हर दिन उतने अच्छे नहीं होते कि आप हँसते हुए ही ऑफिस से बाहर निकलो।
तो कुछ वैसा ही दिन था आज मेरे लिए। सर आज कुछ गुस्से में थे और मुझसे भी एक-आध गलती हो गई थी। तो कुल मिला कर आज का दिन मेरा नहीं था। ड्यूटी निपटा कर भी कोई फ़ोन नहीं किया, मानों दुनिया को आज के बारे में बताये बिना निकल जाना चाहती हूँ—छुपते-छुपाते हुए। और जिस दिन जरा सी शाबाशी मिल जाती है तो उस दिन फटाफट स्माइली वाले मेसैज भेज देती हूँ। आज तो बस थके-थके क़दमों से बढ़ रही थी मेट्रो स्टेशन की तरफ। गुस्सा नहीं था डांट का, पर ऐसे में मुस्कराहट किसी छोटे बच्चे की तरह दुबक के कोने में छिप जाती है।
मेट्रो में ढलके-ढलके क़दमों से चढ़ गई। लगा सब लोग मुझे ही घूर रहे हैं। मेरी कहानी पढ़ने को आतुर। लगा आज मेट्रोस्तान में कोई और खबर नहीं छपी मेरी कहानी के अलावा। और यकीन मानिए मैं अपनी आज की कहानी, या यूं कहिए मेरी डांट की कहानी, बिलकुल नहीं बाँटना चाहती थी। किसी के भी साथ नहीं। बड़ी तकलीफ होती है यह मानने में कि कोई काम हम उतनी कुशलता से नहीं कर पाए जैसा हम से कहा गया था। उम्मीदों के तराजू के बाट में जब हमारा पलड़ा झुक जाता है तो हम यह समझ ही नहीं पाते कि अब कैसे इसको पूरा करें।
दुखी नहीं थी पर चुप थी। लगा अपेक्षाओं ने मेरे सारे शब्द, हौंसले ताक़ पर रख दिए हों। शायद इसलिए बच्चों को टेस्ट में कम नंबर लाने पर मैं डांटती हूँ तो असल में वो चुप नहीं होते, बल्कि अपेक्षाएँ उनके सर चढ़ कर उनके सारे शब्द ले लेती हैं और हमें लगता है कि उनके पास कोई जवाब नहीं है।
हम बच्चों को हमेशा सबसे ऊपर, सबसे अव्वल देखना चाहते हैं, पर क्या उनको इस दौड़ में भगाते भगाते हम कभी यह अनुभव कर पाते हैं कि कई बार वो गलती इसलिए नहीं करते कि उनको वो सबक याद नहीं होता बल्कि शायद उस दिन वो थके होते हैं। पूरा सप्ताह, पूरा महीना, पूरा साल उनको सिर्फ खुद को साबित करना होता है—पढ़ाई में, खेलों में, व्यवहार में, और पता नहीं कहाँ कहाँ। और किसी भी माँ-बाप की कसौटियां, अपेक्षाएँ छतों को भी लांघते हुए आकाश जितनी तो होती ही हैं। और हर छलांग में वो हर बार आकाश छू ही आये यह जरुरी तो नहीं। पर माँ-बाप यह समझते नहीं हैं या ज़माने की रीत निभाते हुए समझना नहीं चाहते हैं—पता नहीं।
तो आज मुझे सीट नहीं चाहिए थी और न ही कोई कहानी। एक कोने में हैंडल को पकड़े खड़ी थी। अचानक देखा पास वाली सीट पर एक छोटी सी बच्ची, अपनी मम्मी की गोद में बैठी मेरा सूट खींच रही थी।
मैंने जब उसकी तरफ देखा तो उसने इतनी बड़ी मुस्कान बिखेर दी मानों कह रही हो कि जो काम वो करना चाह रही थी उसमें उसे ‘ए’ ग्रेड मिल गया है।
बच्चों की मासूमियत कभी तो सारे गम भुला देती है और कभी यह एहसास दिला कर उदास कर जाती है कि हम बड़े क्यूँ हुए। उस समय यह दोनों एहसास थे मेरे अंदर।
खैर, उसकी मुस्कान के आगे मेरे ढलके से मुंह ने हार मान ली और मैंने भी कोशिश करके उतनी ही बड़ी मुस्कान वापिस कर दी।
मुस्कान वापिस पा कर वो खुश हो गई और बस एक दोस्ती की शुरुआत हो गई। तो अब मेरी वो दोस्त मुझसे खेल रही थी। कभी सूट पकड़ कर, कभी पर्स की चैन पकड़ कर। पकड़ती, देखती कि मैंने देखा कि नहीं। फिर हंसती और मैं देख कर उसको पकड़ने का नाटक करती तो वो खिलखिला कर हँसने लगती।
