शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

नज़रिया

कभी कभी होता है कि हालात इतने ज्यादा गतिशील हो जाते हैं कि प्रतिक्रियाएँ कहीं पीछे छूटती चली जाती हैं। जैसे बैग में एक किताब रखी हुई हो जिसके पहले कुछ पन्ने तो पढ़ लिए हो पर हर सफर में साथ होने पर भी उसको पूरा न पढ़ पाए। 

पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ कुछ ऐसा ही हो रहा था। आधी-आधी पढ़ी किताबों की गिनती बढ़ती जा रही थी। और मैं मानों एक ऐसे समय का इंतज़ार कर रही थी जब मैं सिर्फ और सिर्फ पढ़ सकूँ। पर समय की बेरहमी से मैं क्या सभी लोग अच्छे से वाकिफ हैं। 

बड़े दिनों के बाद खुद से जिद करके सोचा… चलो आज एक किताब पूरी की जाए। 

मेट्रो आने में अभी चार  मिनट थे। महीनों, दिनों, घंटों की रफ़्तार से कटती जिंदगी में मिनटों का पता सिर्फ इंतज़ार में ही चलता है। और मेट्रो के मिनटों के इंतज़ार में भीड़ की तदाद भी दुगनी रफ़्तार से बढ़ती जाती है। मैं कतार में पाँचवे या छठे नंबर पर थी। तभी एक मेट्रो कर्मी, एक व्यक्ति का हाथ थामे उसे लेडीज डिब्बे की तरफ ले आया। आँखों की रौशनी से महरूम था वो। रुकते ही उसने पूछा कितनी देर है मेट्रो आने में? मेट्रो कर्मी ने २ मिनट का समय बताया। 

गाड़ी की आवाज़ सुन के उसने साथ आये आए व्यक्ति से गाड़ी का नंबर पूछा। मेट्रो कर्मी ने  बताया ७६४४। मेट्रो रुकने पर मेट्रो कर्मी उसे हाथ पकड़ कर अंदर ले आया। सीट पर बैठी लड़की ने उसे देख कर सीट दे दी। वो पहले मना करते हुए अंतत उसे धन्यवाद करता हुआ बैठ गया। मेरी नज़र सीट के ऊपर लगे एक इश्तहार के बोर्ड पर पड़ी। आसान कर्ज़े के जरिए अपनों के लिए खुशियाँ बांटने का सन्देश दे रहा था वो किसी बैंक का इश्तहार। पर यह देख कर मुझे लगा कि खुशियां बांटने का दायरा सिर्फ अपनों तक ही सीमित नहीं है। 

अभी मेट्रो चली नहीं थी। एक २८ -२९ साल का आदमी और एक उसी की उम्र की महिला का हाथ पकड़े अंदर आया। औरत की तबीयत ठीक नहीं थी इसीलिए उस आदमी को उसके साथ अंदर आने दिए गया। उस  औरत की शक्ल पे ही दर्द झलक रहा था और आँखों में दबाया हुआ कोई जख़्म। उसने किसी से सीट नहीं मांगी पर एक लड़की ने उसका जर्द सा चेहरा देख कर खुद ही सीट दे दी । उसके साथ आया आदमी उसका हाथ छोड़ कर चुपचाप साथ लिए हुए बड़े से लिफाफे को सँभालते हुए कोने में खड़ा हो गया । पर उसको अभी सहारे की जरूरत थी। मैंने खड़े खड़े अपना हाथ बढ़ाया जिसकी मदद से वो बैठ गई। उसका साथी उस अंधे  व्यक्ति के पास वाले कोने में वही बड़ा सा लिफाफा समेटते हुए खड़ा था (और वो उस व्यक्ति के साथ वाली सीट पर बैठी थी।) 

तभी अंधे व्यक्ति ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला।  मुझे लगा या  तो उसकी उँगलियों को मोबाइल नंबर और मोबाइल पर नंबरों की स्तिथी  बाखूबी पता थी या फिर उसने स्पीड डायल में कुछ नंबर डाल रखे थे। संभावनाएं दोनों ही झुठलाई नहीं जा सकती थी। खैर उसने फ़ोन के दूसरी तरफ वाले से बात करनी शुरू की। 

"हाँ। "

"हम बैठ गए हैं मेट्रो में।"

"मेट्रो का नंबर ७६४४ है। " 

बड़ी हैरानी हुई सुन कर।  क्या कोई मेट्रो का नंबर भी किसी को बताता है? मैंने आज तक भूले भटके शुरू में एक दो बार कभी मेट्रो का नंबर देखा होगा। पर हो सकता है कुछ लोग ऐसे ही चलना पसंद करते हो। पूरे चौक्कने रह कर। मैं लापरवाही बरतने की समर्थक नहीं हूँ। पर यह मेरे लिए कुछ ज्यादा था। 

क्या वो आँखों की रौशनी से महरूम था इसलिए इतनी एहतियात का प्रयोग कर रहा था या फिर आदतन? 

खैर! बातचीत अभी जारी थी। 

"हम बता रहे हैं कि हमारा फ़ोन नंबर तो तुम्हे पता ही है, मेट्रो नंबर भी याद कर लो।  ७६४४। अब तुम बोलो।"

उसने शायद सोचा हुआ था कि आज दूसरी तरफ वाले को मेट्रो का नंबर याद करवा के ही दम  लेगा। 

"हम इसलिए बता रहे हैं कि दिल्ली में हाई अलर्ट लगा हुआ है।"

"हाँ भई! हाई अलर्ट," उसने दोहराते हुए कहा। "कभी भी कुछ कुछ भी हो सकता है।"

मेरे साथ खड़ी लड़की ने फ़ोन की बात सुन कर मेरी तरफ देख कर बोला, "क्या सच में?"

मुझे यकायक लगने लगा कि मैं गृह मंत्रालय की कोई उच्चस्थ पदाधिकारी हूँ। मैंने मुस्कुराते हुए नहीं में सिर भी वैसे ही हिलाया। और मंत्रालय का आश्वसन मिलने पर संतुष्ट लड़की वापिस अपने फ़ोन की  दुनिया में गुम हो गई। 

"तो अगर ऐसे में अगर मुझे कुछ हो तुम्हे पता तो होना चाहिए।" उसने अपनी बात पूरी करते हुए बोला। 

लगा इस व्यक्ति को जिंदगी से प्यार ज्यादा है या उसे खोने का डर? 

पर इतना डरते डरते जीने में क्या हम जिंदगी के कुछ खूबसूरत तजुर्बों से मुंह नहीं मोड़ लेते?

इतने में उस औरत के साथ वाली सीट खाली हो गई। मैं उसके पास बैठ गई। उसके बड़े से लिफाफे से एक्सरे झाँक रहे थे। उसके साथ हुए हादसे का अंदाजा हो रहा था मुझे। मैं उसके जख्म हरे नहीं करना चाहती थी। पर उसकी आँखों में इसरार था। सवाल करने का।

मैंने पूछा, "कहाँ से आ रही हो?"

