बुधवार, 14 नवंबर 2012

देश दंश

रविवार, दिवाली, धनतेरस... सफाई, शॉपिंग और गिफ्ट्स।

यही है दिल्ली का मूड आज के दिन। तो उसी मूड से सरोबार हम भी अपने मेट्रोस्तान की ओर रवाना हो गए। मस्ती और काम का संगम। स्टेशन पर पहुंची तो देखा बस इक्का दुक्का लोग बैठे ही थे। लगा लोग आज छुट्टी के मूड में हैं। पर गाड़ी आने में पूरे छः मिनट थे। फिर सोचा यहाँ तो एक मिनट में सरकारें बदल जाती हैं छः मिनटों में तो पता नहीं क्या हो जाये।

और सही था शायद ... फिर से भर गया स्टेशन पांच मिनट में। 

डिब्बे के अन्दर भी ऐसा ही माहौल था। महिलाओं के भारी-भारी सूट मैचिंग जेवेलरी, सजे धजे बच्चे। देख के लगा कि हाँ मशीन बनते इंसान में अभी भी एहसास, जोश कहीं बाकी है। लोगों के हाथों में उपहार के बड़े-बड़े पैकेट थे। मतलब या तो किसी से मिल के आ रहे हैं, या किसी से मिलने जा रहे हैं। अच्छा लगा देख के कि मिलने जुलने की रवायत अभी भी कायम है।

तभी एक लड़की का मोबाइल बजा। 

"कहाँ थी तुम? कब से तुम्हारा फ़ोन ट्राय कर रही थी। आउट ऑफ़ रीच आ रहा था।"

"कुछ नहीं, सरोजनी तक जा रही थी, शौपिंग करने।" 

"अरे बस कुछ टॉप और सूट लेने थे। ऑफिस पहनने वाले सारे कपड़े ख़तम हो गए हैं।"

इससे आगे मैं कुछ सुन नहीं पाई। इसी बात पे मुझे महिलाओं के बारे में कही एक बात और अपनी एक बहुत ही प्यारी सहेली याद आ गई।

कहते हैं कि कपड़ों की अलमारी के आगे आधा घंटा खड़े होने के बाद भी अक्सर उन्हें पहनने के लिए कुछ नहीं मिलता। मुझे पता है कि मैं भी उसी बिरादरी से ताल्लुक रखती हूँ और इस राज को सरेआम करने के लिए मुझे बहुत सी गालियाँ पड़ने वाली हैं। पर खुबसूरत दिखना और उसपे फोकस करना हर एक के बस की बात भी तो नहीं है। इसी की जीती जागती मिसाल है मेरी वो सखी जिसकी वार्डरोब हर दो महीने बाद खाली हो जाती है।

राजीव चौक आ चुका था और मैं मुस्कुराते हुए वहां उतर कर अगली गाड़ी के इंतजार में खड़ी हो गयी।

तभी पीछे से आवाज़ आई, "देख मेट्रो की हीरोइनें"।

हँसती हुई आवाज़ ने मेरे आगे खड़ी दो महिलाओं की तरफ इशारा किया। देखने से अफ्रीका के किसी देश की लग रही थी। बाल अजीब से पर्पल और गोल्डन कलर के थे। फिर भी उनके बारे में यूं अशोभनीय बातें सुन कर अच्छा नहीं लगा।

"पता है दोनों ने ड्रग्स ले रखी हैं।"

उसने अपना विशलेषण जारी रखा। मैं हैरान थी कि यह लड़की यहाँ क्या कर रही है इसे तो अन्तराष्ट्रीय ओलिंपिक संघ के डोप टेस्ट के बोर्ड में होना चहिये जो खिलाडियों के ड्रग टेस्ट महज उनका चेहरा देख कर कर पाते। इससे पैसा और समय दोनों की बचत होती और दुनिया लांस आर्मस्ट्रांग को दस सालों तक सर आँखों पे बिठाने के पाप से बच जाती।  

उसकी विशेष टिप्पणियाँ जारी थी। 

"हेरोइन या स्मैक। पक्का।"

उसके साथ दो या तीन लड़कियां थी। जिनको वो अपना ज्ञान बाँट रही थी।

"आँखे देखी हैं इनकी... कैसे चढ़ी हुई है।"

उन दोनों लड़कियों ने मुड़ कर पीछे देखा। मानों कुछ जवाब लिए बैठी हो पर कुछ सोच कर चुप हो गई हों। पता नहीं उनको सबसे जयादा क्या बुरा लगा पर एक दर्द था चेहरे पर। वो विदेशी होने का था या कहीं इतनी देर रहने के बाद भी अजनबी बने रहने का... पता नहीं चला पर हां अपने देश की याद बहुत आई होगी उनको। और मुझे याद आई महात्मा गाँधी की जिन्होंने अफ्रीका के ही एक देश से रंगभेद के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की थी और आज बापू के ही देश में उनके साथ यह व्यवहार हो रहा था।  

इतने में मेट्रो आ गई और उन्हीं लड़कियों का ग्रुप जिनकी तरफ देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी, मुझे धक्का मारकर, पैरों को कुचलता हुआ गाड़ी के अन्दर घुस गया। सभ्यता और होशो-हवास की मिसाल उन लडकियों का रवैया देख कर मैं हैरान थी। मैं लड़खड़ा कर शायद प्लेटफ़ॉर्म पर ही रह जाती अगर उसी समय एक हाथ ने मुझे अन्दर न खींचा होता। मैंने सर उठा के देखा तो एक दूध सी गोरी महिला, जो की विदेशी थी, ने  मुझे थामा हुआ था। मैंने उसे धन्यवाद् दिया। वो मुस्करा के बोली, "आप ठीक हो?" मैंने ख़ुशी मिश्रित हैरानी से उसे देखते हुए हाँ में सर हिलाया।

खड़े होने के लिए अपनी जगह बनाते बनाते मैंने एक बच्चे की आवाज़ सुनी, "मम्मी व्हेन विल वी रीच?"

उसकी प्यारी सी मम्मी ने एक अदा से कहा, "अनदर टेन मिनट्स"। वो खूब लम्बी सी और सुन्दर थी। इस बात का गुमान भी उसके चेहरे पे था।

तभी उसकी बेटी बोली, "मम्मी मैं थक गई हूँ।"

उस संभ्रांत सी दिखने वाली महिला ने लगभग डांटते हुए उसे कहा, "कांट यू स्पीक इन इंग्लिश"।

मैं उतर गई पटेल चौक पर। सोचने का टाइम नहीं था।

वापसी में मेट्रो में खड़े हो कर दिल्ली देख रही थी जो रोशनियों से सजी नई नवेली दुल्हन की तरह लग रही थी। चारों तरफ जमगाहट थी... पर कुछ खालीपन सा था अब... पर वो विदेशियों के साथ हुए उस सौतेले व्यवहार की वजह से था या अपनी भाषा के साथ हुए अनादर से... यह मैं समझ नहीं पाई।

© उपमा डागा २०१२

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