गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

भरोसा

कोई बोझ नहीं है, फिर भी यह दिल बोझिल सा क्यों है,
सब पे इनयात है, पर खुद से खफा खफा सा क्यों है।

तो कुछ ऐसा ही आलम था पिछले कुछ दिनों से, यूं सबसे कटी बैठी थी मानों कुछ खो गया हो मेरा या फिर रूठ गई हूँ किसी से, पर ऐसा कुछ, याद करने पे भी याद नहीं आया। तो अगर किसी से नराज़गी नहीं थी, तो क्या खुद से...

खैर! दिल की इस कथित 'नाराज़गी' का दर्द झेलती बेचारी 'मैं' अपनी मेट्रो में सिर्फ आ-जा ही रही थी। फिर एक दिन मन ने कमांड सँभालते हुए कहा कि चलो आज फिर से सफ़र किया जाये। तो अपनी दुनिया से मेट्रोस्तान की तरफ, बड़े दिनों बाद, मैंने अपने कदम बढ़ा दिए।

आज मेट्रो का माहौल कुछ अलग था, बहत खुशनुमा था या सब लोग बैठे हुए थे। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शायद सिर्फ कलेंडर की चंद तारीखें ही बदली थी, लोग, मेट्रो, उनका बर्ताव सब वैसा ही था, जैसा पहले था। सही भी है - किसी के होने न होने से अगर दुनिया अपनी रफ़्तार कम या ज्यादा करने लगे तो दुनिया का नाम बदल के कुछ और ही रखना पड़ेगा...

तभी सामने बैठी एक महिला के हाथ में सुडोको की किताब देखी। न चाहते हुए भी चेहरे पे एक मुस्कान आ ही गई। मेरा मानना है कि सुडोको एक ऐसा खेल है जो आपको सोचने पे मजबूर कर देता है और सोच की धार को और तेज कर देता है। और एक बार जिसे इसकी 'लत' लग जाती है, वो तो बस इसी का हो कर रह जाता है। तो इन सारे लक्षणों से पता चल रहा था कि वो सामने बैठी महिला इसी लत से पीड़ित थी... मेरी तरह।

उसके साथ दो बच्चे थे। ७-८ साल की बेटी और ४-५ साल का बेटा। बेटी को झपकी आ रही थी और वो बेटे पर गिरने लगी। बेटा, किसी भी शैतान भाई की तरह, उसे तंग करने लगा। बेटी ने, भाई-बहन के झगड़े की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए, उसे डांटना शुरू कर दिया। मम्मी को अंपायर की भूमिका निभाने के लिए अपना सुडोको छोड़ना पड़ा। दोनों को शांत करने के बाद वो वापिस अपने सुडोको में बिजी हो गई। बीच में नज़र मिली तो मैंने पूछा, "कितने का टारगेट है?" तो उसने हँसते हुए कहा, "जितना पूरा हो जाये, बच्चों के साथ और स्टेशन आने तक।"

जनून - अच्छा लगा जनून देख कर। शौक जब जनून बन जाये तो उसे करने में अलग ही मजा आता है। तो उसको, उसके जनून के साथ छोड़ कर, एक नज़र डिब्बे में घुमाई तो अपना चिर परिचित माहौल नज़र आया। कुछेक लोग गाना सुनने में मग्न थे और दो एक लडकियां नोट्स बना रही थी। देख के लगा कैसे अपने एक-एक पल को यह लोग अपने तरीके से जी रहे हैं।

इतने में मेट्रो की भीड़ थोड़ी कम होती दिखी। दो बच्चों के पास सीट देख कर मैं भी बैठ गई। १२ -१३ साल की एक लड़की अपने १० -११ साल के भाई के साथ बैठी हुई थी। लड़की की आँखों में चंचलता और हल्की शरारत थी। लड़का बेफिक्र और मस्तमौला था। दोनों की बातों और हरकतों से लग रहा था कि वो पहली बार अकेले मेट्रो में सफ़र कर रहे थे। वो लोग  बचपन का एक बहुत प्यारा सा खेल, जो हमने भी अपने समय में बहुत खेला था, खेल रहे थे ।

आओ मीलो
शीलो शालो
कच्चा धागा
रेस लगा लो
दस पत्ते कच्चे
हिरन के बच्चे 
हिरन गया पानी में
पकड़ा उसकी नानी ने,

यह गाते गाते वो एक बार सामने वाले के हाथ पे ताली मारते, एक बार अपने। इतना बोलने के बाद लड़की ने कहा, "पर नानी तो स्वर्ग चली गयी।" दोनों मुस्कुरा दिए। जितनी सहजता से उन्होंने नानी के जाने की बात की, वो बचपन में ही संभव है शायद।

जिस मासूमियत से वो खेल रहे थे, मैं मुस्कुराते हुए उसमें अपने बचपन की छवि देख रही थी। मैंने नज़र उठा कर ऊपर देखा तो पता चला कि उनको निहारने वाली मैं अकेली नहीं थी। दो तीन और महिलाएं भी मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। एक दूसरे को देख कर हमारी मुस्कान और गहरी हो गई। शायद वास्तविकता के माया जाल में उलझे हम सब उस किनारे को देख कर खुश हो रहे थे जो कहीं दूर छूट गया था और त्रासदी यह कि वहां लौट के जाना संभव नहीं है।

