बुधवार, 15 जनवरी 2014

न्यू इयर रेज़ोल्यूशन

कई बार साल इतनी तेजी से गुजरते हैं मानों किसी मैराथन में भाग ले रहे हों और उन्होंने रेस का पहला पुरस्कार लेने की बस ठान ली हो। ऐसा ही कुछ था पिछला साल। इस रफ़्तार से बीता कि पता ही नहीं चला। और अगला साल कब चुपचाप, बिना दस्तक दिए, इस अलसाई सी धूप में आ कर बैठ गया इसका गुमाँ ही नहीं हुआ।

हर नए साल की तरह इस बार भी परिचित वही एक दो सवाल दोहरा रहे थे – क्या उम्मीदें हैं नए साल से? क्या नया प्रण लिया है या क्या बदलाव लाओगे खुद में। और लग रहा था आज कल इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढ़ने में ही सफ़र कट रहा है।

कुछ सोचते हुए मेट्रो में चढ़ती हूँ, कभी वहाँ गुम हो जाती हूँ, कभी जवाबों की जगह कुछ और सवाल साथ ले आती हूँ, कभी आदतन मुस्कुरा देती हूँ तो कभी परिस्तिथीवश माथे पर शिकन आ जाती है।

इन्हीं सब से दो चार होते हुए एक दिन मेट्रो में चढ़ी तो एक खाली सीट को अपना इंतज़ार करते पाया। यकीं मानिए ऐसा नज़ारा विरले ही कभी देखने को मिलता है। तो मैं किस्मत की इस देन को सर आँखों पे लेते हुए उस सीट पर जा बैठी। मेरे साथ एक औरत अपनी बच्ची को गोद में उठाए बैठी थी। नेट वाली आधुनिक साड़ी, उसके उपर स्वेटर नुमा कोट पहने। बालों में पिन इतने ज्यादा लगा रखे थे मानों तेज़ हवा के झोकों को चुनौती देने चली हो कि मेरे बालों को हिला के तो दिखाओ। कुछ यही हाल उनकी साड़ी का भी था। बड़ा बेतरतीब सा मेकअप था यानि पता चल रहा था कि मुंह पर बहुत कुछ लगा रखा है। अब यह 'बहुत कुछ ' 'क्या कुछ ' था तो न तो मेरी नज़र इतनी तेज थी न ही अक्ल। बच्ची को भी अपने ढंग से सजा रखा था। वो बच्ची छटपटा रही थी। अब वो गोद से उतरने के लिए थी या किसी और वज़ह से, यह नहीं पता। खैर मैंने बच्ची का ध्यान दूसरी तरफ करने के लिए उससे बातें शुरू की। एक साल से कम उम्र की थी वो बच्ची और वो शब्दों की न सही आँखों की जुबा बाखूबी समझती थी। 

उस औरत के कपड़ों में से घुटन की गंध आ रही थी। संदूक के अंदर रहने की घुटन, महीनों बंद रहने की घुटन। अब यह गंध सिर्फ मुझे ही आ रही थी या बाकियों को भी, पता नहीं। क्योंकि बाकी सब बिना प्रतिक्रिया के बैठे हुए थे। मेरी प्रतिक्रिया भी इतनी स्पष्ट नहीं थी कि उसको कुछ समझा पाती पर मुझे बहुत बैचनी हो रही थी। वो सजी धजी औरत अपने गंतव्य पर उतर गई। बच्ची की बैचेनी फिर शुरू हो गई और मेरी ख़त्म। पर उसको इस घुटन का अंदाज़ा नहीं था या फिर वो गंध उसमें इतनी रच बस गई थी कि वो उसे अजनबी नहीं लग रही थी।

उस सधारण से भी कुछ ज्यादा दिखने वाली महिला ने मुझे सोच में डाल दिया। कपड़ों की घुटन तो बिना प्रतिक्रिया के फिर भी सही जा सकती है पर विचारों की...

उस प्रकरण के बाद मेट्रो में चढ़ने उतरने का क्रम कुछ दिन थम सा गया था या यूं कहिए एक अल्पविराम था। दौड़ती भागती जिंदगी दोबारा ट्रैक पर थी और मैं दोबारा मेट्रो में। किसी छुट्टी का दिन था। कामकाजी श्रेणी मेट्रो से नदारद थी आज और उसकी जगह नाते रिश्तेदारों से मिलने वालों की ही भीड़ ज्यादा दिख रही थी। यह मैंने बच्चों और बड़े बड़े बैग के साथ सफ़र कर रही महिलाओं को देख कर अंदाज़ा लगाया। और इस भीड़ की वज़ह से मेट्रो खाली होते हुए भी उसमें बैठने की जगह नहीं थी। मैं खड़े खड़े उन हँसते मुस्कुराते चेहरों की तरफ देख रही थी जो बदलाव से खुश थे। रोजमर्रा की जिंदगी के बदलाव से, किसी और से मिलने का बदलाव।

दो-तीन साल की एक बच्ची ने साथ बैठी महिला के हाथों की तरफ देख कर अपनी मम्मी को बोला, "मम्मी! मेहँदी"। मम्मी  मुस्कुरा दी और वो आंटी भी। फिर उसके पैरों की तरफ देख कर बोली, "मम्मी! नेलपॉलिश"। दोनों औरतें फिर मुस्कुराई। वो फिर आँखों की तरफ देख कर बोली, "मम्मी! लाइनर"। वो महिला जिसकी शान में उस बच्ची ने कसीदे पढ़े थे, उठते हुए बोली, "बड़ी स्वीट है", और बाय कहते हुए उतर गई। अब उस बच्ची के सामने एक नया चेहरा था। मैंने उसकी मम्मी को बोला, "बहुत ध्यान से सब देखती है।" तो वो हँसते हुए बोली, "मेकअप का बहुत शौंक है इसको।" मैं मुस्कुरा दी। उसका ध्यान अब पूरा मुझ पर था। मैंने हँसते हुए कहा, "बेटा, यहाँ तुम शौंक पूरा नहीं कर पाओगी। कुछ नहीं मिलेगा यहाँ तुम्हारे मतलब का।" इतने में वो चिल्ला के बोली, "मम्मी! लिपस्टिक।" 

हम दोनों हस पड़े। मैंने यह वाकई सोचा नहीं था। उसकी मम्मी ने हँसते हुए कहा, "आप इसकी नज़रों से बच नहीं सकते।" मैं मुस्कुरा दी और वो चली गई। अब एक सरदार बच्चा मेरे पास सरक गया। उसकी मम्मी और भाई भी थे साथ में। अपने  बच्चों, खास कर उस छोटे बेटे को व्यस्त रखने के लिए उसकी मम्मी बार-बार अपने स्मार्ट फोन पर एक गाना चलाती, वो छोटा सा सरदार उठता और पैर हल्के से चलाने लगता पर पूरी तरह नाच नहीं रहा था। उसकी मम्मी ने मेरी तरफ देख कर कहा कि घर पे तो अब तक खूब तेज डांस शुरू हो जाता है। मैंने प्यार से मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा।

अचानक मुझे कुछ भूख सी लगी तो याद आया कि मेरे पर्स में एक चुइंगम पड़ी है तो निकाल कर मुँह में डाली और थोड़ी देर बाद इधर उधर देखते हुए गुब्बारा फुला दिया। यह करना था कि छोटे सरदार जी मेरे पास आ कर बैठ  गए। गाना वाना छोड़ कर लगातार मेरे मुँह की तरफ देखने लगे। मैंने उसके लिए फिर से गुब्बारा फुलाया। उसने खुश हो कर अपने भाई और मम्मी की तरफ देखा फिर दोबारा मेरी तरफ कि फिर फुलाओ। अब मैं फरमाईश पर गुब्बारे फुला रही थी। दो तीन बार ऐसा करने पर मैंने कहा अब बस। फिर वो अपनी मम्मी की तरफ घूम कर उनके मुँह की तरफ देखने लगा। उसकी मम्मी ने हँसते हुए कहा मेरे पास नहीं है। मैंने कहा, "अब  स्टेशन पर उतरते ही सबसे पहला यही काम करना," और मैंने हँसते हुए उनसे विदा ले ली।

मेट्रो की सीढियाँ उतरते हुए सोच रही थी बदलाव सबको दीखता है और अच्छा भी लगता है, पर उस बदलाव के लिए या यूं कहिए कि बदलाव दिखाने के लिए खुद को बदलना क्या तर्कसंगत है? यही सोचते हुए मैं अपने काम की तरफ बढ़ गई। 

वापसी में ठण्ड के मीठे से एहसास को खुद में समेटे हुए अपने  ठंडे से हाथों को रगड़ कर गरम करने की कोशिश कर रही थी। मैंने अपने बचपन को याद करते हुए मुँह से दो तीन बार हवा निकाली पर वो मुँह से छल्ले बन के निकलते थे वो नहीं निकल पाये। थोड़ी सी उदासी हुई कि अभी भी उतनी ठण्ड नहीं आई जितनी बचपन में हुआ करती थी। बचपन वाली उस ठण्ड में मम्मी पूरी बांह वाले स्वेटर के साथ एक आधी बाजू वाला स्वेटर तो पहनाती ही थी कभी-कभी दो के ऊपर एक और भी पहना दिया जाता था। स्कार्फ़ और जुराबें तो होती ही थी। दस्ताने मेरे लिए बहुत जरूरी नहीं थे क्योंकि मेरे हाथ उनमें भी ठन्डे ही रहते थे। ख़ैर! मेरे बचपन वाली ठण्ड ज्यादा ठंडी थी यह तय था इसलिए सर्दी होते हुए भी कम लग रही थी। 

