जिन्दगी को एक रफ़्तार में आते देख अच्छा लग रहा था। और इस रफ़्तार को गति दे रही थी मेट्रो या मेरा अपना मेट्रोस्तान।
आज बड़ा बेजान सा था मेट्रो जाते समय। मानों सारा शहर थका-थका सा हो। अपने ही सीने पे कोई बोझ लिए किसी का इंतजार कर रहा था—उस बोझ को उतारने। पर वो 'कोई' कौन है, कोई नहीं जानता।
तो बस एक थके हुए डिब्बे से निकल पड़ी। मेट्रो जैसे मुझे चिढ़ा रही हो—बंद होठों से कितनी कहानियां निकलवाओगी। जाओ यह अपना मेट्रोस्तान ले कर कहीं और जाओ। तो मैं कई बंद होठों की कहानियाँ वहीं छोड़ कर मेट्रो से निकल पड़ी।
बाहर निकल के मैंने देखा कि एल. आइ. सी. बिल्डिंग और जी. पी. ओ. के बीच में जो पेवमेंट है, वहां पर ढेर सारे कबूतर इक्कठा थे। दाना खाने के लिए। ऐसा लग रहा था मुंबई का इक छोटा सा गेटवे ऑफ़ इंडिया दिल्ली में भी आ गया हो, जहाँ लोग सिर्फ पक्षियों से ही मिलने आते हैं और पक्षियों को भी लगता है कि आज के युग में भी 'इंसान' जिन्दा है।
देखा तो लोग वहां गाड़ी से उतर रहे थे, सिर्फ दाना डालने के लिए। अचानक अपनी दिल्ली पर थोडा बहुत गर्व होने लगा। यहाँ के लोगों में पक्षियों के लिए दया भाव देख कर। लगा हाल ही में जो सर्वेक्षण हुआ था, जिसमे दिल्ली को रहने वाली जगहों में नीचे से दूसरा स्थान मिला था, उसमें उन्होंने इंसानियत के इस पहलू को तो पूरी तरह से नज़रंअदाज़ ही कर दिया होगा।
एक अच्छे से एहसास के साथ काम शुरू किया और ख़तम भी।
वापसी में न चाहते हुए भी ध्यान 'मिनी गेटवे' की तरफ चला गया, जो अब बिलकुल खाली था। मानों परिंदों को भी पता हो कि कब दिल्ली के दयालु उन्हें पुचकारने के लिए आयेंगे।
और राजीव चौक पर एक भरी सी गाड़ी मेरा इंतजार कर रही थी। पर आज दिल्ली अच्छी लग रही थी—अपनी अच्छाई के कारण।
एक महिला ३०-३२ वर्ष की, मेरे साथ ही गाड़ी में चढ़ी। एक पर्स कंधे पर, एक जुट बैग हाथ में और दुसरे हाथ में कागज का एक बैग। लगा ऑफिस वालों ने भी स्कूल की तरह बैग भारी करने शुरू कर दिए हैं। क्या अब ऑफिस में भी होमवर्क मिलने लगा है? उसने अपने दोनों हाथों का सामान समेटते हुए नज़र दौड़ाई, पर सीट मिलने के कोई आसार नहीं दिखे, तो उसने ऊपर वाली रॉड को पकड़ने की कोशिश की। पर हाथ ऊपर ले जाते ही कागज का बैग फट गया। मुझे लगा बेकार ही दिल्ली सरकार ने प्लास्टिक के बैगस पर पाबंदी लगाई।
खैर, उस कागज़ के बैग के अन्दर एक प्लास्टिक बैग मेरे विचारों को मुँह चिढ़ाता हुआ सा बाहर निकला। मानो कह रहा हो, घबराओ मत सिर्फ आवरण ही बदला है अन्दर से हम वही हैं। जो दो-चार चीज़ें कागज़ के बैग के अन्दर थी वो उसने प्लास्टिक बैग के अन्दर डाल दी। फिर उसने मेरी एक 'उम्मीद' को झुठलाते हुए, फटा हुआ कागज़ का बैग सलीके से मोड़ा और उसे तह कर के प्लास्टिक बैग में डाल दिया।
जहाँ लोग हॉर्न की आवाज़ सुन कर भी नहीं हटते और सड़क के किसी भी कोने पर कूड़ा फेंकने में उनको 'अपने देश और भारतीयता' की फीलिंग आती है, ऐसे में यह अनुभव मेरे लिए नया था। और दिल्ली आज मेरे लिए सिर्फ अच्छे-अच्छे अनुभव ही ले कर आ रही थी।
मेरी मुस्कान और फैल गई।
साथ में बैठी एक बच्ची को भूख लगी तो उसकी मम्मी ने उसे डार्क फेंटसी बिस्कुट का एक पैकेट दिया। मैं भी डार्क फेंटसी मिलने पर ऐसे ही खुश होती हूँ, उस छोटी बच्ची की तरह, फिलहाल मैं उसे देख कर खुश थी।
वो लिक करो, ट्विस्ट करो की तर्ज़ पर बिस्कुट खा रही थी। बचपन भोला तो होता ही है, पर उसकी ऐसी अठखेलियाँ उसे सीधा दिल में उतार देती हैं... कभी न भूलने के लिए।
वो एक-एक करके अपने बिस्कुट खा रही थी। अभी दो-तीन ही खाए थे कि पैकेट हाथ से छूट गया और सारे बिस्कुट नीचे जमीन पर। मुझे लगा मैं छोटी होती तो पक्का रो देती और आस-पास के लोगों की नज़र बचा कर एक तो उठा ही लेती।
खैर, बच्ची रोई तो नहीं पर हाँ जमीन से उठाने का लालच रोक नहीं पाई।
तभी मम्मी की जोरदार आवाज़ आई, "नो पूरबी! जमीन पे गिरी चीज़ नहीं उठाते। फर्श गन्दा होता है न बेटा। कितने कीटाणु होंगे इनमें।"
बेचारी पूरबी। उसका मुँह उतर गया। उसने अपना हाथ वहीँ रोक लिया। मुझे लगा मेट्रो आख़िरकार गन्दी हो ही गई। पर मुझे हैरान करती हुई उसकी माँ उठी और सारे गिरे हुए बिस्कुट उठा लिए और पैकेट मैं डाल दिए।
पूरबी ने कहा, "जब खाने ही नहीं हैं तो उठाये क्यों?"
"क्योंकि हम मेट्रो को गन्दा तो नहीं कर सकते। हमने गन्दा किया है तो उठाना भी तो हमें ही पड़ेगा," माँ ने कहा।
हैरान थी मैं अपनी धारणाओं और गलत भ्रांतियों को ले कर। और आज तो दिल्ली को ले कर मेरे मन में सिर्फ ख़ुशी और गर्व का एहसास था।
मेरा स्टेशन आ गया था और मैं मेरी दिल्ली के नए रूप को जान कर खुश थी, जहाँ दया भी थी, इसको साफ़ रखने की चाह थी, अपनापन था।
मैं उठी तो देखा पूरबी और उसकी माँ भी साथ में उठ गई। मैंने प्यार से उसके गाल छुए। वो चिपक गई अपनी माँ के साथ। मैं हंस के आगे बढ़ गई। वो लोग मेरे पीछे- पीछे थे। मैं उतर कर ऑटो का इंतजार करने लगी। देखा दोनों माँ-बेटी आ रही थी और माँ ने हाथ में पकड़ा लिफाफा सीढियो पर बैठी एक भिखारन को पकड़ा दिया, जिसके हाथ में एक बच्चा था। बच्चा बिस्कुट पाकर खुश हो गया और फटाफट खाने लग गया। माँ भी उनको दुआएं देने लगी।
बेटी ने कुछ कहा नहीं बस सर उठा कर अपनी माँ को देखा। मानों पूछ रही हो मम्मी कीटाणु...
और मुझे लगा कि अचानक मीठा खाने के बाद मैंने कड़वी दवाई पी ली हो...
© उपमा डागा २०१२
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