उसने कहा, "अस्पताल से।" और उसकी आँखे भीग गई। 

मैंने बस हल्के से उसके हाथ पे हाथ रखा, हौंसला देने को। उसका रुका हुआ कुछ कुछ आंसू बन के बाहर आ गया।  

वो पति पत्नी अपने पहले बच्चे को दुनिया में आने से पहले ही खो कर आ रहे थे। पति बस खड़े खड़े अपने होंठ काटे जा रहा था। पत्नी आंसुओं को कभी रोकने की कोशिश करती और कभी अपनी ही कोशिशों से हारती चेहरे को तर करती रहती।  

कुछ जख्म सांत्वना नहीं चाहते। बस टीस की तरह रह रह के उठते हैं और वक़्त की मरहम से ही ठीक होते हैं। यह जख्म तो हरे थे…

लगा हरेक के लिए उसकी जिंदगी की अहमियत, उसका नज़रिया कितना अलग है। कोई अपनी जिंदगी को ले कर इतना डरा रहता है कि हर सफर से पहले तमाम एहतियातों के साथ चलता है तो कोई अपनी जिंदगी दे कर भी एक खोई जिंदगी लौटाने की फरियाद करता है।

पर जिंदगी अपने खुद के फलसफों में ही यकीं रखती है। 

ना चाहते भी मेरा स्टॉप पहले आ गया। पहले से थोड़ा संभल चुकी उस औरत को मैं बस ब्लेस यू ही कह पाई और उतरते हुए दुआ की कि जल्द ही उसको वो खुशियाँ मिले जो इस बार उसकी झोली में आते आते रह गई। 

प्लेटफॉर्म पर बड़ा शोर था।  एक पल के लिए लगा कि मेरे दिमाग का शोर क्या इतना तेज हो कि वो बाहर भी सुनने लगा है। 

पर नहीं। गाड़ी से उतर कर एक व्यक्ति शोभा का नाम ले कर पूरे प्लेटफॉर्म पर चक्कर लगा रहा था। दरवाज़ा बंद होते होते किसी ने कहा वो लक्ष्मी नगर उतर गई है शायद। यह एक ३५-४० बरस के एक पिता जी थे जिन्होंने अपनी ८-१० साल की लड़की को लेडीज डिब्बे में चढ़ा दिया था और अब वो कहाँ थी पता नहीं। सबने उन्हें नीचे कंट्रोल रूम में जा कर सभी मेट्रो में अनाउंसमेंट करने की सलाह दी। 

जिंदगी के प्रति लापरवाही की इस इंतहा ने तो मुझे बस चुप करवा दिया। सोचा कोई इतने छोटे से बच्चे को ले कर इतना लापरवाह कैसे हो है?

बाहर बढ़ रहे अँधेरे और घर से लगातार आने वाले फोनों के कारण देर तक रुकना संभव नहीं था। स्टेशन से उतरते-उतरते आसमानों में रहने वाली सी ताकत से कुछ मांगने का मन किया। थोड़ी नादानी, थोड़ा संयम, थोड़ा ठहराव, थोड़ा हौंसला... जिसको भी जिस जिस की जरूरत हो और मुस्कुराहटें… सबके लिए, ताकि सबका सफर, कितना भी छोटा या बड़ा क्यों ना हो, यादगार बन जाये।

© उपमा डागा पार्थ २०१५

रविवार, 2 नवंबर 2014

थैंक यू

खुद की गुलामी करते करते जब कोई उकता जाए तो उसे कभी कभी अपने आप को मौसम के हवाले कर देना चाहिए। अच्छा लगता है मौसम में ख़ुशी की सोंधी सी महक का एहसास करके जो बस जिंदगी के खुशगवार रंग की तस्वीर आँखों के आगे कर देती है।

पिछले एक हफ्ते से मैं रोज इस महक को महसूस कर रही थी। सड़कें, बस स्टॉप यहाँ तक कि मेट्रो भी ऐसा लगता था कि मानों सारे शहर ने कूरियर वालों के यहाँ नौकरी कर ली हो और मेट्रो पब्लिक ट्रांसपोर्ट न बन कर कूरियर कंपनी की गाड़ी हो।

उपहारों से भरे, लदे फदे लोग। हाँ गिनती सब के हाथ में अलग अलग होती थी।

जिनके हाथ में कोई डिब्बा नहीं होता वो लदे फदे लोगों को गाड़ी में जगह देने में पूरी दरियादिली दिखाते। मानों कह रहे हो, देखो आज हमारी बारी नहीं थी पर कल अगर हमारे हाथ में कुछ हो तो हमारी भी इतने ही प्यार से मदद करना।

मैं रोज त्यौहारों की चमक वाले चेहरों की रौनक बटोर कर ऑफिस और घर के कामों में ताल मेल बिठा रही थी। और वो एक अदद दिवाली की छुट्टी कब आ के कब चली गई पता भी नहीं चला।

खैर! अच्छा या बुरा दौर अपनी रफ़्तार कम नहीं करता। फर्क सिर्फ इतना है कि अच्छे दौर के रुकने का हम इसरार करते हैं और बुरे दौर के गुजरने का इंतज़ार।

तो जिंदगी खास से आम बनने के लिए लगातार आवाज़ दे रही थी और जिंदगी को आप दूसरी आवाज़ लगाने की जिद तो कर सकते हैं, पर उसको अनसुना नहीं कर सकते। तो आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी आवाज़ पे एक बार फिर दौड़ने को तैयार थे सब। वो अलग बात है की मेरा रोल नंबर पहला था। जी! मेरी ड्यूटी इतवार से शुरू हो रही थी।

खुद को घसीटने में थोड़ी देर हुई तो भागते हुए सोचा कि घड़ी इतनी तेज़ कैसे चल सकती है। यह बात ज्यादा महसूस तब हुई जब प्लेटफार्म पर पैर रखते ही मेट्रो ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए। पैर पटक कर खुद को चोट पहुँचाने से अच्छा मैंने इंतज़ार करना समझा।

पूरे ६ मिनट बाद आई मेट्रो। और इस ६ मिनट में मैंने १६ बार तो घड़ी देखी ही होगी, यह जानते हुए भी कि बार बार देखने पर भी घड़ी की सुई तेज नहीं चलेगी। भीड़ थी मेट्रो में तो बैठने की जगह नहीं मिली। कोने में खड़ी परेशान होते होते मुझे लगा अब  मेट्रो से पहले तो पहुँचने से रही। तो खुद को थोड़ा शांत करते हुए एक ठंडी सांस छोड़ी और डिब्बे में नज़र दौड़ाई।

डिब्बे में कुछ खास बदलाव नहीं था। "मैं और मेरा फ़ोन" का इश्तहार बनी लड़कियां नज़र आई चारों तरफ। इक्का-दुक्का पढ़ने वाली लड़कियाँ। इन्हें देख कर मुझे बड़ी ख़ुशी होती थी। यह मुझे किताबों के जिन्दा होने का एहसास करवाती है।

पर इस भीड़ में वो सबसे अलग थी। बहुत ख़ूबसूरत नहीं — साधारण से चेहरे वाली। पर एक अजीब सी चुप्पी थी उसके चेहरे पे। त्यौहारों की रौनक के बाद ऐसी मायूसी। थोड़ी ही देर में उसकी आँखों से आंसू भी टपकने लगे। वो भी कोई खास कोशिश नहीं कर रही थी उनको रोकने की। बस बीच-बीच में उसके हाथ आँखों पे जाते और वो आंसू साफ़ कर लेती।

मैं उसके पास जा कर उसकी मुश्किलें बढ़ाना नहीं चाहती थी। क्योंकि जो कुछ भी दबा-दबा था सब बाहर आ रहा था। शायद उसे वक़्त चाहिए था। एक सफर तक का वक़्त।

अचानक उसके फोन की घंटी बजी। उसने पहले अपने आंसू पोंछे, फिर खुद पे पूरी तरह काबू पा कर फ़ोन उठाया। बात करते करते आँखों पे रह गई नमी भी सूखने लगी।

फ़ोन पे दूसरी तरफ से शब्दों का मरहम लगा कि नहीं पता नहीं पर अब उसमे एक जिद नज़र आ रही थी — खुद से लड़ने की। पानी की कुछ बूंदे कई बार मिटटी को इतना मजबूत कर देती हैं कि वहाँ कीचड़ नहीं होता बल्कि एक बुनियाद बन जाती है।

मुझे अचानक मेट्रो स्टेशन के एस्कलेटर के पास मिली आंटी की याद आई। ७०-७५ साल उम्र रही होगी आंटी की। एस्कलेटर पर चढ़ने से हिचक रही थी। मैंने उनके पीछे खड़े होकर उनका इंतज़ार किया फिर कहा लाइए मैं आपको ले चलू आंटी। आंटी ने मुड़ कर मेरी तरफ देखा और बोला, "थैंक यू बेटा। पर अगर इस बार तुम मेरा हाथ पकड़ कर ले गई तो मैं हर बार चढ़ने से पहले तुम्हे कहाँ से ढूंढूगी।" मैं हैरान, या कहूँ तो नतमस्तक थी उनके इस ज़ज्बे को देख कर।