मेट्रो आने पर लगा आज तो जगह मिल ही जाएगी और आज अपने पूर्वानुमान में मैं गलत  नहीं थी। बैठ कर नज़र दौड़ाई तो ज्यादातर लड़कियाँ और औरतें अपने मोबाइल फ़ोन पर व्यस्त थी। एक बड़ी-बड़ी और बोलती आँखों वाली लड़की मेरे सामने बैठी थी। उसकी मम्मी कुछ अपनी ही सोचों में ग़ुम थी। बच्ची ने हाथ में एक लिफ़ाफ़ा पकड़ रखा था और जिस अधिकार से उसने वो लिफाफा पकड़ रखा था और जिस तरह वो बार-बार उसे देख रही थी यह निश्चित था कि उसमें उसका ही सामान था। तो उस शांत सी लड़की ने, अपनी मम्मी को तंग न करते हुए, डिब्बे में एक नज़र दौड़ाई। कोई उसकी तरफ देख नहीं रहा था और सब अपनी वर्चुअल दुनिया में व्यस्त थे। उसने अपने पास बैठी महिला के मोबाइल पर नज़र डाली उसने एयरफोन लगाए हुए थे अब वो गाने सुन रही थी या कुछ और कर रही थी पता नहीं, पर बच्ची को उसकी काल्पनिक दुनिया में मज़ा नहीं आया और वो वापिस इधर उधर देखने लगी। 

उसने वापिस डिब्बे में नज़र दौड़ाई। मेरी तरफ वाली सीट पर बैठी दो लड़कियाँ किसी बात पर हंस रही थी। अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से इस बड़ी सी दुनिया को निहारती वो बच्ची उनको हँसते देख कर मुस्कुराई मानों कह रही हो कोई तो है यहाँ पर जो वर्चुअल में नहीं वास्तविकता में जीता है।

यमुना बैंक से भीड़ का एक रेल चढ़ा। चित्रकार को अचानक एक बड़ा सा कैनवास दे दिया जाता है पेंट करने को और वो सोच में हो कि वो कहाँ से शुरू करे। कुछ ऐसी ही हालत उस लड़की की भी थी। वो जैसे चेहरे को पढ़ना चाहती थी, हर हंसी के साथ मुस्कुराना चाहती थी।

दोनों माँ बेटी एक दूसरे की तरफ ना देखते हुए भी एक ही दिशा में देख रही थी। तो बच्ची में जो ठहराव सा दिख रहा था वो माँ की वज़ह से था। दोनों की निगाहें जब टकराती तो जैसे दो गंभीर लोग एक दूसरे को देख कर मुस्कुराते हैं वहीँ भाव उनके चेहरे पर भी  आते थे। 

मैं उस बच्ची से  प्रभावित हो कर उसकी तरफ देख रही थी। अचानक मुझे लगा कि मेरा अक्स थोडा छोटा हो कर, कद और उम्र में, मेरे सामने बैठा है। और बिन कही कहानियाँ बीनने की कोशिश कर रहा हो। 

अच्छा लगा देख कर कोई तो है जो इस दुनिया को, उसके हर रंग को, उसके लोगों को देखना समझना चाहता है। अब इस चाहत का नतीज़ा जो चाहे निकले। 

हम लोग साथ ही साथ बाहर निकले तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछा, "इसमें आपका सामान है।" उसने मुस्कुरा कर हाँ कहा। बात करते हुए उस शांत सी दिखने वाली लड़की में एक चंचलता भी दिखी और कुछ शैतानी भी। तो उस लिफाफे में उसकी रंग बिरंगी नई पंजाबी जूती थी और एक पर्स भी जो बहुत इसरार के बाद भी उसने मुझे नहीं दिखाया। 
उसको बाय कह के निकली तो लगा मेरे सारे सवालों के जवाब हैं मेरे पास।

विचारों की घुटन को भावों की धूप लगाते रहना पड़ेगा और साथ ही दिखावे वाले बदलाव से अच्छा है खुद को, अपनी वास्तविकता को सहेज कर रख लूँ। और जहाँ तक पूरे साल में या आगे क्या कुछ करने का सवाल है तो उसका सीधा सा जवाब यही है कि हमें तो सफ़र करते रहना है, सफ़र में जितनी दास्तानें मिलेंगी वो सुनते जाना है और कही मौका मिला तो अपनी दास्ताँ भी सुनाते जाना है। 

जिंदगी के इन अनसुलझे सवालों का राजदार मैं ही हूँ,
तमाशा है गर यह दुनिया तो तमाशबीन मैं ही हूँ... 

© उपमा डागा पार्थ २०१४