पर मेरा वहां बैठना लड़के को पसंद नहीं आया क्योंकि मेरे आने से जगह कम होने के कारण उनका खेल बंद हो गया। जैसे ही एक महिला उठ कर गई तो उसने अपनी बहन को आगे होने को कहा। जगह मिलने पर उनके चेहरे खिल उठे और उन्होंने फिर से खेलना शुरू कर दिया।

खेल के बीच बीच में भाई पूछता, "पता तो चल नहीं रहा कहाँ पहुंचे हैं।" तो बहन अपना फर्ज़ निभाते हुए कहा, "पहुँच जाएंगे।" जब उसने दो तीन बार पूछा तो एक स्टेशन पे मेट्रो के दरवाज़े बंद होने पे मैंने कहा ,"यह यमुना बैंक है। तुम्हे कहाँ जाना है।"

"प्रीत विहार," बहन ने जवाब दिया।

अब घबराने की बारी मेरी थी। "पर यह ट्रेन तो वहां जा ही नहीं रही। यह तो नॉएडा जाएगी।"

"पर मेरी मम्मी ने कहा है राजीव चौंक वाली मेट्रो तुम्हे प्रीत विहार उतारेगी। वहां से मामा तुम्हें लेने आ जायेंगे।"

मुझे पता था माँ की कही बात के आगे मेरा समझाना फ़िज़ूल था। तो मैंने कहा, "मम्मी को फ़ोन लगाओ।"

उसने मम्मी से बात की तो माता जी ने वही बात दोहरा दी। मामा लेने आयेंगे प्रीत विहार पर उतर जाना।

मैंने फ़ोन उसके हाथ से लिया और उनकी भाषा समझते हुए उन्हें पंजाबी में समझाया कि वो गलत ट्रेन में बैठ गए हैं। तो वो थोड़ी चिंतित हो के बोली, "यह बच्चे तो पहली बार अकेले सफ़र कर रहे हैं। क्या करे?"

ज्यादा समय न लेते हुए मैंने कहा, "ठीक है मैं इनको सही ट्रेन में बिठा दूंगी।"

तो उन्होंने बड़ी मेहरबानी कहते हुए निश्चित हो कर फ़ोन रख दिया। बाकी लोग भी उन बच्चों को समझा रहे थे पर अब वो डर गए थे। ज्यादा सोचने का समय न लेते हुए मैं दोनों बच्चों को ले कर उतर गई।

मैं उन्हें रास्ता दिखाते और बताते हुए जा रही थी क्योंकि इस ट्रेन में बैठने के बाद भी उनको अगले स्टेशन से ट्रेन बदलनी थी।

लड़की ने पूछा," वहां जा कर हम किससे पूछे कि कौन सी मेट्रो प्रीत विहार जाएगी?"

मैंने लगभग डांटते हुए कहा, "किसी से नहीं पूछोगे तुम लोग। ऐसा बोर्ड होगा जिस पे वैशाली लिखा होगा।यह बोर्ड  प्लेटफ़ॉर्म पे होगा और ट्रेन के आगे भी लिखा होता है कि ट्रेन कहाँ जा रही है ट्रेन के आगे और प्लेटफार्म पे लिखा होता है। खुद पढना। सब को बताते नहीं चलना की तुम अकेले जा रहे हो।"

दुसरे प्लेटफ़ॉर्म पे पहुँचते ही ट्रेन आती दिखाई दी। फिर से सारी चेतावनियाँ दे कर मैंने उनसे फ़ोन नंबर लिया। और दरवाज़ा बंद होते ही मैंने फ़ोन करना शुरू कर दिया। नेटवर्क न होने के कारण फ़ोन नहीं लग रहा था। ७ -८ बार कोशिश करने पर फ़ोन लगा तो पता चला कि एक आंटी ने वही मेट्रो पकडनी है वो उन्हें चढ़ा देंगी।

मेरी चिंता यथावत थी। प्रीत विहार पहुँचने पे फिर फ़ोन किया तो पता चला कि मामा जी नहीं पहुंचे तो वो लोग रिक्शा से घर जा रहे हैं। मेरा फ़ोन चालू रहा जब तक वो लोग घर नहीं पहुंचे। घबराहट में मैंने उनसे उनका नाम भी नहीं पूछा। फ़ोन पे उनकी मम्मी की दूर से ही आवाज़ सुन कर मैंने फ़ोन रख दिया। मानों अपने कर्तव्य से इतिश्री पा ली हो।

पर मेट्रो की घटना ने मुझे सोचने पे मजबूर कर दिया कि क्या हम आज के दौर में अजनबियों पे इतना भरोसा कर सकते हैं? अगर कहीं ...

उसके आगे सोचने को मैं खुद को ही मना कर देती हूँ।

क्या सोच के खुश होऊं कि  वो बच्चे सही सलामत घर पहुँच गए या यह सोच कर कि लोगों को आज भी इंसानियत पर इतना विश्वास है?

बातें तो दोनों अच्छी हैं पर मुस्कराहट, पता नहीं क्यों पूरी तरह मेरा साथ नहीं दे रही।

मुझे थोडा समय चाहिए ... शायद...

© उपमा डागा पार्थ २०१३

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