वो फिर बोली, "तुम बस मुझे यह बताओ कैसे और क्या करना है।" मैंने उनको पहले रेलिंग पकड़ने, फिर पैर रखने से ले कर सब कुछ बता दिया और उनके जाने का इंतज़ार किया। उनके चढ़ने के बाद मैं भी चल दी। प्लेटफार्म पर पहुँच कर उन्होंने फिर से मेरा धन्यवाद किया और कहा अब अगली बार मुझे चढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

आज एक बार फिर लगा कितनी सही थी वो। एक बार अगर हम अपनी कमजोरी पे काबू पाने की कोशिश करे तो वो कमजोरी अगली बार हम पर उतनी या फिर बिलकुल भी हावी नहीं हो पायेगी। और यह करने के लिए किसी के बढ़े हुए हाथ की नहीं, बल्कि आपने खुद का हाथ बढ़ाने की जरूरत होती है।

वो मेरे साथ ही राजीव चौक उतरी। मैं अभी भी चोर आँखों से उसे देख थी। पर उसने शायद डिब्बे में ही मेरी चोरी पकड़ ली थी। हम कुछ कदम साथ चले उतने में उसने एक फीकी सी मुस्कान मेरी तरफ़ डाली। और बड़े अपनेपन से मुझे यह जताया कि अब वो ठीक है। एक मूक सी तसल्ली थी… पर  काफी थी… दोनों के लिए शायद।

पटेल चौक की तरफ बढ़ते हुए अपनी लिखी कुछ पंक्तियाँ यूं ही याद आ गई।

माना कि आसां नहीं है इम्तिहाने-जिंदगी,
मेरे हौसलों की इबारत भी मगर,
हर मसले का हल रखती है…

© उपमा डागा पार्थ २०१४

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

मेरी बेल्ट

मेट्रो लाइफ में कितनी भाग दौड़ है, यह पता तो था पर रफ़्तार कभी-कभी इतनी तकलीफ़देह भी हो सकती है इसका पता आजकल चल रहा है। कहीं निकलती हूँ तो लगता है जैसे जंग पर जा रही हूँ। फौज़ी जैसे बुलेट-प्रूफ जैकेट पहन कर निकलते हैं वैसी ही कुछ तैयारी मेरी भी होती है। एक चौड़ी बेल्ट, जिसको पहन के ऐसा लगता है कि सांस बड़े एहसान के साथ आ रही है। और साथ में अमेरजेंसी किट की तरह एक हीट पैड।

खैर इन सब से सुसज्जित जब मैं मेट्रो में चढ़ी तो मेरी अच्छी किस्मत कि मुझे बैठने की जगह मिल गई। मेट्रो में जगह मिलना मानों दुखती रग पर मलहम। शायद इस समय इससे अच्छा उदाहरण मुझे सूझ भी नहीं पाएगा।

सीट पर बैठते ही मेरी नज़र सामने बैठी एक लड़की पर पड़ी। गोरा रंग, सामान्य कद और तीखे नयन नक्श, पर उस के सारे शरीर पर, चेहरे, बाजूओं पर काले निशान थे। तिल नहीं थे पर कुछ निशान थे जो उस के पीछे के खूबसूरत से चेहरे को छुपा रहे थे। तभी मेरा ध्यान उसके साथ बैठी लड़की पर पड़ा, जिस का रंग उस से सांवला था पर बाकी सब कुछ उससे मिलता था। दोनों बहनें थी शायद और निशान दोनों के चेहरे पर थे। हाँ, उनके पैरों पर वो निशान नहीं थे। और उन्होंने अपने शरीर के उस हिस्से को बहुत अच्छे से सजा रखा था। सुन्दर सी नेल पॉलिश और खूबसूरत सी जूती उनको और दिलक़श बना रही थी। पर उनको इस बात का इल्म था कि शायद ही किसी की नज़रें उनके चेहरे को छोड़ पैरों तक जाएगी। ईश्वर की इस 'नाइंसाफी' पर वो उस से तो नराज़ थी ही खुद से भी ख़फ़ा थी। और दुनिया से छुपने की भी कोशिश कर रही थी।

कमाल की बात यह थी कि पूरे सफ़र के दौरान दोनों ने आपस में कोई बात नहीं की। बस अजनबी की तरह बिना एक दूसरे को देखे, पूरे डिब्बे में निगाहें घुमा रही थी। मानों देख रहीं हो कि कौन-कौन उनकी तरफ़ या कहूँ उनके निशानों की तरफ घूर रहा है। दोनों बहुत ही असहज हो रही थी। खुद से ज्यादा लोगों के बारे में सोच कर परेशान थी वो। मुझे लगा मैंने कुछ देर और उनकी तरफ देखा तो उन्हें लगेगा कि मैं भी उन्हें घूर रही हूँ या उन पर हंस रही हूँ।

पर तभी मैंने देखा कि उनके साथ बैठी एक लड़की उनको नहीं मुझे घूर रही है। पर मुझ में क्या असमान्य बात नज़र आ रही थी उसको, जो वो इतनी गहरी नज़र से देख रही थी? तभी मेरा हाथ मेरी बेल्ट पर गया। ओह! तो उस की नज़र में यह था मेरा विकार। हंसी आई यह सोच कर कि उसके दिमाग के घोड़े पता नहीं कहाँ-कहाँ दौड़ रहे होंगे। सोच रही होगी कितनी छोटी सी उम्र है। पता नहीं कितनी गम्भीर चोट होगी। और भी बहुत कुछ, जहाँ तक उसकी सोच उसको ले जा सकती होगी। 

मुझे तभी अपनी बेटी की कही बात याद आ गई। घर से निकलते समय उसने कहा था, "मम्मा, बेल्ट को सूट के ऊपर नहीं अंदर लगाओ।" उस समय कारण समझ में नहीं आया था। शायद वो बेल्ट मुझे सामान्य से असमान्य बना रही थी। और असमान्य लोगों या चीज़ों को लोगों की बहुत अलग-अलग प्रतिक्रियायें झेलनी पड़ती हैं।

ख़ैर मैंने उस आतुर लड़की से नज़रें नहीं चुराई। एक मुस्कराहट के साथ उसकी तरफ देखा, पर वो मेरी मुस्कराहट भी नहीं झेल पाई और उसने नज़रें घुमा ली। उसके पास मुझसे पूछने के लिए सवाल भी नहीं थे जबकि मेरे पास सब जवाब थे। उसके पास सिर्फ संवेदना थी जो वो देना चाहती थी पर मैं लेना नहीं।

क्या अगर किसी को कोई शारीरिक विकार या असमान्यता है तो उसको समान्य व्यवहार करने का हक़ नहीं है? क्या जरूरी है हर समय उस असमान्यता को ओढ़े रखना? मुस्कुराहट जैसी छोटी ख़ुशी से भी खुद को महरूम करना?
क्यों हम ऐसी कमियों को छुपाने की कोशिश करते हैं जिनके होने में या जिनके ठीक होने में हमारा कोई हाथ नहीं होता? या फिर जिस असमान्यता को हम छुपा नहीं पाते तो उनको ले कर हम लोगों से नज़रें चुराने लगते हैं?