उसके इस प्यारे से खेल ने मेरा मूड थोड़ा ठीक कर दिया। अचानक याद आया कि मेरे पर्स में दो टॉफी हैं।
मुझे लगा मेरे मूड की इस संजीवनी—नाम मुझे पता नहीं था, न मैंने पूछने की जरूरत समझी क्योंकि हम दोनों ने एक दूसरे को अपना परिचय मुस्कुराहटों के साथ ही दिया था—को टॉफ़ी दे कर कम से कम धन्यवाद तो कर ही सकती हूँ।
जैसे ही मैंने उसको टॉफ़ी दी तो एक तो उसने निकल कर उसी समय खा ली, दूसरी हाथ से गिर गई। वो मम्मी की गोद से उतरी, टॉफ़ी उठाई और फिर बैठने लगी, पर बैठने से पहले टॉफ़ी फिर गिर गई। वो फिर झुकी और टॉफ़ी उठाई। लगता था जहाँ एक तरफ टॉफ़ी उसे सताने की जिद पर थी, वहीं उसने भी ठान ली थी कि तुमसे तो मैं नहीं हारूँगी।
ऐसा तीन चार बार हुआ। गिरना, उठाना, बैठने से पहले फिर गिरना। पांचवी बार तक उसके मुंह वाली टॉफ़ी ख़तम हुई तो उसने बैठने से पहले हाथ में पकड़ी हुई टॉफ़ी का रैपर खोल कर उसे भी मुंह में डाल लिया। और माँ की गोद में बैठ गई—एक विजयी मुस्कान के साथ।
जब परिचय मुस्कान का हो तो तो मुस्कान ही हमें सब कुछ कह देती है, जो शब्द शायद न कह पाए।
बस जो बात में खुद को इतनी देर से नहीं समझा पाई वो उसने मुझे समझा दी। "कोशिश करती जाओ, सफलता पीछे-पीछे आ ही जाएगी।"
और मैंने उसकी तरफ देखा और सोचा कि कौन कहता है गुरु हमेशा कुछ कह के, अपने अनुभव के आधार पर ही हमें कुछ सिखा सकता है, आज मेरे इस न बोलने वाले गुरु ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया था।
तो मैं तैयार थी—अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ, फिलहाल उतरने के लिए, पर अगले सफ़र के इंतज़ार के साथ...
© उपमा डागा पार्थ २०१३
तो कुछ वैसा ही दिन था आज मेरे लिए। सर आज कुछ गुस्से में थे और मुझसे भी एक-आध गलती हो गई थी। तो कुल मिला कर आज का दिन मेरा नहीं था। ड्यूटी निपटा कर भी कोई फ़ोन नहीं किया, मानों दुनिया को आज के बारे में बताये बिना निकल जाना चाहती हूँ—छुपते-छुपाते हुए। और जिस दिन जरा सी शाबाशी मिल जाती है तो उस दिन फटाफट स्माइली वाले मेसैज भेज देती हूँ। आज तो बस थके-थके क़दमों से बढ़ रही थी मेट्रो स्टेशन की तरफ। गुस्सा नहीं था डांट का, पर ऐसे में मुस्कराहट किसी छोटे बच्चे की तरह दुबक के कोने में छिप जाती है।
मेट्रो में ढलके-ढलके क़दमों से चढ़ गई। लगा सब लोग मुझे ही घूर रहे हैं। मेरी कहानी पढ़ने को आतुर। लगा आज मेट्रोस्तान में कोई और खबर नहीं छपी मेरी कहानी के अलावा। और यकीन मानिए मैं अपनी आज की कहानी, या यूं कहिए मेरी डांट की कहानी, बिलकुल नहीं बाँटना चाहती थी। किसी के भी साथ नहीं। बड़ी तकलीफ होती है यह मानने में कि कोई काम हम उतनी कुशलता से नहीं कर पाए जैसा हम से कहा गया था। उम्मीदों के तराजू के बाट में जब हमारा पलड़ा झुक जाता है तो हम यह समझ ही नहीं पाते कि अब कैसे इसको पूरा करें।
दुखी नहीं थी पर चुप थी। लगा अपेक्षाओं ने मेरे सारे शब्द, हौंसले ताक़ पर रख दिए हों। शायद इसलिए बच्चों को टेस्ट में कम नंबर लाने पर मैं डांटती हूँ तो असल में वो चुप नहीं होते, बल्कि अपेक्षाएँ उनके सर चढ़ कर उनके सारे शब्द ले लेती हैं और हमें लगता है कि उनके पास कोई जवाब नहीं है।
