कितने साल हो गए ठीक से याद नहीं। शायद सात या आठ।
पिछले
आठ सालों से कुछ किया नहीं है, ऐसा नहीं है। पर लोगों के शब्द कोष के
पन्ने पलटें तो उस काम की परिभाषा उसमें नहीं मिलेगी। "अच्छा! घर पे ही
रहते हो। फिर तो खूब समय होता होगा आपके पास।" या फिर "हाउ लकी! यार हम तो
छुट्टी के लिए तरस जाते हैं।"
खैर मैंने अपनी परिभाषाएं कभी लोगों
की किताबों में खोजने की कोशिश नहीं की। बढते हुए बच्चे, उनकी जरूरतें,
उनका मीठा सा बचपन, उनकी मान मुनहार, उनका लाड़। सब एक-एक पल जिया है मैंने।
उनका विश्वास कि मम्मी है हमारे पास—हर पल।
मैं यह बिलकुल नहीं
कहती कि जो काम काजी महिलाएं हैं वो बच्चों के पास नहीं होती। बिलकुल होती
हैं। उनकी कार्यक्षमता, उनकी दोहरी भूमिका को मैं हमेशा सलाम करती हूँ।
यह
समय कैसे निकला पता ही नहीं चला। जब मेरे घुटनों चलते, तुतलाते बच्चे,
चलने और भागने लगे और इस बड़ी सी दुनिया में खुद को सहज महसूस करने लगे तो
लगा कि अब कुछ समय निकला जा सकता है कुछ करने का, कुछ ऐसा काम जो अभी तक
बैक सीट पर था। ऐसे में पता चला कि आकशवाणी में न्यूज़ कास्टर का चयन होने
वाला है। आवेदन जमा कराने का आखरी दिन था। बस किसी तरह भाग-दौड़ कर फॉर्म
जमा करवा दिया। टेस्ट दिया, पास हो गए। फिर इंटरव्यू और सेलेक्शन।
मेरे
साथ सब लोग खुश थे—पति, बच्चे, माँ, दोस्त। उन्हें ख़ुशी थी मेरी लोगों के
परिभाषित शब्द कोष में आने की और मुझे कुछ नया करने की।
पहले कुछ
दिन ट्रेनिंग के लिए जाना था। तो पहले दिन निकल पड़ी मैं भगवन का नाम ले कर
वापिस भागती दौड़ती दिल्ली की भीड़ भरी सड़कों पर। अपना रूट बनाया तो घर से बस
स्टॉप, फिर बस से प्रीत विहार मेट्रो स्टेशन। मेट्रो से राजीव चौंक, फिर
राजीव चौंक से पटेल चौंक और फिर हमारा आकाशवाणी भवन।
पहला दिन और
लम्बा चौड़ा रास्ता। सबने कहा कि ऑटो या टैक्सी ले लेना पर मुझे इस
सिमटी-सिमटी जिन्दगी से ही तो बाहर निकलना था। बच्चों को हमेशा कहती थी कि
हमें जिन्दगी के हर रूप के लिए तैयार रहना चाहिए। हर तरह की आदत होनी
चाहिए। तो रोज ऑटो से जाना मुश्किल नहीं था पर शायद, फिर मैंने जो सिखाया
था, वो सिर्फ किताबी होता। और ऑटो में जिन्दगी नहीं चलती, सिर्फ मूक बैठे
हम होते हैं। लोगों को अगर जानना, पढ़ना है तो किसी पब्लिक ट्रासपोर्ट से
जाओ। ऐसा मेरा मानना है।
तो एक नए रस्ते की तरफ कदम बढ़ाने को मैं भी चल पड़ी।
बस
स्टॉप पर पहुँचने के पाँच मिनट बाद बस आई। खचाखच भरी हुई। घड़ी पर नज़र डाली
और अपने सिद्धांतों पर भी। किसी पर भी पुनर्विचार करने का टाइम नहीं था।
बस में बस चढ़ गई किसी तरह। दो स्टॉप के बाद ही मेट्रो स्टेशन था, पर लगा
बेकार ही नहा धो कर आये। पसीने से तरबतर।
दिमाग में कितने चेहरे घूम गए—मुस्कुराते हुए—मानों कह रहे हो "हमने कहा था न"।
पर
फिलहाल समय नहीं था उनके कटाक्षों का जवाब देने का। तो जी बस हम मेट्रो
में भी चढ़ गए। हमारे शुभ चिंतकों ने तगीद की थी की लेडीज़ कम्पार्टमेंट में
ही चढ़ना। सो हमने अक्षरश पालन किया उस बात का। डिब्बे में चढ़ के लगा मानों
अचानक लड़कियों, औरतों की संख्या कुछ बढ़ सी गई है। सब समाए जा रही थी उसी एक
डिब्बे में। ऐसा लग रहा था मेरे चारों ओर सबने घेराबंदी की हुई है।
"बेचारी बड़े दिनों बाद आई है, कहीं गिर न जाये।" वि आइ पी ट्रीटमेंट।
खैर एक फायदा हुआ मेट्रो का—दोबारा नहाना नहीं पड़ा और आख़िरकार हम राजीव चौंक पहुँच गए।
फ्लेशबैक
का सीन दिखाने के लिए पुरानी फिल्मों में हीरो या हीरोइन को सेंटर में रख
कर डायरेक्टर तेज-तेज कैमरा घुमाता था, वैसे ही कुछ हाल मेरा था।
इतना बड़ा स्टेशन, लोगों से ठसाठस भरा हुआ और लोग एक स्पीड से, नपे तुले क़दमों से, निर्धारित दिश में बस बढ़ते जा रहे थे।
हमने भी चारों तरफ नज़र दौड़ाई और संकेत चिन्हों को फ़ॉलो करते हुए बढ़ना शुरू हो गए अपने गंतव्य की ओर।
आखिरी पड़ाव चूँकि कुछ ही पलों का था तो हम जल्द ही वहां पहुँच गए। फिर देखते, ढूंढते हुए, एग्जिट की तरफ बड़े।
मेट्रो
स्टेशन के बाहर पहुँच कर मैंने एक विजयी मुस्कान के साथ स्टेशन से विदा ली
और खुद को कहा, "मेट्रोस्तान में आपका स्वागत है उपमा जी। अब आपको इसकी रोजाना
डोज़ मिलती रहेगी।"
और फिर जिन्दगी चल पड़ी मेट्रो रफ्तार से।
© उपमा डागा २०१२
This is just wonderful !! I was in metro when I was reading this story your entire blog post has so much to read, learn, inspire and motivate. I was completely lost in reading. did not even realised that today the long journey that I usally spend by listening to same old collection of my songs is covered so quickly.
जवाब देंहटाएंwanna read more of it ...
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After reading this post all I can say is :
Happy Woman's Day to all the Women.