एक असमान्यता या विकार या कमी या जो भी नाम देना चाहें, एक इंसान को दूसरे से अलग नहीं करती। और ना ही उसकी बाकी खूबियों को कम कर देती है। 

किन्ही कारणों से कुछ काम प्रतिबंधित हो सकते हैं या उनको करने का तरीका दूसरों से अलग हो सकता है पर यह सब चीज़ें क्या इतनी सक्षम हैं कि हमारी विचार धारा, जीवन धारा ही बदल दें? आप कुछ समय के लिए कमजोर पड़ सकते हो, खुद से रूठ सकते हो पर जीने की हिम्मत नहीं छोड़ सकते। 

मेरी मुस्कुराहट की प्रतिक्रिया बता रही थी सकारात्मक मनोवृति (सोच) बनाए रखना बहुत मुश्किल नहीं है। जब लोगों को आत्मविश्वास दिखता है तो संवेदना की जगह आँखों में प्रशंसा झलकने लगती है।
 
वो दोनों लड़कियां मेरे गंतव्य से एक स्टॉप पहले उतर गई, आपस में उसी अजनबियत के साथ।

मैं उन दोनों के लिए कुछ ख़ास कर नहीं पाई। पर उनको मेरी नहीं खुद की ज्यादा जरूरत थी और यह बात समझने में उनको शायद समय लगेगा।

प्रीत विहार आ गया था। मैं धीरे-धीरे सीढियां उतर कर नीचे आई तो देखा लिफ्ट से २०-२२ साल का एक लड़का धीमे क़दमों से बाहर आ रहा था। समान्य चाल नहीं थी उसकी। पैर थोड़े टेढ़े थे, पर वो एक छड़ी के सहारे धीरे-धीरे चल रहा था। 

और मुझे ख़ुशी इस बात की थी कि उस का ध्यान लोगों की तरफ नहीं था। वो आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराहट ओढ़े, अपनी सुविधा के अनुसार आगे बढ़ रहा था। और उसका दमकता चेहरा संवेदना की किसी आहट का मोहताज़ नहीं था।

© उपमा डागा पार्थ २०१४

बुधवार, 15 जनवरी 2014

न्यू इयर रेज़ोल्यूशन

कई बार साल इतनी तेजी से गुजरते हैं मानों किसी मैराथन में भाग ले रहे हों और उन्होंने रेस का पहला पुरस्कार लेने की बस ठान ली हो। ऐसा ही कुछ था पिछला साल। इस रफ़्तार से बीता कि पता ही नहीं चला। और अगला साल कब चुपचाप, बिना दस्तक दिए, इस अलसाई सी धूप में आ कर बैठ गया इसका गुमाँ ही नहीं हुआ।

हर नए साल की तरह इस बार भी परिचित वही एक दो सवाल दोहरा रहे थे – क्या उम्मीदें हैं नए साल से? क्या नया प्रण लिया है या क्या बदलाव लाओगे खुद में। और लग रहा था आज कल इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढ़ने में ही सफ़र कट रहा है।

कुछ सोचते हुए मेट्रो में चढ़ती हूँ, कभी वहाँ गुम हो जाती हूँ, कभी जवाबों की जगह कुछ और सवाल साथ ले आती हूँ, कभी आदतन मुस्कुरा देती हूँ तो कभी परिस्तिथीवश माथे पर शिकन आ जाती है।

इन्हीं सब से दो चार होते हुए एक दिन मेट्रो में चढ़ी तो एक खाली सीट को अपना इंतज़ार करते पाया। यकीं मानिए ऐसा नज़ारा विरले ही कभी देखने को मिलता है। तो मैं किस्मत की इस देन को सर आँखों पे लेते हुए उस सीट पर जा बैठी। मेरे साथ एक औरत अपनी बच्ची को गोद में उठाए बैठी थी। नेट वाली आधुनिक साड़ी, उसके उपर स्वेटर नुमा कोट पहने। बालों में पिन इतने ज्यादा लगा रखे थे मानों तेज़ हवा के झोकों को चुनौती देने चली हो कि मेरे बालों को हिला के तो दिखाओ। कुछ यही हाल उनकी साड़ी का भी था। बड़ा बेतरतीब सा मेकअप था यानि पता चल रहा था कि मुंह पर बहुत कुछ लगा रखा है। अब यह 'बहुत कुछ ' 'क्या कुछ ' था तो न तो मेरी नज़र इतनी तेज थी न ही अक्ल। बच्ची को भी अपने ढंग से सजा रखा था। वो बच्ची छटपटा रही थी। अब वो गोद से उतरने के लिए थी या किसी और वज़ह से, यह नहीं पता। खैर मैंने बच्ची का ध्यान दूसरी तरफ करने के लिए उससे बातें शुरू की। एक साल से कम उम्र की थी वो बच्ची और वो शब्दों की न सही आँखों की जुबा बाखूबी समझती थी। 

उस औरत के कपड़ों में से घुटन की गंध आ रही थी। संदूक के अंदर रहने की घुटन, महीनों बंद रहने की घुटन। अब यह गंध सिर्फ मुझे ही आ रही थी या बाकियों को भी, पता नहीं। क्योंकि बाकी सब बिना प्रतिक्रिया के बैठे हुए थे। मेरी प्रतिक्रिया भी इतनी स्पष्ट नहीं थी कि उसको कुछ समझा पाती पर मुझे बहुत बैचनी हो रही थी। वो सजी धजी औरत अपने गंतव्य पर उतर गई। बच्ची की बैचेनी फिर शुरू हो गई और मेरी ख़त्म। पर उसको इस घुटन का अंदाज़ा नहीं था या फिर वो गंध उसमें इतनी रच बस गई थी कि वो उसे अजनबी नहीं लग रही थी।

उस सधारण से भी कुछ ज्यादा दिखने वाली महिला ने मुझे सोच में डाल दिया। कपड़ों की घुटन तो बिना प्रतिक्रिया के फिर भी सही जा सकती है पर विचारों की...

उस प्रकरण के बाद मेट्रो में चढ़ने उतरने का क्रम कुछ दिन थम सा गया था या यूं कहिए एक अल्पविराम था। दौड़ती भागती जिंदगी दोबारा ट्रैक पर थी और मैं दोबारा मेट्रो में। किसी छुट्टी का दिन था। कामकाजी श्रेणी मेट्रो से नदारद थी आज और उसकी जगह नाते रिश्तेदारों से मिलने वालों की ही भीड़ ज्यादा दिख रही थी। यह मैंने बच्चों और बड़े बड़े बैग के साथ सफ़र कर रही महिलाओं को देख कर अंदाज़ा लगाया। और इस भीड़ की वज़ह से मेट्रो खाली होते हुए भी उसमें बैठने की जगह नहीं थी। मैं खड़े खड़े उन हँसते मुस्कुराते चेहरों की तरफ देख रही थी जो बदलाव से खुश थे। रोजमर्रा की जिंदगी के बदलाव से, किसी और से मिलने का बदलाव।

दो-तीन साल की एक बच्ची ने साथ बैठी महिला के हाथों की तरफ देख कर अपनी मम्मी को बोला, "मम्मी! मेहँदी"। मम्मी  मुस्कुरा दी और वो आंटी भी। फिर उसके पैरों की तरफ देख कर बोली, "मम्मी! नेलपॉलिश"। दोनों औरतें फिर मुस्कुराई। वो फिर आँखों की तरफ देख कर बोली, "मम्मी! लाइनर"। वो महिला जिसकी शान में उस बच्ची ने कसीदे पढ़े थे, उठते हुए बोली, "बड़ी स्वीट है", और बाय कहते हुए उतर गई। अब उस बच्ची के सामने एक नया चेहरा था। मैंने उसकी मम्मी को बोला, "बहुत ध्यान से सब देखती है।" तो वो हँसते हुए बोली, "मेकअप का बहुत शौंक है इसको।" मैं मुस्कुरा दी। उसका ध्यान अब पूरा मुझ पर था। मैंने हँसते हुए कहा, "बेटा, यहाँ तुम शौंक पूरा नहीं कर पाओगी। कुछ नहीं मिलेगा यहाँ तुम्हारे मतलब का।" इतने में वो चिल्ला के बोली, "मम्मी! लिपस्टिक।" 

हम दोनों हस पड़े। मैंने यह वाकई सोचा नहीं था। उसकी मम्मी ने हँसते हुए कहा, "आप इसकी नज़रों से बच नहीं सकते।" मैं मुस्कुरा दी और वो चली गई। अब एक सरदार बच्चा मेरे पास सरक गया। उसकी मम्मी और भाई भी थे साथ में। अपने  बच्चों, खास कर उस छोटे बेटे को व्यस्त रखने के लिए उसकी मम्मी बार-बार अपने स्मार्ट फोन पर एक गाना चलाती, वो छोटा सा सरदार उठता और पैर हल्के से चलाने लगता पर पूरी तरह नाच नहीं रहा था। उसकी मम्मी ने मेरी तरफ देख कर कहा कि घर पे तो अब तक खूब तेज डांस शुरू हो जाता है। मैंने प्यार से मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा।

अचानक मुझे कुछ भूख सी लगी तो याद आया कि मेरे पर्स में एक चुइंगम पड़ी है तो निकाल कर मुँह में डाली और थोड़ी देर बाद इधर उधर देखते हुए गुब्बारा फुला दिया। यह करना था कि छोटे सरदार जी मेरे पास आ कर बैठ  गए। गाना वाना छोड़ कर लगातार मेरे मुँह की तरफ देखने लगे। मैंने उसके लिए फिर से गुब्बारा फुलाया। उसने खुश हो कर अपने भाई और मम्मी की तरफ देखा फिर दोबारा मेरी तरफ कि फिर फुलाओ। अब मैं फरमाईश पर गुब्बारे फुला रही थी। दो तीन बार ऐसा करने पर मैंने कहा अब बस। फिर वो अपनी मम्मी की तरफ घूम कर उनके मुँह की तरफ देखने लगा। उसकी मम्मी ने हँसते हुए कहा मेरे पास नहीं है। मैंने कहा, "अब  स्टेशन पर उतरते ही सबसे पहला यही काम करना," और मैंने हँसते हुए उनसे विदा ले ली।

मेट्रो की सीढियाँ उतरते हुए सोच रही थी बदलाव सबको दीखता है और अच्छा भी लगता है, पर उस बदलाव के लिए या यूं कहिए कि बदलाव दिखाने के लिए खुद को बदलना क्या तर्कसंगत है? यही सोचते हुए मैं अपने काम की तरफ बढ़ गई। 

वापसी में ठण्ड के मीठे से एहसास को खुद में समेटे हुए अपने  ठंडे से हाथों को रगड़ कर गरम करने की कोशिश कर रही थी। मैंने अपने बचपन को याद करते हुए मुँह से दो तीन बार हवा निकाली पर वो मुँह से छल्ले बन के निकलते थे वो नहीं निकल पाये। थोड़ी सी उदासी हुई कि अभी भी उतनी ठण्ड नहीं आई जितनी बचपन में हुआ करती थी। बचपन वाली उस ठण्ड में मम्मी पूरी बांह वाले स्वेटर के साथ एक आधी बाजू वाला स्वेटर तो पहनाती ही थी कभी-कभी दो के ऊपर एक और भी पहना दिया जाता था। स्कार्फ़ और जुराबें तो होती ही थी। दस्ताने मेरे लिए बहुत जरूरी नहीं थे क्योंकि मेरे हाथ उनमें भी ठन्डे ही रहते थे। ख़ैर! मेरे बचपन वाली ठण्ड ज्यादा ठंडी थी यह तय था इसलिए सर्दी होते हुए भी कम लग रही थी। 

मेट्रो आने पर लगा आज तो जगह मिल ही जाएगी और आज अपने पूर्वानुमान में मैं गलत  नहीं थी। बैठ कर नज़र दौड़ाई तो ज्यादातर लड़कियाँ और औरतें अपने मोबाइल फ़ोन पर व्यस्त थी। एक बड़ी-बड़ी और बोलती आँखों वाली लड़की मेरे सामने बैठी थी। उसकी मम्मी कुछ अपनी ही सोचों में ग़ुम थी। बच्ची ने हाथ में एक लिफ़ाफ़ा पकड़ रखा था और जिस अधिकार से उसने वो लिफाफा पकड़ रखा था और जिस तरह वो बार-बार उसे देख रही थी यह निश्चित था कि उसमें उसका ही सामान था। तो उस शांत सी लड़की ने, अपनी मम्मी को तंग न करते हुए, डिब्बे में एक नज़र दौड़ाई। कोई उसकी तरफ देख नहीं रहा था और सब अपनी वर्चुअल दुनिया में व्यस्त थे। उसने अपने पास बैठी महिला के मोबाइल पर नज़र डाली उसने एयरफोन लगाए हुए थे अब वो गाने सुन रही थी या कुछ और कर रही थी पता नहीं, पर बच्ची को उसकी काल्पनिक दुनिया में मज़ा नहीं आया और वो वापिस इधर उधर देखने लगी। 

उसने वापिस डिब्बे में नज़र दौड़ाई। मेरी तरफ वाली सीट पर बैठी दो लड़कियाँ किसी बात पर हंस रही थी। अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से इस बड़ी सी दुनिया को निहारती वो बच्ची उनको हँसते देख कर मुस्कुराई मानों कह रही हो कोई तो है यहाँ पर जो वर्चुअल में नहीं वास्तविकता में जीता है।

यमुना बैंक से भीड़ का एक रेल चढ़ा। चित्रकार को अचानक एक बड़ा सा कैनवास दे दिया जाता है पेंट करने को और वो सोच में हो कि वो कहाँ से शुरू करे। कुछ ऐसी ही हालत उस लड़की की भी थी। वो जैसे चेहरे को पढ़ना चाहती थी, हर हंसी के साथ मुस्कुराना चाहती थी।

दोनों माँ बेटी एक दूसरे की तरफ ना देखते हुए भी एक ही दिशा में देख रही थी। तो बच्ची में जो ठहराव सा दिख रहा था वो माँ की वज़ह से था। दोनों की निगाहें जब टकराती तो जैसे दो गंभीर लोग एक दूसरे को देख कर मुस्कुराते हैं वहीँ भाव उनके चेहरे पर भी  आते थे। 

मैं उस बच्ची से  प्रभावित हो कर उसकी तरफ देख रही थी। अचानक मुझे लगा कि मेरा अक्स थोडा छोटा हो कर, कद और उम्र में, मेरे सामने बैठा है। और बिन कही कहानियाँ बीनने की कोशिश कर रहा हो। 

अच्छा लगा देख कर कोई तो है जो इस दुनिया को, उसके हर रंग को, उसके लोगों को देखना समझना चाहता है। अब इस चाहत का नतीज़ा जो चाहे निकले। 

हम लोग साथ ही साथ बाहर निकले तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछा, "इसमें आपका सामान है।" उसने मुस्कुरा कर हाँ कहा। बात करते हुए उस शांत सी दिखने वाली लड़की में एक चंचलता भी दिखी और कुछ शैतानी भी। तो उस लिफाफे में उसकी रंग बिरंगी नई पंजाबी जूती थी और एक पर्स भी जो बहुत इसरार के बाद भी उसने मुझे नहीं दिखाया। 
उसको बाय कह के निकली तो लगा मेरे सारे सवालों के जवाब हैं मेरे पास।

विचारों की घुटन को भावों की धूप लगाते रहना पड़ेगा और साथ ही दिखावे वाले बदलाव से अच्छा है खुद को, अपनी वास्तविकता को सहेज कर रख लूँ। और जहाँ तक पूरे साल में या आगे क्या कुछ करने का सवाल है तो उसका सीधा सा जवाब यही है कि हमें तो सफ़र करते रहना है, सफ़र में जितनी दास्तानें मिलेंगी वो सुनते जाना है और कही मौका मिला तो अपनी दास्ताँ भी सुनाते जाना है। 

जिंदगी के इन अनसुलझे सवालों का राजदार मैं ही हूँ,
तमाशा है गर यह दुनिया तो तमाशबीन मैं ही हूँ... 

© उपमा डागा पार्थ २०१४

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

बदलता मौसम

Photo by Nick V as published in NixPixMix
मौसम बदल रहा है। गर्मी ने विदाई ले ली है और ठण्ड हौले से दस्तक दे रही है। मौसम लेकिन सब पर एक ही तरह से असर नहीं करता। कुछ लोग मौसम के अनुरूप ढलने में समय नहीं लेते जबकि कुछ लोगों को उसे अपनाने में या उसके साथ चलने में काफी वक़्त लगता है। हर कोई मौसम को अपने पैमाने पर ही आंकता है। 

तो मौसम का मिला जुला असर आजकल मेट्रो में भी देखने को मिल रहा है। कुछ लोग तो आधी बाजू वाली टी-शर्ट में नज़र आते हैं तो कुछ ने स्वेटर के साथ शाल या जैकेट भी पहनी होती है। इन दिनों ना चाहते हुए भी मुझे दूसरे वर्ग का साथ देना पड़ रहा है। तबीयत थोड़ी नासाज़ होने के कारण वैसे तो घर से निकलना ही थोड़ा कम हो रहा है, अगर निकलती भी हूँ तो मेरे 'तीमारदार' बस लिहाफ ओढ़ाने की ही कसर छोड़ते हैं। 

मेरे आस पास रहने वाले मेरे शुभचिंतक मुझे यह एहसास दिलवाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह उम्र के अगले पड़ाव की दस्तक है। 

खैर, हम मौसम की बात कर रहे थे। तो मेट्रो में एक लड़की ने पसीना बहाने वाली गर्मी में पहने जाने वाली एक पतली सी टी-शर्ट और कैप्री पहनी हुई थी। मन में सोचा क्या यह लड़की आज मौसम के साथ बगावत करने के लिए निकली है ?

वो लगातार फ़ोन पे बात कर रही थी। रह-रह कर उसका स्वर तेज हो जाता। बात ऑफिस के माहौल की हो रही थी जिसमें अचानक आया बदलाव उसकी समझ से परे था। एक तरफ़ा बातचीत के कुछ अंशों ने मुझे भी परेशान कर दिया।

"मैं नहीं समझ पा रही कि अचानक सबको मुझसे क्या प्रॉब्लम हो गई है... मेरे ऑफिस पहुँचते ही कामों की लम्बी लिस्ट मुझे पकड़ा दी जाती है। ऑफिस में कहीं भी, कुछ भी गलत होता है तो मेरा ही नाम लिया जाता है।"

"पता नहीं।"

"शायद अनिल सर जब से गए हैं तब से।"

"अरे! अब उन्होंने अगर कुछ किया है तो मैं क्या कर सकती हूँ?"

एक विराम...
एक ठंडी आह...

"चल ठीक है बाद में बात करती हूँ।"

अचानक आये बदलाव को ले कर रोष था, पर उससे ज्यादा झलक रही थी उस रोष को सही जगह पर न जता पाने की असमर्थता और पूरे माहौल की असहजता को न सह पाने की विवशता। शायद उस बदलाव के आगे उसको मौसम के थपेड़े ज्यादा भारी नहीं लग रहे थे। 

माथे पर बल डाले और लगभग पैर झटकते हुए वो अपने गंतव्य पर उतर गई। इन सबसे कोई समाधान मिलना मुझे तो सम्भव नहीं लग रहा था। पर फ़िलहाल वो किसी समाधान की तलाश में नहीं थी शायद। सर्द मौसम में गर्म कॉफ़ी के घूँट की तरह उसे बस किसी ऐसे शख्स की तलाश थी जो सिर्फ उसको सुने।

उसके जाने के बाद डिब्बे में सन्नाटा था यह तो नहीं कहूँगी पर हाँ मैं काफी देर तक उसी के बारे में सोचती रही। तो शायद मेरा ध्यान किसी और चीज़ पर नहीं गया। 

वर्तमान में वापिस आते ही आस पास का माहौल फिर से जीवंत हो उठा। मेरी बगल में बैठी एक मोहतरमा पूरी तरह से अपने फ़ोन में बजने वाले गाने में मगन थी। उनके होंठ तो गुनगुना ही रहे थे, पैर भी उसकी धुन पर थिरक रहे थे। 

बड़ा सकूं मिलता है ऐसे लोगों को देख कर जो हर पल का लुत्फ़ उठाने की कोशिश करते हैं। जिंदगी अगर सिर्फ हसीं पल ही ले कर आए तो हमारे होंठो पे कभी-कभी अचानक आने वाली मुस्कुराहट हमें कभी भी गुदगुदा नहीं पाएगी। 

उस मोहतरमा कि तरफ से नज़रें हटाई तो सामने ४५-५० साल की दो महिलाएं बैठी हुई थी। किसी मुद्दे पर, जो उनके हाव भाव के मुताबिक काफी गम्भीर लग रहा था, दोनों चर्चा कर रही थी। 

बात करते करते उनकी मुख मुद्रा अचानक बड़ी कठोर हो जाती, फिर वो धीरे-धीरे नरम पड़ती पर बात कभी भी मुस्कुराहट तक नहीं पहुँच पाई। उनकी भाव भंगिमा से पता चल रहा था कि उनके घर की परिस्थितियां इस समय उनके अनुकूल नहीं हैं। बीच-बीच में उनकी मुद्राओं की कठोरता का कम होना इस तरफ इशारा दे रहा था कि वो इन समस्याओं से जूझ तो रही हैं पर अभी तक उनका समाधान नहीं मिल पाया है। 

प्रीत विहार आने वाला था, मैं उठ गई। देखा तो वो दोनों औरतें भी उठ गई। उनकी बातों का क्रम खत्म होने को था। और अब हल्की सी मुस्कुराहट होठों के कोने से झाँक रही थी। 

लगा वो अपने सारे दुःख, तकलीफें, समस्याएं छोड़ने के लिए ही मेट्रो में आई थी। एक गुबार जो हमारे -साथ चलता है, उसको अगर निकाल दिया जाए तो आगे नए हादसों, नई परिस्तिथियों को झेलने की शक्ति मिल जाती है। 

कितनी समस्याएं जिंदगी में ऐसी होती हैं जो अपने हल से पहले दिल से बाहर आने का रास्ता ढूंढ़ती हैं। 

यह सही है कि सिर्फ कहने भर से उनसे मुक्ति तो नहीं मिलती पर समाधान मिलने की एक झीनी सी उम्मीद जरूर बंध जाती है और  आगे बढ़ने के लिए वो उम्मीद ही काफी होती है। 

स्टेशन पर उतरते ही ठण्ड के एक झोंके ने मेरा स्वागत किया। पर फिलहाल मैं उस झोंके को अपनी सोच पर हावी नहीं होने देना चाहती थी। मन में यह सवाल उठ रहा था कि क्या आने वाले मौसम की तरह आने वाली समस्याओं का पूर्वानुमान सम्भव है? क्या समस्याओं के अधखुले सिरे उनको और जटिल बना देते हैं? और क्या कई बार सिर्फ गुबार निकालना ही काफी है…।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

सोमवार, 16 सितंबर 2013

मुस्कुराता बचपन

लगभग एक साल पहले की बात है। दिल्ली में राजीव चौक पर खड़े, मैं दौड़ते-भागते लोगों के रेले के बीच में मानों बुत बने खड़ी थी और लोग इतनी तेजी से इधर से उधर चल रहे थे की लग रहा था कि बंद आँखों से भी वे वहां पहुँच जायेंगे जहाँ कि मेट्रो में उन्हें जाना है।

आज लगभग एक साल बीत जाने पर ऐसा लग रहा है कि उस बुत के पैरों में भी वही स्प्रिंग लग गए हैं और बिना अभिव्यक्तियों के वो भी उस रेले के साथ बस बढ़ता ही चला जा रहा है।

बहुत बदलाव आये इस एक साल में। अच्छा बुरा समय। कभी जिन्दगी खींच कर एक रास्ते पर ले जाती, तो कभी मैं उसको उस डगर पर ले जाती जहाँ मैं जाना चाहती थी।

और जो दिखने वाले बदलावों में था वो था मेरा सफ़र, जो कि तिगुनी रफ़्तार से बढ़ गया था। तो अब जितना मेट्रो से सफ़र होता था उतना ही बस से भी और शायद उतना ही पैदल भी। पर अब आम से लोगों की रोजमर्रा की ख़ास कहानियाँ कुछ दूर सी लगने लगी थी। और जब इस बात का एहसास हुआ तो खुद से ही शिकायत की। अपनी थकी हुई सी भावनाओं को झंझोड़ कर फिर से अपने सफ़र की शुरुआत की। बिल्कुल उस बच्चे की तरह जो पहली बार स्कूल जा रहा हो। जितने सच्चे भाव आप एक बच्चे के मुँह पर देख सकते हैं वो किसी वयस्क के चेहरे पर विरले ही देखने को मिलते हैं।

सफ़र की शुरुआत में ही उस निश्छल बचपन से मुलाकात हो गई। सात आठ साल का बच्चा स्कूल यूनिफार्म में। दो-तीन साल बड़ी बहन ने उसका और अपना बैग पकड़ा हुआ था। लड़के के दोनों पैरों में क्ल्चेस लगे थे।

सोचा जिस दिन जिन्दगी आशा का दमन छोड़ देगी तो उस दिन जिन्दगी का क्या हश्र होगा?

एक सलाम किया उस संघर्ष को जो वो बच्चा अपनी जिन्दगी के लिए कर रहा था और उस परिवार को जो उसको मुश्किलों में जीना भी सिखा रहा था, और उनसे लड़ना भी।

हमने जल्दी से मुस्कुराहटों का आदान प्रदान किया और अपने-अपने रास्तों पर बढ़ गए। उसने मेरी आँखों में अपने लिए सम्मान के भाव पढ़ लिए थे शायद और मैंने उसकी आँखों में दृढ़ता के। लगा शुरुआत अच्छी हुई है तो अंत भी अच्छा ही होगा।

अब बारी बस की थी। बस में २०-२२ की लड़की। गोद में एक डेढ़ साल के बच्चे को सँभालने की कोशिश कर रही थी। कभी अपनी साड़ी का गिरता पल्लू संभालती और कभी लुढ़कता हुआ बच्चा। पता चल रहा था कि उस छोटी सी माँ को अभी बहुत कुछ सीखना था। वो बच्चे को कभी गोदी में लिटाती तो कभी कंधे पर। पर बच्चे की बेकरारी कायम थी। धूप खिड़की से छन-छन कर आ रही थी।

गर्मी में उसकी पूरी बाजू की शर्ट भी उसे परेशान कर रही थी। तो मैंने एक अनुभवी माँ होने का सर्टिफिकेट दिखाए बिना उससे कहा, "इसे प्यास लगी है।"

उसने कहा, "अभी आनंद विहार पर ही तो पानी पिलाया था।"

मैंने फिर कहा, "गर्मी में बड़ों की हालत ख़राब हो रही है, यह तो फिर एक बच्चा है।"

फिर मैंने उसके बिना पूछे, सफ़र में जाते समय, खास कर छोटे बच्चे के साथ रखने वाली चीज़ों की एक पूरी लिस्ट बता दी। पहले मैंने उसकी शर्ट की बाजू ऊपर करवाए, फिर एक मिंट वाली टॉफ़ी दी उसे क्योंकि पानी मेरे पास भी नहीं था। इतने में वो बच्चा मेरे साथ खेलने लग गया। पर मेरे लम्बे से सफ़र का एक पड़ाव ख़तम होने को था और लग रहा था कि अभी भी मेट्रो से काफी दूर थी मैं। बरहाल बच्चे ने बड़े प्यार से मुझे हाथ हिला कर बाय बोला मानों कह रहा हो मम्मी को समझाने के लिए धन्यवाद।

मेट्रो स्टेशन पर जाने के लिए एक एस्कलेटर पर चढ़ी तो उसमें तीन-चार बच्चे, एकदम मलंग, पूरी मस्ती में एस्कलेटर से ऊपर तक जाते फिर नीचे उतारते। यह खेल उन्हें बड़ा मजेदार लग रहा था। बिना मेहनत के मजे करते हुए जाओ फिर भाग के नीचे उतरो।

उसका दूसरी साइड वाला एस्कलेटर काम नहीं कर रहा था और बड़ी हैरानी हुई मुझे यह देख कर कि ग्रुप का सबसे बड़ा लड़का एस्कलेटर के नीचे लगे लाल बटन दबा रहा था मानों वो ही चालू करेगा इसको। मुझे लगा चाहे जिन्दगी ने इनको पूरी सुविधाएँ नहीं दी हैं पर ये खुद को किसी का मोहताज़ नहीं समझते। वे अपनी क़ाबलियत का प्रदर्शन करने का मौका जहाँ भी मिलता है कर देते हैं।

आज लग रहा था मानों चारों तरफ बचपन ही बिखरा हुआ है। अलग-अलग रंगों में। मानों हर रंग मुझे कह रहा हो अपने अन्दर के बच्चे को कभी बड़ा मत होने देना, जो तुझे कभी दुनिया का तो कभी तुम्हारा ही अक्स दिखाता है। मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत थी और इन बिखरे रंगों को खुद में समेटे मैं मेट्रो में चढ़ गई। सीट नहीं थी बैठने को पर सभी खड़ी सवारियों की तरह तस्सली थी—चलो ए.सी तो चल रहा है।

हाल ही में एक सर्वेक्षण हुआ था जिसमें ७४ प्रतिशत दिल्ली-वासिओं ने मेट्रो को दिल्ली के विकास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बताया।

तो बचपन इस मेट्रो में भी था। पर मम्मी पापा के फ़ोन की गेम्स में उलझा हुआ। आस-पास क्या हो रहा है, क्या गुज़र रहा है कुछ पता नहीं क्योंकि मोबाइल की स्क्रीन पर इतनी तेज हरकतें होती है कि दिमाग कुछ और सोच ही नहीं पाता।

मुझे याद है जब बचपन में हम रेल से सफ़र करते थे तो हम भाई बहनों में अक्सर इस बात को ले कर लड़ाई होती थी कि खिड़की के पास कौन बैठेगा। फिर मम्मी मध्यस्ता करते हुए बारी लगा देती थी—खिड़की के पास बैठने की। तो लड़ाईयां यहाँ भी हो रही थी, पर इस बात पे की मोबाइल या टेबलेट कौन लेगा। और मम्मी हमेशा की तरह अपना रोल निभा रही थी—बारी लगाने की। एक-एक गेम लगाने की बारी।

ज्यादा दूर नहीं जाना था। तीन ही स्टॉप थे तो उतर गई। बचपन की खुशबू से सरोबार।

मुझे उनकी भी याद आई जिनके लिए एस्कलेटर भी एक खेल था, उसकी भी जिसकी खेल का दायरा बहुत सीमित था और जिसको उसके दोस्त बैठने वाले खेल खिलाते होंगे—लूडो, कैरम या फिर यही मोबाइल, पर उसका मन पकड़म पकड़ाई या फिर साईकिल चलाने का होगा। लेकिन ऐसे में भी उस बच्चे और उसके माँ-बाप ने उसके लिए नए आयाम तय कर रखे हैं जिसमें थकना मन है और हौसला हारने पर प्रतिबंध।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

राजनीति

जनता आजकल बौखलाई हुई है। रोज नए घोटालों की उनको आदत सी हो गई थी पर अब नए पुराने घोटालों के साथ, कम होती सुरक्षा व्यवस्था और रोज बड़े होते भ्रष्टाचार के किस्से। २ जी, कोयला आबंटन, चिटफंड, बलात्कार।

"अब किस-किस का जिक्र करोगे। रोज नए कारनामे सामने आते हैं इनके," मेट्रो के एक डिब्बे का दृश्य, जो कि इस बार लेडीज़ डिब्बा नहीं था।

वैसे एक बात है लेडीज़ डिब्बे में। मैंने औरतों को मौजूदा राजनीती पे चर्चा करते कम ही सुना था। शायद वो अपने रोजमर्रा के पचड़ों से इतनी घिरी रहती हैं कि राजनीती की बारी ही नहीं आती।

चलो जो भी है। आज इस जरनल डिब्बे में राजनीती पे खूब चर्चा हो रही थी

"सब के सब चोर हैं। पहले पैसा खा लेते हैं। फिर खाना पूर्ती के लिए एक जांच कमेटी बना देंगें," एक अंकल ने कहा।

"अगर बदलाव की सोचो भी तो यही लगता है चोर-चोर मौसेरे भाई," दुसरे महानुभाव ने राजनीती पे अपने ज्ञान का ठप्पा लगते हुए कहा।

"कौन कब किसके खिलाफ बोलेगा और कौन कब किस की गोद में जा बैठेगा, कुछ पता नहीं," पहले वाले अंकल ने कहा।

तो बिना किसी का नाम लिए बड़ी आम सी राजनीती पे चर्चा हो रही थी। दोनों को जल्दी ही उतरना था तो चर्चा ज्यादा देर तक चली नहीं। पर मौजूदा राजनीती के बारे में सोचते हुए मैं ऑफिस की तरफ बढ़ गई। वहां पहुंची तो लगा माहौल कुछ उखड़ा-उखड़ा सा है। पर ज्यादा ध्यान देने का समय नहीं था। बोझिल से माहौल में वैसे ही आपको काम करने में मज़ा आता है और आप कुछ न करते हुए भी खुद को किसी न किसी बात का दोषी मानने लगते हैं।

बस इस माहौल में किसी तरह काम निपटा कर मैं वापसी के सफ़र की तरफ बढ़ गई। इस बार उसी पुराने डिब्बे में यानि लेडीज़ डिब्बे में।

आज लड़कियों की भीड़ नहीं थी ऐसा नहीं कहूँगी पर हाँ कुछ व्यसक या मिडल एज्ड महिलाएं भी थी। एक के हाथ में सब्जियों का थैला था जिसमे वो सीताफल, खीरा और करेला ले कर जा रही थी। मुझे अचानक इन सब्जियों के नाम पे बनने वाले बच्चों के तरह-तरह के मुंह याद आ गए। खैर उस महिला ने बैठे-बैठे दो तीन बार लिफाफा देखा। मानों उनका बस चले तो यहीं से आधी तैयारी कर के जाएँगी। पर शायद उन्हें भी पता था फिलहाल वो देखने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगी और शायद मैं भी। तो मैंने उनके पास से अपनी नज़रे हटा ली।

एक अन्य, उसी उम्र की महिला एक मोटी सी किताब ले कर बैठी थी। थोडा सा पढ़ती फिर किसी सोच में गुम हो जाती मानों कुछ निचोड़ निकाल रही हो। मन में कौतूहल पैदा हुआ। ऐसे कौन से जीवन दर्शन के बारे में पढ़ रही हैं कि दुनिया का होश ही नहीं है। खैर जब वो ऐसे ही सोच में गुम थी तो उन्होंने किताब बंद की। तब देखा कि वो नियमावली है। शायद उस ऑफिस की जहाँ वो काम करती होंगी।

जिस तरह से वो नियमावली में गंभीर मुद्रा में खोई हुई थी लग रहा था किसी गहरी समस्या का समाधान ढूंढ रही हों। ऑफिस में समस्या मतलब—कुछ चल रही राजनीती—जिसका या तो आप हिस्सा बन नहीं पाए या बनना नहीं चाहते।

लगा सही है औरतें यूं राजनीती पर चर्चा नहीं करती तो घर के अन्दर, मोहल्ले की, ऑफिस इत्यादि की राजनीती का हिसा तो बन ही जाती हैं ... जाने अनजाने में।

अगर स्पर्धा सिर्फ खुद को सर्वश्रेष्ट साबित करने की हो तो उसके परिणाम जाने कितनों के व्यक्तित्व संवार सकते हैं। पर अगर यही होड़ खुद को सर्वश्रेष्ट के अलावा दूसरों को हीन, निर्गुण साबित करने की हो तो वो राजनीती बन जाती है। राजनीती पता नहीं क्यों हमेशा जोड़-तोड़ पे ही टिकी होती है। और इस विद्धा में परांगत होना, हर किसी के बूते की बात नहीं होता। मेरे जैसे कई तो प्रवेश परीक्षा में भी न पहुँच पायें शायद।

उनकी परेशानी थोड़ा परेशान कर रही थी मुझे। पर विषाद की रेखाएं उनके चेहरे से कम करने के लिए मैं क्या कर सकती थी यह समझ नहीं पा रही थी।

इतने में उनके साथ वाली सीट खाली हुई तो वहां पर एक करीने से तैयार हुई महिला आ कर बैठी। उसके पास एक खूबसूरत सा पर्स और एक प्यारा सा बैग था। बैग जूट का था पर इतना सुंदर था कि उसे थैला कहने को मन नहीं किया। बैठते ही उन्होंने पहले पर्स के बाहर की जिप खोली। एक रूमाल निकाला और ना दिखने वाला पसीना पोंछा। फिर उसी करीने से उसको वापिस उसी जेब में रख दिया।

मैंने मन में सोचा मुझे तो रूमाल ढूँढने के लिए भी पर्स की हर जिप खोलनी पड़ेगी। उस पे भी उसमें कागज और पेन तो हर जेब में मिल जायेंगे पर रूमाल मिलेगा कि नहीं इस की कोई गांरटी नहीं है। खैर जो अच्छी आदतें मुझ में नहीं हैं वो किसी और में देखती हूँ तो उनके लिए 'वाह' जरूर निकलता है।

तो उन्होंने अपना प्यारा सा जूट बैग खोला और उसमें से एक किताब निकाली। मैंने फिर मन में कहा, "एक और किताब।" मुझे ज्यादा शॉक न देते हुए उन्होंने जब वो किताब खोली तो पता चला कि वो एक लाइफ स्टाइल मैगज़ीन थी। मैंने चैन की सांस ली।

वो एक-एक कर पन्ना पलटने लगी। अचानक मैंने देखा कि उनके एक तरफ बैठी लड़की, जिसने अभी तक अपनी कोर्स की किताब में सर घुसाया हुआ था, उसने अपना ध्यान अपनी किताब से हटा कर, पूरी एकाग्रता के साथ मैगजीन में लगा दिया। शायद इसे ही डिसट्रेकशन या भटकाव कहते हैं जो आज कल के बच्चों और युवाओं में बहुत पाया जाता है।

खैर मैं उसे बहुत कुछ कह नहीं सकती थी तो चुप रही।

अचानक देखा नियमावली वाली महिला ने भी अपना सर किताब में से निकाल कर मैगजीन में घुसा दिया। मैगजीन ने रबड़ का काम करते हुए उसके माथे पर उभरी सारी लकीरों को परे कर दिया।

बिना लकीरों के उनका माथा काफी अच्छा लग रहा था। शायद सभी का लगता है या मुझे ऐसा पसंद है। लगा ऑफिस में जो व्यर्थ की राजनीती चलती है उसकी जगह पर अगर कोई रुचिकर कार्यक्रम शुरू हो तो माहौल कुछ सुधर जाये। पर साथ ही किसी इश्तहार के नीचे लगे सितारे याद आये जो कह रहे हों 'शर्तें लागू'। तो शर्त बस इतनी है कि इस रुचि में भी होड़ की राजनीती न शामिल हो।

पर कुछ चीज़ों के जवाब हमें कभी नहीं मिलते।

तो अब एक ही मैगजीन तीनों ही पढ़ रही थी, एक जैसी जिज्ञासा के साथ। इतने में मैगजीन वाली महिला का स्टॉप आ गया और वो उतर गई। तो पहले तो लड़की ने वापिस अपना सर किताब में घुसा दिया मानों मम्मी देखने आई हो कि बेटी पढ़ रही है या नहीं। और नियमावली वाली महिला, जिसने अभी तक अपनी ऊँगली को बुकमार्क बना कर किताब में डाला हुआ था, मानों वापिस धरातल पर आ गई हो और धीरे से उन्होंने ऊँगली वाली जगह से किताब पुन खोल ली और माथे पे मिटी हुई रेखाएं वापिस अपनी जगह पर आ गई।

मेरा स्टॉप आ गया था और मैं सोच में डूबी, उस महिला की मदद करने में असमर्थ उतर रही थी, यह सोचते हुए कि कुछ चीज़ों से निपटने के लिए हमें खुद को अपने तरीके से तैयार करना पड़ता है और वो... वही कर रही थी।

© उपमा डागा पार्थ २०१३