हम बच्चों को हमेशा सबसे ऊपर, सबसे अव्वल देखना चाहते हैं, पर क्या उनको इस दौड़ में भगाते भगाते हम कभी यह अनुभव कर पाते हैं कि कई बार वो गलती इसलिए नहीं करते कि उनको वो सबक याद नहीं होता बल्कि शायद उस दिन वो थके होते हैं। पूरा सप्ताह, पूरा महीना, पूरा साल उनको सिर्फ खुद को साबित करना होता है—पढ़ाई में, खेलों में, व्यवहार में, और पता नहीं कहाँ कहाँ। और किसी भी माँ-बाप की कसौटियां, अपेक्षाएँ छतों को भी लांघते हुए आकाश जितनी तो होती ही हैं। और हर छलांग में वो हर बार आकाश छू ही आये यह जरुरी तो नहीं। पर माँ-बाप यह समझते नहीं हैं या ज़माने की रीत निभाते हुए समझना नहीं चाहते हैं—पता नहीं।
तो आज मुझे सीट नहीं चाहिए थी और न ही कोई कहानी। एक कोने में हैंडल को पकड़े खड़ी थी। अचानक देखा पास वाली सीट पर एक छोटी सी बच्ची, अपनी मम्मी की गोद में बैठी मेरा सूट खींच रही थी।
मैंने जब उसकी तरफ देखा तो उसने इतनी बड़ी मुस्कान बिखेर दी मानों कह रही हो कि जो काम वो करना चाह रही थी उसमें उसे ‘ए’ ग्रेड मिल गया है।
बच्चों की मासूमियत कभी तो सारे गम भुला देती है और कभी यह एहसास दिला कर उदास कर जाती है कि हम बड़े क्यूँ हुए। उस समय यह दोनों एहसास थे मेरे अंदर।
खैर, उसकी मुस्कान के आगे मेरे ढलके से मुंह ने हार मान ली और मैंने भी कोशिश करके उतनी ही बड़ी मुस्कान वापिस कर दी।
मुस्कान वापिस पा कर वो खुश हो गई और बस एक दोस्ती की शुरुआत हो गई। तो अब मेरी वो दोस्त मुझसे खेल रही थी। कभी सूट पकड़ कर, कभी पर्स की चैन पकड़ कर। पकड़ती, देखती कि मैंने देखा कि नहीं। फिर हंसती और मैं देख कर उसको पकड़ने का नाटक करती तो वो खिलखिला कर हँसने लगती।
उसके इस प्यारे से खेल ने मेरा मूड थोड़ा ठीक कर दिया। अचानक याद आया कि मेरे पर्स में दो टॉफी हैं।
मुझे लगा मेरे मूड की इस संजीवनी—नाम मुझे पता नहीं था, न मैंने पूछने की जरूरत समझी क्योंकि हम दोनों ने एक दूसरे को अपना परिचय मुस्कुराहटों के साथ ही दिया था—को टॉफ़ी दे कर कम से कम धन्यवाद तो कर ही सकती हूँ।
जैसे ही मैंने उसको टॉफ़ी दी तो एक तो उसने निकल कर उसी समय खा ली, दूसरी हाथ से गिर गई। वो मम्मी की गोद से उतरी, टॉफ़ी उठाई और फिर बैठने लगी, पर बैठने से पहले टॉफ़ी फिर गिर गई। वो फिर झुकी और टॉफ़ी उठाई। लगता था जहाँ एक तरफ टॉफ़ी उसे सताने की जिद पर थी, वहीं उसने भी ठान ली थी कि तुमसे तो मैं नहीं हारूँगी।
ऐसा तीन चार बार हुआ। गिरना, उठाना, बैठने से पहले फिर गिरना। पांचवी बार तक उसके मुंह वाली टॉफ़ी ख़तम हुई तो उसने बैठने से पहले हाथ में पकड़ी हुई टॉफ़ी का रैपर खोल कर उसे भी मुंह में डाल लिया। और माँ की गोद में बैठ गई—एक विजयी मुस्कान के साथ।
जब परिचय मुस्कान का हो तो तो मुस्कान ही हमें सब कुछ कह देती है, जो शब्द शायद न कह पाए।
बस जो बात में खुद को इतनी देर से नहीं समझा पाई वो उसने मुझे समझा दी। "कोशिश करती जाओ, सफलता पीछे-पीछे आ ही जाएगी।"
और मैंने उसकी तरफ देखा और सोचा कि कौन कहता है गुरु हमेशा कुछ कह के, अपने अनुभव के आधार पर ही हमें कुछ सिखा सकता है, आज मेरे इस न बोलने वाले गुरु ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया था।
तो मैं तैयार थी—अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ, फिलहाल उतरने के लिए, पर अगले सफ़र के इंतज़ार के साथ...
© उपमा डागा पार्थ २०१३
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें