चेहरा देख कर खुद ही सीट दे दी । उसके साथ आया आदमी उसका हाथ छोड़ कर चुपचाप साथ लिए हुए बड़े से लिफाफे को सँभालते हुए कोने में खड़ा हो गया । पर उसको अभी सहारे की जरूरत थी। मैंने खड़े खड़े अपना हाथ बढ़ाया जिसकी मदद से वो बैठ गई। उसका साथी उस अंधे व्यक्ति के पास वाले कोने में वही बड़ा सा लिफाफा समेटते हुए खड़ा था (और वो उस व्यक्ति के साथ वाली सीट पर बैठी थी।)
तभी अंधे व्यक्ति ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला। मुझे लगा या तो उसकी उँगलियों को मोबाइल नंबर और मोबाइल पर नंबरों की स्तिथी बाखूबी पता थी या फिर उसने स्पीड डायल में कुछ नंबर डाल रखे थे। संभावनाएं दोनों ही झुठलाई नहीं जा सकती थी। खैर उसने फ़ोन के दूसरी तरफ वाले से बात करनी शुरू की।
"हाँ। "
"हम बैठ गए हैं मेट्रो में।"
"मेट्रो का नंबर ७६४४ है। "
बड़ी हैरानी हुई सुन कर। क्या कोई मेट्रो का नंबर भी किसी को बताता है? मैंने आज तक भूले भटके शुरू में एक दो बार कभी मेट्रो का नंबर देखा होगा। पर हो सकता है कुछ लोग ऐसे ही चलना पसंद करते हो। पूरे चौक्कने रह कर। मैं लापरवाही बरतने की समर्थक नहीं हूँ। पर यह मेरे लिए कुछ ज्यादा था।
क्या वो आँखों की रौशनी से महरूम था इसलिए इतनी एहतियात का प्रयोग कर रहा था या फिर आदतन?
खैर! बातचीत अभी जारी थी।
"हम बता रहे हैं कि हमारा फ़ोन नंबर तो तुम्हे पता ही है, मेट्रो नंबर भी याद कर लो। ७६४४। अब तुम बोलो।"
उसने शायद सोचा हुआ था कि आज दूसरी तरफ वाले को मेट्रो का नंबर याद करवा के ही दम लेगा।
"हम इसलिए बता रहे हैं कि दिल्ली में हाई अलर्ट लगा हुआ है।"
"हाँ भई! हाई अलर्ट," उसने दोहराते हुए कहा। "कभी भी कुछ कुछ भी हो सकता है।"
मेरे साथ खड़ी लड़की ने फ़ोन की बात सुन कर मेरी तरफ देख कर बोला, "क्या सच में?"
मुझे यकायक लगने लगा कि मैं गृह मंत्रालय की कोई उच्चस्थ पदाधिकारी हूँ। मैंने मुस्कुराते हुए नहीं में सिर भी वैसे ही हिलाया। और मंत्रालय का आश्वसन मिलने पर संतुष्ट लड़की वापिस अपने फ़ोन की दुनिया में गुम हो गई।
"तो अगर ऐसे में अगर मुझे कुछ हो तुम्हे पता तो होना चाहिए।" उसने अपनी बात पूरी करते हुए बोला।
लगा इस व्यक्ति को जिंदगी से प्यार ज्यादा है या उसे खोने का डर?
पर इतना डरते डरते जीने में क्या हम जिंदगी के कुछ खूबसूरत तजुर्बों से मुंह नहीं मोड़ लेते?
इतने में उस औरत के साथ वाली सीट खाली हो गई। मैं उसके पास बैठ गई। उसके बड़े से लिफाफे से एक्सरे झाँक रहे थे। उसके साथ हुए हादसे का अंदाजा हो रहा था मुझे। मैं उसके जख्म हरे नहीं करना चाहती थी। पर उसकी आँखों में इसरार था। सवाल करने का।
मैंने पूछा, "कहाँ से आ रही हो?"
उसने कहा, "अस्पताल से।" और उसकी आँखे भीग गई।
मैंने बस हल्के से उसके हाथ पे हाथ रखा, हौंसला देने को। उसका रुका हुआ कुछ कुछ आंसू बन के बाहर आ गया।
वो पति पत्नी अपने पहले बच्चे को दुनिया में आने से पहले ही खो कर आ रहे थे। पति बस खड़े खड़े अपने होंठ काटे जा रहा था। पत्नी आंसुओं को कभी रोकने की कोशिश करती और कभी अपनी ही कोशिशों से हारती चेहरे को तर करती रहती।
कुछ जख्म सांत्वना नहीं चाहते। बस टीस की तरह रह रह के उठते हैं और वक़्त की मरहम से ही ठीक होते हैं। यह जख्म तो हरे थे…
लगा हरेक के लिए उसकी जिंदगी की अहमियत, उसका नज़रिया कितना अलग है। कोई अपनी जिंदगी को ले कर इतना डरा रहता है कि हर सफर से पहले तमाम एहतियातों के साथ चलता है तो कोई अपनी जिंदगी दे कर भी एक खोई जिंदगी लौटाने की फरियाद करता है।
पर जिंदगी अपने खुद के फलसफों में ही यकीं रखती है।
ना चाहते भी मेरा स्टॉप पहले आ गया। पहले से थोड़ा संभल चुकी उस औरत को मैं बस ब्लेस यू ही कह पाई और उतरते हुए दुआ की कि जल्द ही उसको वो खुशियाँ मिले जो इस बार उसकी झोली में आते आते रह गई।
प्लेटफॉर्म पर बड़ा शोर था। एक पल के लिए लगा कि मेरे दिमाग का शोर क्या इतना तेज हो कि वो बाहर भी सुनने लगा है।
पर नहीं। गाड़ी से उतर कर एक व्यक्ति शोभा का नाम ले कर पूरे प्लेटफॉर्म पर चक्कर लगा रहा था। दरवाज़ा बंद होते होते किसी ने कहा वो लक्ष्मी नगर उतर गई है शायद। यह एक ३५-४० बरस के एक पिता जी थे जिन्होंने अपनी ८-१० साल की लड़की को लेडीज डिब्बे में चढ़ा दिया था और अब वो कहाँ थी पता नहीं। सबने उन्हें नीचे कंट्रोल रूम में जा कर सभी मेट्रो में अनाउंसमेंट करने की सलाह दी।
जिंदगी के प्रति लापरवाही की इस इंतहा ने तो मुझे बस चुप करवा दिया। सोचा कोई इतने छोटे से बच्चे को ले कर इतना लापरवाह कैसे हो है?
बाहर बढ़ रहे अँधेरे और घर से लगातार आने वाले फोनों के कारण देर तक रुकना संभव नहीं था। स्टेशन से उतरते-उतरते आसमानों में रहने वाली सी ताकत से कुछ मांगने का मन किया। थोड़ी नादानी, थोड़ा संयम, थोड़ा ठहराव, थोड़ा हौंसला... जिसको भी जिस जिस की जरूरत हो और मुस्कुराहटें… सबके लिए, ताकि सबका सफर, कितना भी छोटा या बड़ा क्यों ना हो, यादगार बन जाये।
© उपमा डागा पार्थ २०१५


